अभिष्टप्रार्थनाष्टकम् के आठ श्लोक हैं, और प्रत्येक श्लोक में भगवान कृष्ण से एक अलग अभिष्ट की कामना की गई है।
अभिष्टप्रार्थनाष्टकम् का पहला श्लोक इस प्रकार है:
अभिष्टं देहि मे कृष्ण, त्वं सर्वोऽर्थसाधक। त्वं सर्वं वरदस्यसि, त्वं सर्वं भवापह।
इस श्लोक में, वल्लभाचार्य भगवान कृष्ण से अभिष्ट सिद्धि की कामना करते हैं। वे कहते हैं कि भगवान कृष्ण ही सभी अभिष्टों को सिद्ध करने वाले हैं, और वे ही सभी दुखों को दूर करने वाले हैं।
अभिष्टप्रार्थनाष्टकम् के सभी आठ श्लोकों का अर्थ है:
- श्लोक 1: भगवान कृष्ण से अभिष्ट सिद्धि की कामना की जाती है।
- श्लोक 2: भगवान कृष्ण से सभी प्रकार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
- श्लोक 3: भगवान कृष्ण से सभी प्रकार के रोगों और कष्टों से मुक्ति की कामना की जाती है।
- श्लोक 4: भगवान कृष्ण से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति की कामना की जाती है।
- श्लोक 5: भगवान कृष्ण से मोक्ष की कामना की जाती है।
- श्लोक 6: भगवान कृष्ण से भक्ति की प्राप्ति की कामना की जाती है।
- श्लोक 7: भगवान कृष्ण से ज्ञान की प्राप्ति की कामना की जाती है।
- श्लोक 8: भगवान कृष्ण से प्रेम की प्राप्ति की कामना की जाती है।
अभिष्टप्रार्थनाष्टकम् एक शक्तिशाली भक्ति भजन है जो भक्तों के दिलों में भगवान कृष्ण से अभिष्ट सिद्धि की कामना को जगा सकता है। यह भजन भगवान कृष्ण की महिमा को दर्शाता है और उन्हें अभिष्ट सिद्धि के देवता के रूप में चित्रित करता है।
अभिष्टप्रार्थनाष्टकम् के आठ श्लोकों का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है:
- हे कृष्ण, मुझे अभिष्ट सिद्धि प्रदान करो। तुम ही सभी अभिष्टों को सिद्ध करने वाले हो, और तुम ही सभी दुखों को दूर करने वाले हो।
- हे कृष्ण, मुझे सभी प्रकार की सुख-समृद्धि प्रदान करो।
- हे कृष्ण, मुझे सभी प्रकार के रोगों और कष्टों से मुक्ति प्रदान करो।
- हे कृष्ण, मुझे सभी प्रकार के पापों से मुक्ति प्रदान करो।
- हे कृष्ण, मुझे मोक्ष प्रदान करो।
- हे कृष्ण, मुझे भक्ति प्रदान करो।
- हे कृष्ण, मुझे ज्ञान प्रदान करो।
- हे कृष्ण, मुझे प्रेम प्रदान करो।
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