हनुमांचतुर्विंशति (शिवाभिनवनरुसिंहभारतीविरचित) एक संस्कृत श्लोकों का संग्रह है जो हनुमान जी की स्तुति करते हैं। यह श्लोकों का संग्रह शिव अभिनवनुसिंहभारती द्वारा लिखा गया था, जो एक 16वीं शताब्दी के संस्कृत कवि थे।
हनुमांचतुर्विंशति में 24 श्लोक हैं, प्रत्येक श्लोक में हनुमान जी के एक विशेष गुण या कार्य की प्रशंसा की गई है। श्लोकों में हनुमान जी को एक शक्तिशाली योद्धा, एक निष्ठावान भक्त और एक बुद्धिमान और ज्ञानी व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है।
हनुमांचतुर्विंशति का पाठ करने से भक्तों को हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है और वे सभी प्रकार के कष्टों से मुक्त होकर सुखी और समृद्ध जीवन जीते हैं।
हनुमांचतुर्विंशति के कुछ श्लोक इस प्रकार हैं:
- श्लोक 1:
नमो हनुमते महाबलाय वीर्ये चैव पराक्रमे। बुद्धिबलविशारदाय त्वं सर्वेषां हिताय कल्पसे।।
अर्थ:
नमस्ते हनुमते, महाबली और वीर्यवान। बुद्धि और बल में निपुण, आप सभी के लिए कल्याणकारी हैं।
- श्लोक 2:
रामस्य दूतस्य त्वस्य शरणागतस्य च। सर्वपापविनाशकस्य नमो हनुमते।।
अर्थ:
राम के दूत और शरणागतों के लिए कल्याणकारी, सभी पापों को नष्ट करने वाले हनुमते को नमस्कार।
- श्लोक 3:
सिद्धेश्वरस्य तू वीर्ये हनुमते महाबल। रामायणकथाश्रुतेन त्वं सर्वेषां हिताय कल्पसे।।
अर्थ:
सिद्धेश्वर के बल से महाबली हनुमते, रामायण की कथा के श्रवण से आप सभी के लिए कल्याणकारी हैं।
हनुमांचतुर्विंशति एक शक्तिशाली भक्ति स्तोत्र है जो हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने के लिए एक प्रभावी उपाय है।
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