June 10, 2026

Vishnu Stotra

Shri Vishnu Stotra : श्री विष्णु स्तोत्र….

Vishnu Stotra: श्री विष्णु स्तोत्र: श्री विष्णु स्तोत्र हिंदू धर्म में सबसे पवित्र और सम्मानित मंत्रों में से एक है। यह पूजा का एक शक्तिशाली और लोकप्रिय माध्यम है जो परम लक्ष्य, मोक्ष और सांसारिक बंधनों से मुक्ति का मार्ग दिखाता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से मानवीय समस्याओं से छुटकारा मिलता है। भगवान की महिमा अपार है। वे गुणों, ज्ञान और वैराग्य से भरपूर हैं। भगवान की पूजा करने से हम दुनिया के प्रति अपने मोह से मुक्त हो जाते हैं – हमें एक तरह की मुक्ति या आज़ादी का अनुभव होता है। Vishnu Stotra जैसे नदी समुद्र में मिलकर अपनी पहचान खो देती है, वैसे ही जब हम परमात्मा में विलीन हो जाते हैं, तो हम परम स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं। दिव्य रूपों का ध्यान करने और भगवान के पवित्र नाम का उच्चारण करने से हमारी इंद्रियां और क्षमताएं उच्च स्तर पर पहुंच जाती हैं; हम आध्यात्मिकता की राह पर चल पड़ते हैं। श्री विष्णु स्तोत्र के लाभ: भगवान विष्णु ब्रह्मांड के सर्वोच्च देवता हैं और अन्य सभी देवता उन्हीं से उत्पन्न हुए हैं। यदि शुद्ध हृदय से जप किया जाए, तो भगवान विष्णु के 1000 नामों में अपार शक्ति होती है।जो लोग नियमित रूप से इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, उन पर सौभाग्य की कृपा होती है, जिससे उन्हें जीवन में – चाहे वह पेशेवर हो या व्यक्तिगत – अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलती है। श्री विष्णु स्तोत्र का पाठ करने से विचारों को शांत करने और चिंताओं को कम करने में भी मदद मिलती है। Vishnu Stotra इस मंत्र से मिलने वाली मानसिक शांति व्यक्ति को अपने विचारों को सकारात्मकता की ओर ले जाने में मदद कर सकती है।भक्तों के जीवन से सभी बाधाएं और समस्याएं दूर हो जाती हैं और वे सफलता प्राप्त करने की ओर अग्रसर होते हैं। यह पाठ करने वाले के शरीर और मन के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बनाता है। श्री विष्णु स्तोत्र उन्हें दुश्मनों के बुरे इरादों से बचाता है।श्री विष्णु स्तोत्र हमारे पापों को धोने में मदद कर सकता है; चाहे वे इस जीवन के हों या पिछले जन्मों के। Vishnu Stotra तब हम ज्ञानी और गुणी व्यक्ति बन जाते हैं जो ईश्वर और धर्म के प्रति समर्पित होते हैं।श्री विष्णु स्तोत्र Vishnu Stotra का पाठ करने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह भक्त को परलोक में मोक्ष प्राप्त करने की संभावना के करीब ले जाता है। यह मन को सभी बुरे विचारों से शुद्ध करता है।इससे मन की दृढ़ता, अच्छी याददाश्त, आत्म-सुख (आंतरिक खुशी) और क्रोध, ईर्ष्या व लालच से मुक्ति जैसे लाभ मिलते हैं। Vishnu Stotra यह दुख, शोक और पीड़ा को कम करता है। किसे यह स्तोत्र पढ़ना चाहिए: जो व्यक्ति गहरे दुख में हो और मुश्किलों से बाहर न निकल पा रहा हो, उसे वैदिक नियमों के अनुसार श्री विष्णु स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। श्री विष्णु स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Vishnu Stotra in Hindi किं नु नाम सहस्त्राणि जपते च पुन: पुन: ।यानि नामानि दिव्यानि तानि चाचक्ष्व केशव: ।। 1 ।। मत्स्यं कूर्मं वराहं च वामनं च जनार्दनम् ।गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम् ।। 2 ।। पदनाभं सहस्त्राक्षं वनमालिं हलायुधम् ।गोवर्धनं ऋषीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ।। 3 ।। विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम् ।दामोदरं श्रीधरं च वेदांग गरुड़ध्वजम् ।। 4 ।। अनन्तं कृष्णगोपालं जपतो नास्ति पातकम् ।गवां कोटिप्रदानस्य अश्वमेधशतस्य च ।। 5 ।। कन्यादानसहस्त्राणां फलं प्राप्नोति मानव: ।अमायां वा पौर्णमास्यामेकाद्श्यां तथैव च ।। 6 ।। संध्याकाले स्मरेन्नित्यं प्रात:काले तथैव च ।मध्याहने च जपन्नित्यं सर्वपापै: प्रमुच्यते ।। 7 ।। ।। इति श्री विष्णु स्तोत्र संपूर्णम् ।।

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Laghu Stotram

Shri Laghu Stotram : श्री लघु स्तोत्रम्….

श्री लघु स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Shri Laghu Stotram in Hindi आधारे तरुणार्कबिम्बरूचिरं सोमप्रभं वाग्भवंबीजं मनमथमिंद्रगोपकनिभं ह्रत्पंकजे संस्थितम् ।रन्ध्रे ब्रह्मपदे च शाक्तमपरं चन्द्रप्रभाभासुरं येध्यायंति पदत्रयं तव शिवे ते यांति सौख्यं पदम् ।। 1 ।। ॐ अस्य श्रीलघुस्तोत्रस्य वृद्धसारस्वतऋषि: ।त्रिपुराभैरवी देवता । शार्दूलविक्रीडितं छंद: ।मम सर्वकामफलप्राप्त्र्थे जपे विनियोग: । ॐ ऐन्द्रस्येव शरासनस्य दधतो मध्ये ललाटप्रभांशौक्लीं कान्तिमनुष्य गोरिव शिरस्यातन्वती सर्वत: ।एषाऽसौ त्रिपुरा ह्रदि द्युतिरिवोष्मांशो: सदा संस्थिताछिद्यान्न: सहसा पदैस्त्रिभिरघं ज्योतिर्मयी वांगमयी ।। 1 ।। या मात्रा त्रिपुषोलतातनुलसत्तंतुसिथतिस्पर्धिनीवाग्बीजे प्रथमे स्थिता तव सदा तां मन्महे ते वयम् ।शक्ति कुण्डलिनीति विश्वजननव्यापारबद्धोद्यमांज्ञात्वेत्थं न पुन: स्प्रशंति जननीगर्भेर्भकत्वं नरा: ।। 2 ।। दृष्ट्वा संभ्रमकारि वस्तु सहसा ऐं ऐमिति व्याह्रतंयेनाकूतवशादपीह वरदे बिंदु बिनाप्यक्षरम् ।तस्यापि ध्रुवमेव देवितरसा Laghu Stotram जाते तवानुग्रहे वाच:सूक्तिसुधारसद्रवमुचो निर्यान्ति वक्त्रोदरात् ।। 3 ।। यन्नित्ये तव कामराजमपरं मन्त्राक्षरं निष्कलंतत्सारस्वतमित्यवैति विरल: कश्र्चिद्बुधश्रेचद्भुवि ।आख्यां प्रतिपर्व सत्यतपसो यत्कीर्तयन्तो द्विजा:प्रारम्भे प्रणवास्पदं प्रणयितुं नित्योंच्चरंति स्फुटम् ।। 4 ।। यत्सदयो वचसां प्रव्रत्तिकरणे दृष्टप्रभावंबुधैस्तार्तीयं तदहं नमामि मनसा तद्वीजमिंदुप्रभम् ।अस्त्वौर्वोऽपि सरस्वतीमनुगते जाड्यांबुविच्छित्तयेगोशब्दो गिरिवर्तते सुनियतं योगं विना सिद्धित: ।। 5 ।। एकैकं तव देवि जन्म हयनघं सव्यंजनाव्यंजनंकूटस्थं यदि वा प्रथक क्रमगतं यद्वा स्थितं व्युत्क्रमात् ।यं यं काममपेक्ष्य येन विधिना केनापि वा चिन्तितंजप्तं वा सफलीकरोति तरसा तं तं समस्तं न्रणाम् ।। 6 ।। वामे पुस्तकधारिणीमभयदां साक्षस्त्रजं दक्षिणेभक्तेभ्या वरदानपेशलकरां Laghu Stotram कर्पूरकंदोज्ज्वलाम् ।उज्ज्रम्भाम्बुजपत्रकान्तिनयनां स्त्रिग्धप्रभालोकिनीं येत्वामंब न शीलयन्ति मनसा तेषां कवित्वं कुत: ।। 7 ।। ये त्वां पांडुरपुण्डरीकपटलस्पष्टाभिरामप्रभांसिंचंतीममृतद्रवैरिव शिरो ध्यायंति मूर्धि्न स्थिताम् ।अश्रातं विकटं स्फ्टाक्षरपदा निर्यान्ति वक्त्राम्बुजात्तेषांभारति भारती सुरसरित्कल्लोललोलोर्मय: ।। 8 ।। ये सिंदूरपरागपुंजपिहितां त्वत्तेजसा द्यामिमामुर्वींचापि विलीनयावकरसप्रस्तारमगनामिव ।पश्यन्ति क्षणमप्यनन्यमनसस्तेषामनंगज्वरक्लांतास्त्रस्तकुरंगदारकद्रशो वश्या भवानी ध्रुवम् ।। 9 ।। चंचत्कांचनकुण्डलांगदधरामाबद्धकांचिस्रजं ये त्वांचेतसि तदनतेक्षणमपि Laghu Stotram ध्यायन्ति कृत्वा स्थिराम् ।तेषां वेश्मसु विभ्रमादहरह:कारीभवंत्यश्र्चिरंमाद्यत्कुंजकर्णतालतरला: स्थैर्यं भजंति श्रिय: ।। 10 ।। आर्भक्याशशिखण्डमण्डित जटाजूटां न्रमुंडस्त्रजंबंधूकप्रसवारुणांबरधरां प्रेतासनाध्यासिनीम् ।त्वां ध्यायंति चतुर्भुजां Laghu Stotram त्रिनयनामापीनतुंगस्तनीं मध्येनिम्नवलित्रयांकिततनुं त्वद्रूपकं चिन्तये ।। 11 ।। जातोऽप्यल्पहरिच्छिदे क्षितिभुजां सामान्यमात्रे कुलेनि:शेषावनिचक्रवर्तिपदवीं लब्धवा प्रतापोन्नत: ।यद्विद्याधरवृन्दवन्दितपद: श्रीवत्सराजोभवद्देवित्वंचरणांबुजप्रणतित: सोऽयं प्रसादोदय: ।। 12 ।। चण्डी त्वंचरणाम्बुजार्चनकृते बिल्वीदलोल्लुण्ठनात्त्रुट्यत्कंटककोटिभि: परिचयं येषां न जग्मु: करा: ।ते दंडाकुशचक्रचापकुलिशश्रीवत्सवत्सांकितेर्जायन्तेपृथिवीभुज: कथमिवाम्भोजप्रभै: पाणिभि: ।। 13 ।। विप्रा: क्षोणिभुजो विशस्तदितरे क्षीराज्यमध्वासवैस्त्वांदेवि त्रिपुरे परां परकलां संतर्प्य पूजाविधौ ।यां यां प्रार्थयते मन: स्थिरधियां येषां त एव ध्रुवं तांतां सिद्धि मवापनुवन्ति तरसा विघ्नैरविघ्नीकृता: ।। 14 ।। शब्दानां जननि त्वमत्र भुवने वाग्वादिनोत्युच्यसेत्वत्त केशववासवप्रभृतयोप्याविर्भवन्ति ध्रुवम् ।लीयन्ते खलु यत्र कल्पवरिमे Laghu Stotram ब्रह्मादयस्तेऽप्यमी सात्वं काचिदचिन्त्यरूपगहना शक्ति: परा गीयसे ।। 15 ।। देवानां त्रितयं त्रयीहुतभुजां शक्तित्रयं त्रिस्वरास्त्रैलोक्यंत्रिपदी त्रिपुष्करमथो त्रिर्ब्रह्मकर्णास्त्रय: ।यत्किंचिंज्जगति त्रिधा नियमितं वस्तु त्रिवर्गादिकंतत्सर्व त्रिपुरेति नाम भगवत्यन्वेति ते सत्तवत: ।। 16 ।। लक्ष्मीं राजकुले जयं रणमुखे क्षेमकंरीमध्वनिक्रव्यादद्विपसर्पभाजि शबरीकांतारदुर्गे गिरौ ।भूतप्रेतपिशाचज्रम्भकभयं स्मृत्वा महाभैरवीं व्यामोहेत्रिपुरां तरन्ति विपदस्तारांचतां यत्प्लवे ।। 17 ।। या या कुण्डलिनी क्रिया मधुमती काली कलामालिनीमातंगी विजया जया भगवती देवी शिवा शाम्भवी ।शक्ति शंकरवल्लभा त्रिनयना Laghu Stotram वाग्वादिनी भैरवीह्रींकारी त्रिपुरा परापरमयी माता कुमारीत्यसि ।। 18 ।। आईपल्लवितै: परस्परयुतैर्द्वित्रिक्रमाद्यक्षरै: काद्यै:क्षान्तगतै: स्वरादिभिरथ क्षांतैश्र्च तै: सस्वरै: ।नामानि त्रिपुरे भवन्ति खलु या नित्यं तु गुह्यानि तेतेभ्यो भैरवपत्नि विंशतिसहस्त्रेभ्य: परेभ्यो नम: ।। 19 ।। बोद्धव्या निपुणं बुधै: स्तुतिरियं कृत्वा मनस्तदन्तंभारत्यास्त्रिपुरेत्यनन्यमनसा यत्राद्यवृत्ति: स्फुटम् ।एकद्वित्रिपदक्रमेण कथितस्तत्पादसंख्या-क्षरैर्मन्त्रोद्धारविधिर्विशेषसहित: सत्संप्रदायान्वित: ।। 20 ।। सावद्यं निरवद्यमस्तु यदि वा किंवाऽनया चिन्तयानूनं स्तोत्रमिदं पठिष्यति जनो यस्यास्ति भक्तिस्त्वयि ।संचिन्त्यापि लघुत्वमात्मनि दृढ संजायमानं हठात्वद्भक्त्यामुखरीकृतेन रचितं यत्स्यान्मयाऽपि ध्रुवम् ।। 21 ।। आनन्दोद्भवकम्पघूर्णंनयनं निद्राट्टहासादिकंवेदव्याकरणावगाहकवितातर्कोक्तिमुक्तिप्रदम् ।वश्याकर्षपुरप्रवेशनगरक्षोभादिसिद्धयष्टकं लघ्वाचार्यइदं करोति सततं सौभाग्यमारोग्यताम् ।। 22 ।। गौरि त्र्म्बकपत्नि पार्वति सति त्रैलोक्यगाने शिवेशर्वाणि त्रिपुरे भवानि वरदे रुद्राणि कात्यायनि ।भीमे भैरवि चण्डिसर्ववरदे कालेक्षये शूलिनि त्वत्पादप्रणतं ।। इति श्री लघु स्तोत्रम् संपूर्णम् ।।

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Annapurna Stotram

Sri Laghu Annapurna Stotram : श्री लघु अन्नपूर्णा स्तोत्र…..

श्री लघु अन्नपूर्णा स्तोत्र हिंदी पाठ : Sri Laghu Annapurna Stotram in Hindi भगवति भवरोगात् पीडितं दुष्कृतोत्यात् ।सुतदुहितृकलत्र उपद्रवेणानुयातम् ।विलसदमृतदृष्ट्या वीक्ष विभ्रान्तचित्तम् ।सकलभुवनमातस्त्राहि माम् ॐ नमस्ते ॥ १ ॥ माहेश्र्वरीमाश्रितकल्पवल्लीमहंभवोच्छेदकरीं भवानीम् ।क्षुधार्तजायातनयाद्दुपेतस्त्वान्नपूर्णे शरणं प्रपद्दे ॥ २ ॥ दारिद्र्यदावानलदह्यमानम्,पाह्यन्नपूर्णे गिरिराजकन्ये ।कृपाम्बुधौ मज्जय मां त्वदीये,त्वपादपद्मार्पितचित्तवृतिम् ॥ ३ ॥ दूत्थन्नपूर्णास्तुतिरत्नमेतत्,श्लोकत्रयं यः पठतीह भक्त्या ।तस्मै ददात्यन्नसमृद्धिमम्बा,श्रियं च विद्दां च यशश्र्च मुक्तिम् ॥ ४ ॥ ॥ इति श्री लघु अन्नपूर्णा स्तोत्र संपूर्णम् ॥ श्री लघु अन्नपूर्णा स्तोत्र विशेषताए: श्री लघु अन्नपूर्णा स्तोत्र के साथ-साथ यदि अन्नपूर्णा आरती का पाठ किया जाए तो, इस स्तोत्र का बहुत लाभ मिलता है, Annapurna Stotram यह अष्टकम शीघ्र ही फल देने लग जाते है| यदि साधक इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करने से बुराइया खुद- ब- खुद दूर होने लग जाती है Annapurna Stotram साथ ही सकरात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है| अपने परिवार जनों का स्वस्थ्य ठीक रहता है और लम्बे समय से बीमार व्यक्ति को इस स्तोत्र का पाठ सच्चे मन से करने पर रोग मुक्त हो जाता है| यदि मनुष्य जीवन की सभी प्रकार के भय, डर से मुक्ति चाहता है तो वह इस स्तोत्र का पाठ करे| श्री लघु अन्नपूर्णा स्तोत्र के पाठ के साथ साथ अन्नपूर्णा चालीसा  और अन्नपूर्णा अष्टकम का भी पाठ करने से मनोवांछित कामना पूर्ण होती है | Annapurna Stotram और नियमित रुप से करने से रुके हुए कार्य भी पूर्ण होने लगते है | और साधक के जीवन में रोग, भय, दोष, शोक, बुराइया, डर दूर हो जाते है साथ ही माँ अन्नपूर्ण की पूजा करने से आयु, यश, बल, और स्वास्थ्य में वृद्धि प्राप्त होती है। याद रखे इस श्री लघु अन्नपूर्णा स्तोत्र पाठ को करने से पूर्व अपना पवित्रता बनाये रखे| इससे मनुष्य को जीवन में बहुत अधिक लाभ प्राप्त होता है|

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