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Published November 10, 2023
Updated November 10, 2023

VARADANDITATTIRSTHAMDHUKESHWARSTUTIH

वरदानदिष्टिरष्टधामेश्वरस्तुति एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान शिव की आठ दिशाओं के रूप में महिमा का वर्णन करता है। यह स्तोत्र 16वीं शताब्दी के कवि और संत नरहरि द्वारा रचित है।

स्तोत्र के आठ श्लोक हैं, प्रत्येक श्लोक में आठ पद हैं। प्रत्येक पद में, नरहरि भगवान शिव की एक दिशा के रूप में महिमा का वर्णन करते हैं।

उदाहरण के लिए, पहले श्लोक में, नरहरि भगवान शिव को पूर्व दिशा के रूप में वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि पूर्व दिशा से भगवान शिव का प्रकाश आता है। दूसरे श्लोक में, वे भगवान शिव को दक्षिण दिशा के रूप में वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि दक्षिण दिशा से भगवान शिव की शक्ति आती है।

स्तोत्र के अंत में, नरहरि कहते हैं कि जो कोई भी इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

वर्धनदिष्टिरष्टधामेश्वरस्तुति एक महत्वपूर्ण धार्मिक पाठ है जो भगवान शिव की महिमा और शक्ति को दर्शाता है। यह स्तोत्र शिव भक्तों के बीच लोकप्रिय है और इसका पाठ अक्सर मंदिरों और घरों में किया जाता है।

यहां वर्धनदिष्टिरष्टधामेश्वरस्तुति के कुछ प्रमुख बिंदु दिए गए हैं:

  • यह स्तोत्र भगवान शिव की आठ दिशाओं के रूप में महिमा का वर्णन करता है।
  • यह स्तोत्र भगवान शिव की शक्ति और महिमा को दर्शाता है।
  • यह स्तोत्र शिव भक्तों के बीच लोकप्रिय है।

स्तोत्र का हिंदी अनुवाद:

श्लोक 1

नरहरि ने कहा, "हे शिव, तुम पूर्व दिशा के स्वामी हो। तुम प्रकाश के रूप में प्रकट हुए हो। तुम मनुष्यों को ज्ञान प्रदान करते हो। तुम सभी जीवों की रक्षा करते हो।"

श्लोक 2

"हे शिव, तुम दक्षिण दिशा के स्वामी हो। तुम शक्ति के रूप में प्रकट हुए हो। तुम मनुष्यों को शक्ति प्रदान करते हो। तुम सभी दुखों को दूर करते हो। तुम सभी सुखों को प्रदान करते हो।"

श्लोक 3

"हे शिव, तुम पश्चिम दिशा के स्वामी हो। तुम शान्ति के रूप में प्रकट हुए हो। तुम मनुष्यों को शान्ति प्रदान करते हो। तुम सभी रोगों को दूर करते हो। तुम सभी कष्टों को दूर करते हो।"

श्लोक 4

"हे शिव, तुम उत्तर दिशा के स्वामी हो। तुम प्रेम के रूप में प्रकट हुए हो। तुम मनुष्यों को प्रेम प्रदान करते हो। तुम सभी सुखों को प्रदान करते हो। तुम सभी आनंदों को प्रदान करते हो।"

श्लोक 5

VARADANDITATTIRSTHAMDHUKESHWARSTUTIH

"हे शिव, तुम ऊर्ध्व दिशा के स्वामी हो। तुम ज्ञान के रूप में प्रकट हुए हो। तुम मनुष्यों को ज्ञान प्रदान करते हो। तुम सभी सिद्धियों को प्रदान करते हो। तुम सभी सुखों को प्रदान करते हो।"

श्लोक 6

"हे शिव, तुम अधो दिशा के स्वामी हो। तुम मोक्ष के रूप में प्रकट हुए हो। तुम मनुष्यों को मोक्ष प्रदान करते हो। तुम सभी पापों से मुक्ति प्रदान करते हो। तुम सभी सुखों को प्रदान करते हो।"

श्लोक 7

"हे शिव, तुम आकाश के स्वामी हो। तुम सर्वव्यापी हो। तुम सभी जीवों में व्याप्त हो। तुम सभी जीवों का पालन करते हो।"

श्लोक 8

"हे शिव, तुम पृथ्वी के स्वामी हो। तुम सबका आधार हो। तुम सभी जीवों को भोजन प्रदान करते हो। तुम सभी जीवों की रक्षा करते हो।"

"हे शिव, जो कोई भी तुम्हारी आठ दिशाओं की पूजा करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। वह सभी सुखों को प्राप्त करता है और अंत में मोक्ष प्राप्त करता है।"

कुछ विशेष टिप्पणियां:

  • **स्तोत्र में भगवान शिव को वरदानदिष्टि कहा गया है। इसका अर्थ है "वरदान देने वाली दिशा"। यह भगवान शिव की उस शक्ति का वर्णन करता है जो वह अपने भक्तों को वरदान देकर दिखाते हैं।

वरुणप्रोक्तं हालास्याष्टकम् Varunproktam halasyashtakamvarunproktam halasyashtakam

 

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