December 2, 2024

Bihar Panchami:बिहार पंचमी,”माता लक्ष्मी के आगमन का शुभ पर्व”

Bihar Panchami:बिहार पंचमी 2024 का पावन पर्व इस वर्ष शुक्रवार, 6 दिसंबर 2024 को मनाया जाएगा। Bihar Panchami:विक्रम संवत 1562 में मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को स्वामी हरिदास की सघन-उपासना के फलस्वरूप वृंदावन के निधिवन में श्री बांके बिहारी जी महाराज का प्राकट्य हुआ। बिहारी जी के इस प्राकट्य उत्सव को बिहार पंचमी के नाम से जाना जाने लगा। बिहार पंचमी के दिन ठाकुर जी के बाल रूप को पीत वस्त्र, श्रृंगार हेतु स्वर्ण आभूषण, विभिन्न प्रकार के सुगंधित पुष्प, मेवा-युक्त हलवा-खीर एवं 56 भोग अर्पित किए जाते हैं। बिहार पंचमी के दिन श्री बांके बिहारी जी के प्राकट्य के साथ-साथ ही स्वामी हरिदास जी महाराज की बिहारीजी के प्रति अनन्य भक्ति को भी याद करने का दिन है। स्वामी हरिदास जी का संक्षिप्त परिचय – विक्रम संवत 1560 में स्वामी हरिदास अपने पिता श्री आशुघीर जी से युगल-मंत्र की दीक्षा लेकर विरक्त होकर वृंदावन चले आए और यमुना-तट के सधन वन-प्रान्तर में जिस स्थान को अपनी साधना का केंद्र बनाया, आज यह स्थान निधिवन के नाम से विख्यात है। निधिवन की सघन कुंजें स्वामी हरिदास जी महाराज के मधुर गायन से गूँज उठीं। Bihar Panchami:बिहार पंचमी: माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्ति का शुभ पर्व Bihar Panchami:बिहार पंचमी हिंदू धर्म का एक पवित्र पर्व है, जो हर साल मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन को विशेष रूप से माता लक्ष्मी की उपासना के लिए जाना जाता है, जो धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी मानी जाती हैं। बिहार पंचमी का पर्व देश के कई हिस्सों में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है, लेकिन यह खासतौर पर बिहार और उत्तर प्रदेश में अत्यंत लोकप्रिय है। Bihar Panchami:बिहार पंचमी का महत्व Bihar Panchami:बिहार पंचमी का दिन देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने और उनके आशीर्वाद से जीवन में सुख-समृद्धि लाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यह दिन उन लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है जो अपने जीवन में आर्थिक स्थिरता और खुशहाली की कामना करते हैं। माना जाता है कि इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा करने से न केवल धन-धान्य की वृद्धि होती है, बल्कि परिवार में सुख-शांति का भी वास होता है। यह पर्व व्यापारियों और व्यवसायियों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे इस दिन अपने व्यवसाय में सफलता और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। Bihar Panchami:बिहार पंचमी की पौराणिक कथा Bihar Panchami:पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को समर्पित किया और उनके साथ आनंदमय जीवन की शुरुआत की। कहा जाता है कि मार्गशीर्ष माह की पंचमी तिथि को देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। इसलिए, इस दिन को उनकी पूजा और उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। Bihar Panchami:बिहार पंचमी की पूजा विधि बिहार पंचमी का सांस्कृतिक महत्व बिहार पंचमी का पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी बेहद खास है। इस दिन लोग एक-दूसरे के घरों में जाकर शुभकामनाएं देते हैं। कई जगहों पर सामूहिक भजन-कीर्तन और भंडारे का आयोजन भी किया जाता है। बिहार पंचमी पर मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है, और श्रद्धालु बड़ी संख्या में देवी लक्ष्मी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इस दिन नई फसल का पहला अंश देवी को अर्पित करते हैं, जिससे उनकी कृपा बनी रहे। वर्तमान समय में बिहार पंचमी का महत्व आज के आधुनिक युग में भी बिहार पंचमी का महत्व कम नहीं हुआ है। लोग इस दिन अपने घरों और व्यापारिक स्थलों को सजाते हैं, ताकि देवी लक्ष्मी का आगमन हो सके। ऑनलाइन माध्यम से भी लोग पूजा-अर्चना का आयोजन करते हैं। कई व्यवसायी इस दिन अपने नए कार्यों की शुरुआत करते हैं, जैसे दुकान या कार्यालय का उद्घाटन। डिजिटल युग में बिहार पंचमी के पर्व ने आध्यात्मिकता और भक्ति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। बिहार पंचमी और समाज सेवा इस पर्व पर लोग जरूरतमंदों को दान-पुण्य करते हैं। अन्नदान, वस्त्रदान, और धन का दान बिहार पंचमी के शुभ अवसर पर अत्यधिक पुण्यदायक माना जाता है। निष्कर्ष बिहार पंचमी का पर्व माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का सुनहरा अवसर है। यह न केवल धन और समृद्धि की कामना को पूरा करता है, बल्कि समाज में एकता, प्रेम, और करुणा का संदेश भी देता है। ऐसे शुभ अवसर पर हमें न केवल अपने परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, बल्कि समाज के हर वर्ग की भलाई का ध्यान रखना चाहिए। आप भी इस बिहार पंचमी पर माता लक्ष्मी की पूजा करके उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को सुख-समृद्धि और शांति से भर सकते हैं। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य है और सटीक है। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Vivah Panchami:विवाह पंचमी,”प्रभु श्रीराम और माता सीता के पवित्र मिलन का पर्व”

Vivah Panchami:विवाह पंचमी भगवान श्री राम और माता सीता की शादी की सालगिरह के रूप में मनाए जाने वाले एक लोकप्रिय हिंदू त्यौहार है। हिंदू पंचांग के अनुसार, विवाह पंचमी मार्गशीर्ष के महीने के दौरान शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन मनाया जाता है। किसी भी हिंदू शादी के समान, विवाह पंचमी त्योहार कई दिनों पहले शुरू हो जाया करता है। सभी भक्त पूर्ण अनुग्रह, भक्ति और समर्पण के साथ इस अनुष्ठान का आनंद लेते हैं। विवाह पंचमी उत्सव के दिन भक्त विवाह के मंगल गीत तथा श्री राम भजन का गायन घर एवं मंदिरों में सामूहिक रूप से करते हैं। विवाह पंचमी के ही दिन वृंदावन के निधिवन में श्री बांके बिहारी जी महाराज का प्राकट्य उत्सव, Vivah Panchami बिहार पंचमी भी मनाया जाता है। Vivah Panchami:विवाह पंचमी कब है? पंचांग के अनुसार, 05 दिसंबर 2024 को दोपहर 12:49 पीएम पर मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष कीी पंचमी तिथि शुरुआत होगी और 06 दिसंबर 2024 को दोपहर 12:07 बजे समापन होगा। इसलिए उदयातिथि के अनुसार, 06 दिसंबर को Vivah Panchami विवाह पंचमी मनाई जाएगी। विवाह पंचमी के दिन ध्रुव योग,रवि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का शुभ संयोग बन रहा है। इससे इस दिन पूजा-आराधना का महत्व कहीं अधिक बढ़ जाता है। Vivah Panchami:पूजाविधि Vivah Panchami विवाह पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठें। स्नानादि के बाद स्वच्छ कपड़े पहनें। एक छोटी चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और माता सीता और भगवान राम की प्रतिमा स्थापित करें। अब उन्हें लाल या पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें। माता सीता को श्रृंगार की सामग्री अर्पित करेंष विधि-विधान से पूजा करें और भगवान राम और मां सीता को पीले रंग के फूल अर्पित करें। प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाएं। उन्हें फल,फूल,धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करें। अंत में माता सीता और प्रभु श्रीराम की आरती उतारें। दान सामग्री- मैरिड लाइफ को खुशहाल बनाने के लिए विवाह पंचमी के दिन पालकी, कौड़ी, श्रृंगार सामग्री,गरीबों और जरुरतमंदो को कपड़े, अनाज और मिठाई का दान कर सकते हैं। Vivah Panchami:विवाह पंचमी का महत्व: त्रेता युग में भगवान राम का माता सीता संग विवाह संपन्न हुआ था। विवाह पंचमी के दिन बड़े धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ माता सीता और भगवान राम का विवाह वर्षगांठ मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन मां सीता और भगवान राम की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है। मैरिज में आ रही सभी परेशानियों से छुटकारा मिलता है और जीवन में सुख-समृद्धि और खुशियों का आगमन होता है। विवाह पंचमी कैसे मनाई जाती है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विवाह पंचमी के दिन भगवान राम और माता सीता का विवाह हुआ था। इसलिए विवाह पंचमी को भगवान राम और माता सीता की विवाह वर्षगांठ के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि यह वही शुभ दिन है जब तुलसीदास जी ने रामचरितमानस को पूरा किया था। ❀ विवाह पंचमी के दिन श्री राम और माता सीता का विवाह अनुष्ठान करें।❀ माता सीता और राम जी की तस्वीर स्थापित करें और उन्हें माला पहनाएं।❀ अगर कुंवारी कन्याएं ॐ जानकी वल्लभाय नमः मंत्र का जाप 108 बार करें तो उन्हें राम जी जैसा सुयोग्य वर मिलता है।❀ इस दिन माता जानकी और राम जी की विवाह कथा सुनने का भी विधान है।❀ इस अवसर पर मंदिरों में भव्य आयोजन किये जाते हैं। लोग घर पर भी पूजा का आयोजन करते हैं। Vivah Panchami:विवाह पंचमी के दिन विवाह नहीं किया जाता है हिन्दू धर्म मैं भगवान राम और माता सीता की जोड़ी आदर्श जोड़ी मानी जाती है। भारतीय समाज में विवाहित महिलाओं को राम-सीता की तरह ही आशीर्वाद दिया जाता है। भगवान राम और माता सीता की कड़ी मेहनत की कहानी आज भी हर किसी को सुनाई जाती है। लेकिन फिर भी इनकी लग्न तिथि पर विवाह करना अशुभ माना जाता है। दरअसल, इसके पीछे का कारण यह है कि विवाह के बाद भगवान राम और माता सीता के जीवन में कई परेशानियां आईं। इन दोनों ने 14 वर्ष वनवास में भी बिताए। इसके अलावा माता सीता को भी अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ा। धार्मिक ग्रंथो के अनुसार भगवान राम ने सामाजिक मान्यताओं और अपने निष्पक्ष सिद्धांतों के कारण गर्भवती माता सीता का त्याग कर दिया था। जिसके बाद माता सीता ने अपना आगे का जीवन अकेले ही जंगल में बिताया। उन्होंने अकेले ही अपने बच्चों का पालन-पोषण किया। राम और सीता के वैवाहिक जीवन में इतने संघर्षों को देखते हुए ये लोग यह त्यौहार तो मनाते हैं लेकिन इस दिन अपने बच्चों की शादी नहीं करते हैं। ऐसा इसलिए ताकि उनके बच्चों को उतना कष्ट न सहना पड़े जितना भगवान राम और माता सीता को सहना पड़ा।

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Annapurna Vrat:अन्नपूर्णा व्रत,”समृद्धि और संतोष का मार्ग”

Annapurna Vrat:मां अन्नपूर्णा माता का महाव्रत मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष पंचमी से प्रारम्भ होता है और मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी को समाप्त होता है। यह उत्तमोत्तम व्रत सत्रह दिनों तक चलने वाला व्रत है। व्रत के प्रारंभ के साथ भक्त 17 गांठों वाले धागे का धारण करते हैं। इस अति कठोर महाव्रत में व्रती 17 दिन तक अन्न का त्याग करते हैं। फलाहार भी एक ही वक्त किया जाता है। इस वर्ष यह व्रत 6 दिसंबर 2024, शुक्रवार को पड़ रहा है। Annapurna Vrat:कई भक्त इस व्रत को 21 दिन तक भी पालन करते हैं, इस मान्यता के अनुसार व्रत मार्गशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा से प्रारंभ होकर मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी को समापन होता है। Annapurna Vrat:मां अन्नपूर्णा माता का व्रत करने का पूजन विधि❀ अन्नपूर्णा माता के व्रत के दिनों प्रातः जल्दी उठकर स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।❀ इस प्रकर से सोलह दिन तक माता अन्नपूर्णा की कथा का श्रवण करें व डोरे का पूजन करें। फिर जब सत्रहवाँ दिन आये (मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की षष्ठी) को व्रत करनेवाला सफेद वस्त्र और स्त्री लाल वस्त्र धारण करें। रात्रि में पूजास्थल में जाकर धान के पौधों से एक कल्पवृक्ष बनाकर स्थापित करें और उस वृक्ष के नीचे भगवती अन्नपूर्णा की दिव्य मूर्ति स्थापित करें। ❀ पूरे घर और रसोई, चूल्हे की अच्छे से साफ-सफाई करें और गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें।❀ खाने के चूल्हे पर हल्दी, कुमकुम, चावल पुष्प अर्पित करें। धूप दीप प्रज्वलित करें।❀ इसके साथ ही माता पार्वती और शिव जी की पूजा करें। माता पार्वती ही अन्नपूर्णा हैं।❀ विधिवत् पूजा करने के बाद माता से प्रार्थना करें कि हमारे घर में हमेशा अन्न के भंडारे भरे रहें मां अन्नपूर्णा हमपर और पूरे परिवार एवं समस्त प्राणियों पर अपनी कृपा बनाए रखें।❀ इन् दिनों मैं अन्न का दान करें जरूरतमंदो को भोजन करवाएं। Annapurna Vrat:इस व्रत में अगर व्रत न कर सकें तो एक समय भोजन करके भी व्रत का पालन किया जा सकता है। इस व्रत में सुबह घी का दीपक जला कर माता अन्नपूर्णा की कथा पढ़ें और भोग लगाएं ।अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकर प्राण वल्लभे ।ज्ञान वैराग्य सिध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥माता च पार्वति देवी पिता देवो महेश्वरः ।बान्धवा शिव भक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥ Annapurna Vrat:व्रत के दिनों में आहारव्रती को निम्न खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिये- मूँग की दाल,चावल, जौ का आटा,अरवी, केला, आलू, कन्दा,मूँग दाल का हलवा । इस व्रत में नमक का सेवन नहीं करना चाहिये। Annapurna Vrat:अन्नपूर्णा व्रत की पूजा विधि: अन्नपूर्णा व्रत का महत्व: क्या आप इस व्रत की कथा या अन्य जानकारी भी चाहते हैं?

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Vilakku Pooja:विलक्कु पूजा,”विलक्कु पूजा: दीप साधना से समृद्धि और सुख-शांति का मार्ग”

Vilakku Pooja:विलक्कु पूजा, भाग्य और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी का प्रतीक है। एक समय में बड़ी संख्या में महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से महालक्ष्मी की पूजा दीप जलाकर किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है और दुनिया में शांति आती है। थिरु विलक्कु पूजा, ज्यादातर शुक्रवार को या तो सुबह या शाम को दीपक जलाकर की जाती है। यह मुख्य रूप से तमिल महीनों, चिथिरई और वैगासी के दौरान की जाती है, और यह पवित्र दीप पूजा अमावस और पूर्णिमा के दिनों में भी की जा सकती है। Vilakku Pooja:कुथु विलक्कू क्या होता है Vilakku Pooja:कुथु विलक्कू का मतलब है खड़ा हुआ तेल का दीपक, जो कि अज्ञानता को दूर करने और हमारे भीतर दिव्य प्रकाश के जागरण का प्रतीक है। Vilakku Pooja:विलक्कु पूजा कौन करता है? Vilakku Pooja:दक्षिण भारत – तमिलनाडु में, अधिकांश गृहिणियां इस तिरुविलक्कू पूजा को 108 जाप के साथ घर पर नियमित रूप से करतीं हैं। दीपक की मंद-मंद चमक मंदिर तथा मंदिर के कमरे को रोशन करती है, जिससे वातावरण शुद्ध और निर्मल रहता है। Vilakku Pooja:विलक्कु पूजा क्यों की जाती है? दक्षिण भारतीय हिंदुओं के घरों में थिरु-विलक्कू प्रतिदिन जलाया जाता है, क्योंकि थिरु-विलक्कू को माँ महालक्ष्मी का रूप माना जाता है, जो भाग्य और धन की देवी हैं। दिव्य मां लक्ष्मी देवी की कृपा पाने के लिए महिला भक्तों द्वारा थिरुविलक्कू पूजा की जाती है। यह पूजा परिवार के सदस्यों की भलाई के लिए की जाती है और यह प्रत्येक सदस्य के लिए अच्छाई लाती है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग ईमानदारी से मंदिरों में दीया जलाकर थिरु विलक्कू पूजा करते हैं, मां महालक्ष्मी भी उस शुभ कार्यक्रम में उपस्थित होंगी, और वह दीप पूजा में भाग लेने वालों को आशीर्वाद देती हैं। Vilakku Pooja:विलक्कु पूजा कैसे करें? ❀ इस पूजा की शुरुआत से पहले, पवित्र दीपक को अच्छी तरह से साफ किया जाना चाहिए, और इसकी पवित्रता बढ़ाने के लिए इसे हल्दी और कुमकुम लगाया जाता है।❀ भोग के लिए पवित्र प्रसाद भी तैयार कर सकते हैं जो माँ लक्ष्मी के लिए पसंदीदा मानी जाती हैं, जैसे कि शुद्ध गाय के घी से बनी मिठाई, मक्खन से बने प्रसाद और फल। और इसे देवी माँ लक्ष्मी को अर्पित करना चाहिए। ❀ पूजा संपन्न होने के बाद गायों को प्रसाद का सामान भी चढ़ा सकते हैं।❀ सामान्य तौर पर, यह पूजा विवाहित महिलाओं द्वारा अपनी पति की लंबी उम्र के लिए की जाती है।❀ इस पवित्र दीप पूजा के प्रदर्शन का विवरण हमारे हिंदू धर्म के कुछ पवित्र ग्रंथों में भी मिलता है। ॐ मां लक्ष्मी देवी नमः संबंधित जानकारियाँ आवृत्ति साप्ताहिक समय 1 दिन शुरुआत तिथि शुक्रवार मंत्र ॐ मां लक्ष्मी देवी नमः कारण माता लक्ष्मी उत्सव विधि मंदिर में प्रार्थना, घर में पूजा, समूह प्रार्थना महत्वपूर्ण जगह दक्षिण भारत थिरु विलक्कु पूजा  हर शुक्रवार को शाम की आरती के बाद  की जाती है । पूजा, विलक्कु पूजा (दीप-पूजा) पूरे तमिल समाज में महिलाओं के बीच प्रचलित है और आमतौर पर समूहों में की जाती है। यह सामूहिक पूजा तमिलनाडु के सैकड़ों गांवों और शहरों में होती है। महिलाओं के समूह, अक्सर 108, या 1008, या यहां तक ​​कि एक समय में 10008 थिरुविलक्कु, मंदिरों में अपने पवित्र दीपों की एक साथ पूजा करने के लिए इकट्ठा होते हैं। ‘थिरु-विलक्कु’ या ‘कुथु-विलक्कु’ एक कलात्मक रूप से तैयार किया गया दीपक (संस्कृत में दीपा) है, जिसका दक्षिण भारतीय घरों में मंदिरों में स्थान है। यह सौभाग्य और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी का प्रतीक है। थिरुविलक्कु पूजा का उद्देश्य एक समय में बड़ी संख्या में महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से महालक्ष्मी की पूजा करना है। ऐसा कहा जाता है कि इससे घर में समृद्धि और दुनिया में शांति आती है। यह मुख्य रूप से महिला के परिवार की भलाई के लिए किया जाता है; यह प्रत्येक सदस्य के लिए सभी शुभ चीजें लाता है। साईं महालक्ष्मी दीपक जलाते ही किसी के भी घर आ जाती हैं और उनकी हर इच्छा पूरी करती हैं!

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Margashirsha Vinayak Chaturthi:मार्गशीर्ष विनायक चतुर्थी

Vinayak Chaturthi:गणेश चतुर्थी व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन गणेश जी की विशेष पूजा की जाती है। पंचांग के अनुसार हर महीने दो चतुर्थी आती हैं। एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। हर महीने पड़ने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जबकि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है। Vinayak Chaturthi 2024 : दिसंबर महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के नाम से जाना जाएगा। इस दिन संध्या में व्रती चंद्रमा को अर्घ्य देंगी और भगवान गणेश और चन्द्र देव की पूजा करेंगी। सभी देवताओं में गणेश जी का स्थान सर्वोपरि है। गणेश जी को सभी परेशानियों और बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है। भगवान गणेश की नियमित पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है। Vinayak Chaturthi:विनायक चतुर्थी कब है? पंचांग के अनुसार, कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि दिसम्बर 04 को प्रारम्भ होगी दोपहर 1:10 मिनट पर। तिथि का समापन 5 दिसम्बर को दोपहर 12:49 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार, 5 दिसम्बर को विनायक चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा। Vinayak Chaturthi:विनायक चतुर्थी पूजा विधि कैसे करें:मान्यता के अनुसार चतुर्थी तिथि की पूजा दोपहर के समय करनी चाहिए। क्योंकि शाम के समय चंद्रमा को नहीं देखना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा को देखने से झूठा कलंक लगता है। मान्यता के अनुसार द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने विनायक चतुर्थी की रात को चंद्रमा देखा था, जिसके बाद उन्हें स्यामंतक मणि चोरी करने के लिए झूठा कलंक लगाया गया था। इस दिन प्रात:काल स्नान कर व्रत का संकल्प लें और पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र कर पूजा प्रारंभ करें। भगवान गणेश को पीले फूलों की माला अर्पित करने के बाद धूप-दीप, नैवेद्य, अक्षत और उनकी प्यारी दूर्वा घास अर्पित करें। इसके बाद मिठाई या मोदक का भोग लगाएं। अंत में व्रत कथा पढ़कर गणेश जी की आरती करें। मान्यता के अनुसार भगवान गणेश को सिंदूर बहुत प्रिय होता है इसलिए Vinayak Chaturthi विनायक चतुर्थी के दिन पूजा के समय गणेश जी को लाल रंग के सिंदूर का तिलक लगाएं। सिंदूर चढ़ाते समय निम्न मंत्र का जाप करें-सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् ।शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥ Vinayak Chaturthi:पूजा-विधि 1- भगवान गणेश जी का जलाभिषेक करें 2- गणेश भगवान को पुष्प, फल चढ़ाएं और पीला चंदन लगाएं 3- मोदक का भोग लगाएं 4- मार्गशीर्ष विनायक चतुर्थी व्रत की कथा का पाठ करें 5- ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का जाप करें 6- पूरी श्रद्धा के साथ गणेश जी की आरती करें 7- चंद्रमा के दर्शन करें और अर्घ्य दें 8- व्रत का पारण करें 9- क्षमा प्रार्थना करें मंत्र– ॐ गणेशाय नमः Vinayak Chaturthi:गणेश जी की आरती जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी। माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥ जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ पान चढ़े फल चढ़े, और चढ़े मेवा। लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥ जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया। बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥ जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी। कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी॥ जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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