उत्कण्ठादशकम् एक संस्कृत श्लोक है जिसे राधा-कृष्ण भक्ति में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसे राधा के भक्तों द्वारा अक्सर गाया और पढ़ा जाता है। यह श्लोक 10 भक्तों की तीव्र आकांक्षाओं को व्यक्त करता है कि वे राधा की सेवा कर सकें।
उत्कण्ठादशकम् का शाब्दिक अर्थ है "दस उत्कंठाएँ"। श्लोक में, भक्त राधा की सुंदरता, उनकी उदारता, उनकी बुद्धिमत्ता और उनकी भक्ति की प्रशंसा करते हैं। वे राधा की सेवा करने की अपनी इच्छा को व्यक्त करते हैं, और वे कृष्ण के साथ उनके प्रेम संबंध के बारे में सोचकर उत्साहित हो जाते हैं।
उत्कण्ठादशकम् का पहला श्लोक इस प्रकार है:
चित्ते चिन्न स्वर्ण विनिंदी चिक्कणा
रक्त-पटल शोभना कृष्णेन्दु-लोचना
चञ्चल कुन्तल मयूर-पंख-रचिता
मुकुन्द-दृष्टि-सौख्य-सम्पदा
इस श्लोक में, भक्त राधा की सुंदरता की प्रशंसा करते हैं। वे कहते हैं कि राधा की त्वचा की चमक सोने की चमक को पार कर जाती है। उनकी आंखें कृष्ण के समान हैं, और उनके बाल चंचलता से हिलते हैं। वे कृष्ण को देखकर बहुत खुश होती हैं।
उत्कण्ठादशकम् एक शक्तिशाली भक्ति श्लोक है जो भक्तों के दिलों में राधा के लिए प्रेम और भक्ति को जगा सकता है। यह श्लोक राधा की सेवा करने की इच्छा को प्रेरित करने में मदद कर सकता है।
उत्कण्ठादशकम् की गणना 18वीं शताब्दी के वैष्णव कवि और दार्शनिक राघुनंदन दास गोस्वामी द्वारा लिखी गई एक रचना के रूप में की जाती है। यह रचना उनके "स्तवनावली" ग्रंथ में शामिल है।
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