May 12, 2026

Sundari Stotram

Shri Tripura Sundari Stotram: श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्रम्….

Shri Tripura Sundari Stotram : श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्रम्: त्रिपुरसुंदरी एक देवी हैं, जो सुंदरता का प्रतीक हैं। माना जाता है कि उनकी आयु सोलह वर्ष है, और इसीलिए उन्हें ‘षोडशी’ (सोलह वर्ष की कन्या) के नाम से भी जाना जाता है। वह देवी शक्ति के उग्र रूप ‘काली’ का ही एक स्वरूप हैं; देवी शक्ति को पार्वती, दुर्गा और भगवती जैसे कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। ‘त्रिपुरा’ शब्द का अर्थ है तीन नगर या तीन लोक, जबकि ‘सुंदरी’ का अर्थ है सुंदर स्त्री। इस प्रकार, यह देवी ‘तीनों नगरों या तीनों लोकों की सुंदरता’ का प्रतीक हैं। उन्हें ‘महा त्रिपुरसुंदरी’, ‘ललिता’ और ‘राजराजेश्वरी’ के नाम से भी पुकारा जाता है; Sundari Stotram उन्हें ‘दस महाविद्याओं’ में सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण देवी माना जाता है। शाक्त संप्रदाय की ‘श्रीकुल’ परंपरा के अनुसार, त्रिपुरसुंदरी सभी महाविद्याओं में अग्रणी हैं और देवी ‘आदि पराशक्ति’ का सर्वोच्च स्वरूप हैं। ‘त्रिपुरा उपनिषद’ में उन्हें इस ब्रह्मांड की ‘परम शक्ति’ (ऊर्जा और सामर्थ्य) के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। उन्हें ‘परम चेतना’ के रूप में वर्णित किया गया है, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीनों देवताओं से भी परे है। Sundari Stotram ऐसा माना जाता है कि त्रिपुरसुंदरी, भगवान शिव के उस स्वरूप की गोद में विराजमान रहती हैं, Sundari Stotram जिन्हें ‘कामेश्वर’ (अर्थात् ‘इच्छाओं के स्वामी’) के नाम से जाना जाता है। त्रिपुरसुंदरी, शाक्त तांत्रिक परंपरा (जिसे ‘श्री विद्या’ के नाम से जाना जाता है) से जुड़ी हुई प्रमुख देवी भी हैं। इस देवी से जुड़ी एक पौराणिक कथा अत्यंत रोचक है। ‘भंडासुर’ नामक एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षस के अत्याचारों से त्रस्त होकर, सभी देवताओं ने ‘परम ब्रह्म’ (सर्वोच्च ईश्वर) की आराधना की। तब, वही परम सत्ता ‘महा कामेश्वर’ और ‘ललिता त्रिपुरसुंदरी’ के रूप में प्रकट हुई। Sundari Stotram तत्पश्चात्, उन्होंने समस्त देवी-देवताओं की रचना की; वहीं दूसरी ओर, त्रिपुरसुंदरी ने राक्षस भंडासुर का सामना किया, उसका संहार किया और इस संसार को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। ‘ललिता सहस्रनाम’ नामक पवित्र स्तोत्र में, जिसमें देवी के एक हज़ार नामों का वर्णन किया गया है, इसी कथा का उल्लेख मिलता है और उसमें देवी की महान महिमा का गुणगान किया गया है। श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्रम् के लाभ: त्रिपुरसुंदरी जितनी सुंदरता की प्रतीक हैं, Sundari Stotram उतनी ही वह करुणा और कृपा की भी साक्षात् मूर्ति हैं। उनकी आराधना करने से भक्तों को उनका दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होता है और उन्हें अनेक प्रकार के लाभों की प्राप्ति होती है। भक्तगण विवाह में विलंब, वैवाहिक जीवन की समस्याओं और कलह, संतानहीनता (बांझपन), दरिद्रता, ऋण (कर्ज) और विभिन्न प्रकार के दुर्भाग्य जैसी समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं। उन्हें बुध ग्रह के बुरे प्रभावों से भी सुरक्षा मिल सकती है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जिन लोगों को विवाह में देरी, गरीबी, कर्ज़ आदि समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें वैदिक नियमों के अनुसार इस ‘श्री त्रिपुरा सुंदरी स्तोत्र’ का नियमित रूप से पाठ करना चाहिए। श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्रम् हिंदी पाठ: Shri Tripura Sundari Stotram in Hindi कदंबवनचारिणीं मुनिकदम्बकादंविनीं,नितंबजितभूधरां सुरनितंबिनीसेविताम् ।नवंबुरुहलोचनामभिनवांबुदश्यामलां,त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये ॥ कदंबवनवासिनीं कनकवल्लकीधारिणीं,महार्हमणिहारिणीं मुखसमुल्लसद्वारुणींम् ।दया विभव कारिणी विशद लोचनी चारिणी,त्रिलोचन कुटुम्बिनी त्रिपुर सुंदरी माश्रये ॥ कदंबवनशालया कुचभरोल्लसन्मालया,कुचोपमितशैलया गुरुकृपालसद्वेलया ।मदारुणकपोलया मधुरगीतवाचालया ,कयापि घननीलया कवचिता वयं लीलया ॥ कदंबवनमध्यगां कनकमंडलोपस्थितां,षडंबरुहवासिनीं सततसिद्धसौदामिनीम् ।विडंवितजपारुचिं विकचचंद्रचूडामणिं ,त्रिलोचनकुटुंबिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये ॥ कुचांचितविपंचिकां कुटिलकुंतलालंकृतां ,कुशेशयनिवासिनीं कुटिलचित्तविद्वेषिणीम् ।मदारुणविलोचनां मनसिजारिसंमोहिनीं ,मतंगमुनिकन्यकां मधुरभाषिणीमाश्रये ॥ स्मरेत्प्रथमपुष्प्णीं रुधिरबिन्दुनीलांबरां,गृहीतमधुपत्रिकां मधुविघूर्णनेत्रांचलाम्‌ ।घनस्तनभरोन्नतां गलितचूलिकां श्यामलां,त्रिलोचनकुटंबिनीं त्रिपुरसुंदरीमाश्रये ॥ सकुंकुमविलेपनामलकचुंबिकस्तूरिकां ,समंदहसितेक्षणां सशरचापपाशांकुशाम् ।असेष जनमोहिनी मरूण माल्य भुषाम्बरा,जपाकुशुम भाशुरां जपविधौ स्मराम्यम्बिकाम ॥ पुरम्दरपुरंध्रिकां चिकुरबंधसैरंध्रिकां ,पितामहपतिव्रतां पटुपटीरचर्चारताम्‌ ।मुकुंदरमणीं मणिलसदलंक्रियाकारिणीं,भजामि भुवनांबिकां सुरवधूटिकाचेटिकाम् ॥ ।। इति श्री त्रिपुरसुंदरी स्तोत्रम् संपूर्णम् ।।

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Ghatikachala Hanumat

Sri Ghatikachala Hanumat Stotram : श्री घटिकाचल हनुमत्स्तोत्रम्

श्री घटिकाचल हनुमत्स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Sri Ghatikachala Hanumat Stotram in Hindi ब्रह्माण्डपुराणतः स्तोत्रं अतिपाटलवक्त्राब्जं धृतहेमाद्रिविग्रहम् ।आञ्जनेयं शङ्खचक्रपाणिं चेतसि धीमहि ॥ १ ॥ श्रीयोगपीठविन्यस्तव्यत्यस्तचरणाम्बुजम् ।दरार्यभयमुद्राक्षमालापट्टिकया युतम् ॥ २ ॥ पारिजाततरोर्मूलवासिनं वनवासिनम् ।पश्चिमाभिमुखं बालं नृहरेर्ध्यानसंस्थितम् ॥ ३ ॥ सर्वाभीष्टप्रदं नॄणां हनुमन्तमुपास्महे । नारद उवाच – स्थानानामुत्तमं स्थानं किं स्थानं वद मे पितः ।ब्रह्मोवाच ब्रह्मन् पुरा विवादोऽभून्नारायणकपीशयोः ॥ तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि सावधानमनाः शृणु ।एकमासाद्वरदः साक्षात् द्विमासाद्रङ्गनायकः ॥ १ ॥ मासार्धेन प्रवक्ष्यमि तथा वै वेङ्कटेश्वरः ।अर्धमासेन दास्यामि कृतं तु परमं शिवम् ॥ २ ॥ घटिकाचलसंस्थानाद्धटिकाचलवल्लभः ।हनुमानञ्जनासूनू रामभक्तो जितेन्द्रियः ॥ ३ ॥ घटिकादेव काम्यानां कामदाता भवाम्यहम् ।शङ्खचक्रप्रदो येन प्रदास्यामि हरेः पदम् ॥ ४ ॥ घटिकाचलसंस्थाने घटिकां वसते यदि ।स मुक्तः सर्वलोकेषु वायुपुत्रप्रसादतः ॥ ५ ॥ ब्रह्मतीर्थस्य निकटे राघवेन्द्रस्य सन्निधौ ।वायुपुत्रं समालोक्य न भयं विद्यते नरे ॥ ६ ॥ तस्माद्वायुसुतस्थानं पवित्रमतिदुलर्भम् ।पूर्वाब्धेः पश्चिमे भागे दक्षिणाब्धेस्तथोत्तरे ॥ ७ ॥ वेङ्कटाद्दक्षिणे भागे पर्वते घटिकाचले ।तत्रैव ऋषयः सर्वे तपस्तप्यन्ति सादरम् ॥ ८ ॥ पञ्चाक्षरमहामन्त्रं द्विषट्कं च द्विजातिनाम् ।नाममन्त्रं ततः श्रीमन् स्त्रीशूद्राणामुदाहृतम् ॥ ९ ॥ तत्र स्नात्वा ब्रह्मतीर्थे नत्वा तं वायुमन्दिरे ।वायुपुत्रं भजेन्नित्यं सर्वारिष्टविवर्जितः ॥ १०॥ सेवते मण्डलं नित्यं तथा वै ह्यर्धमण्डलम् ।वाञ्छितं विन्दते नित्यं वायुपुत्रप्रसादतः ।तस्मात्त्वमपि भोः पुत्र निवासं घटिकाचले ॥ ११ ॥ कथं वासः प्रकर्तव्यो घटिकाचलमस्तके ।केन मन्त्रेण बलवानाञ्जनेयः प्रसीदति ॥ १२ ॥ विधानं तस्य मन्त्रस्य होमं चैव विशेषतः ।कियत्कालं तत्र वासं कर्तव्यं तन्ममावद ॥ १३ ॥ ब्रह्मतीर्थे ततः स्नत्वा हनुमत्संमुखे स्थितः ।द्वादशाक्षरमन्त्रं तु नित्यमष्टसहस्रकम् ॥ १४ ॥ जपेन्नियमतः शुद्धस्तद्भक्तस्तु परायणः ।निराहारः फलाहारो ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः ॥ १५ ॥ मण्डलं तत्र वस्तव्यं भक्तियुक्तेन चेतसा ।ध्यानश्लोकं प्रवक्ष्यामि शृणु नारद तत्वतः ॥ १६ ॥ तमञ्जनानन्दनमिन्दुबिम्बनिभाननं सुन्दरमप्रमेयम् ।सीतासुतं सूक्ष्मगुणस्वदेहं श्रीरामपादार्पणचित्तवृत्तिम् ॥ १७ ॥ एवं ध्यात्वा सदा भक्त्या तत्पादजलजं मुदा ।चतुर्थांशेन होमं वा कर्तव्यं पायसेन च ॥ १८ ॥ विधिना विधियुक्तस्तु विदित्वा घटिकाचलम् ।जगाम जयमन्विच्छन्निन्द्रियाणां महामनाः ॥ १९ ॥ एवं नियमयुक्तः सन् यः करोति हरेः प्रियम् ।विजयं विन्दते देही वायुपुत्रप्रसादतः ॥ २० ॥ ।। इति श्री घटिकाचल हनुमत्स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ।।

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Pancharatnam Stotram

Sri Ganesha Pancharatnam Stotram: श्री गणेश पञ्चरत्नं स्तोत्र….

श्री गणेश पञ्चरत्नं स्तोत्र हिंदी पाठ: Sri Ganesha Pancharatnam Stotram in Hindi मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम् ।अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम् ॥ १ ॥ नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभास्वरं नमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्धरम् ।सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥ २ ॥ समस्तलोकशंकरं निरस्तदैत्यकुञ्जरं Pancharatnam Stotram दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम् ।कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥ ३ ॥ अकिंचनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्तिभाजनं पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम् ।प्रपञ्चनाशभीषणं धनंजयादिभूषणम् कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम् ॥ ४ ॥ नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजं अचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम् ।हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम् ॥ ५ ॥ महागणेशपञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात् ॥ ६ ॥ ॥ इति श्री गणेश पञ्चरत्नं स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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