March 2022

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहते है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। वैसे इस एकादशी के कई अन्य नाम भी है जैसे की – जलझूलनी एकादशी, वामन एकादशी, डोल ग्यारस आदि। इस कथा को स्वयं श्री कृष्ण ने पांडवों को सुनाई थी। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! अब तुम समस्त पापों का शमन करने वाली इस कथा का ध्यानपूर्वक श्रवण करो। त्रेतायुग में बलि नाम का एक असुर था। वह अत्यन्त भक्त, दानी, सत्यवादी तथा ब्राह्मणों की सेवा करने वाला था। वह सदा यज्ञ, तप आदि किया करता था। अपनी इसी भक्ति के प्रभाव से वह स्वर्ग में देवेन्द्र के स्थान पर राज्य करने लगा। देवराज इन्द्र तथा अन्य देवता इस बात को सहन नहीं कर सके और भगवान श्रीहरि के पास जाकर प्रार्थना करने लगे। अन्त में मैंने वामन रूप धारण किया और तेजस्वी ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि पर विजय प्राप्त की।” यह सुनकर अर्जुन ने कहा- “हे लीलापति! आपने वामन रूप धारण करके उस बलि को किस प्रकार जीता, कृपा कर यह सब विस्तारपूर्वक बताइये।” भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “मैंने वामन रूप धारण करके राजा बलि से याचना की- हे राजन! तुम मुझे तीन पग भूमि दान दे दो, इससे तुम्हें तीन लोक के दान का फल प्राप्त होगा। राजा बलि ने इस छोटी-सी याचना को स्वीकार कर लिया और भूमि देने को तैयार हो गया। जब उसने मुझे वचन दे दिया, तब मैंने अपना आकार बढ़ाया और भूलोक में पैर, भुवन लोक में जंघा, स्वर्ग लोक में कमर, महलोक में पेट, जनलोक में हृदय, तपलोक में कण्ठ और सत्यलोक में मुख रखकर अपने शीर्ष को ऊँचा उठा लिया। उस समय सूर्य, नक्षत्र, इन्द्र तथा अन्य देवता मेरी स्तुति करने लगे। तब मैंने राजा बलि से पूछा कि हे राजन! अब मैं तीसरा पग कहाँ रखूँ। इतना सुनकर राजा बलि ने अपना शीर्ष नीचे कर लिया। तब मैंने अपना तीसरा पग उसके शीर्ष पर रख दिया और इस प्रकार देवताओं के हित के लिए मैंने अपने उस असुर भक्त को पाताल लोक में पहुँचा दिया तब वह मुझसे विनती करने लगा। तब मैने उससे कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा

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शुक्रवार संतोषी माता व्रत कथा (Shukravar Santoshi Mata Vrat Katha)

शुक्रवार के दिन माँ संतोषी का व्रत-पूजन किया जाता है। इस पूजा के दौरान माता की आरती, पूजन तथा अंत में माता की कथा सुनी जाती है। आइए जानें! शुक्रवार के दिन की जाने वाली संतोषी माता व्रत कथा..संतोषी माता व्रत कथा-एक बुढ़िया थी, उसके सात बेटे थे। 6 कमाने वाले थे जबकि एक निक्कमा था। बुढ़िया छहों बेटों की रसोई बनाती, भोजन कराती और उनसे जो कुछ जूठन बचती वह सातवें को दे देती। एक दिन वह पत्नी से बोला- देखो मेरी माँ को मुझ पर कितना प्रेम है।वह बोली- क्यों नहीं, सबका झूठा जो तुमको खिलाती है।वह बोला- ऐसा नहीं हो सकता है। मैं जब तक आँखों से न देख लूं मान नहीं सकता।बहू हंस कर बोली- देख लोगे तब तो मानोगे। कुछ दिन बाद त्यौहार आया। घर में सात प्रकार के भोजन और चूरमे के लड्डू बने। वह जांचने को सिर दुखने का बहाना कर पतला वस्त्र सिर पर ओढ़े रसोई घर में सो गया। वह कपड़े में से सब देखता रहा। छहों भाई भोजन करने आए। उसने देखा, माँ ने उनके लिए सुन्दर आसन बिछा नाना प्रकार की रसोई परोसी और आग्रह करके उन्हें जमाया। वह देखता रहा। छहों भोजन करके उठे तब माँ ने उनकी झूठी थालियों में से लड्डुओं के टुकड़े उठाकर एक लड्डू बनाया। जूठन साफ कर बुढ़िया माँ ने उसे पुकारा- बेटा, छहों भाई भोजन कर गए अब तू ही बाकी है, उठ तू कब खाएगा।वह कहने लगा- माँ मुझे भोजन नहीं करना, मैं अब परदेश जा रहा हूँ।माँ ने कहा- कल जाता हो तो आज चला जा।वह बोला- हाँ आज ही जा रहा हूँ। यह कह कर वह घर से निकल गया। सातवें बेटे का परदेश जाना-चलते समय पत्नी की याद आ गई। वह गौशाला में कण्डे (उपले) थाप रही थी।वहाँ जाकर बोला-हम जावे परदेश आवेंगे कुछ काल,तुम रहियो संतोष से धर्म आपनो पाल।वह बोली-जाओ पिया आनन्द से हमारो सोच हटाय,राम भरोसे हम रहें ईश्वर तुम्हें सहाय।दो निशानी आपन देख धरूं में धीर,सुधि मति हमारी बिसारियो रखियो मन गम्भीर। वह बोला- मेरे पास तो कुछ नहीं, यह अंगूठी है सो ले और अपनी कुछ निशानी मुझे दे। वह बोली- मेरे पास क्या है, यह गोबर भरा हाथ है। यह कह कर उसकी पीठ पर गोबर के हाथ की थाप मार दी। वह चल दिया, चलते-चलते दूर देश पहुँचा। परदेश मे नौकरी-वहाँ एक साहूकार की दुकान थी। वहाँ जाकर कहने लगा- भाई मुझे नौकरी पर रख लो।साहूकार को जरूरत थी, बोला- रह जा।लड़के ने पूछा- तनखा क्या दोगे।साहूकार ने कहा- काम देख कर दाम मिलेंगे। साहूकार की नौकरी मिली, वह सुबह 7 बजे से 10 बजे तक नौकरी बजाने लगा। कुछ दिनों में दुकान का सारा लेन-देन, हिसाब-किताब, ग्राहकों को माल बेचना सारा काम करने लगा। साहूकार के सात-आठ नौकर थे, वे सब चक्कर खाने लगे, यह तो बहुत होशियार बन गया। सेठ ने भी काम देखा और तीन महीने में ही उसे आधे मुनाफे का हिस्सेदार बना लिया। वह कुछ वर्ष में ही नामी सेठ बन गया और मालिक सारा कारोबार उसपर छोड़कर चला गया। पति की अनुपस्थिति में सास का अत्याचार-इधर उसकी पत्नी को सास ससुर दु:ख देने लगे, सारी गृहस्थी का काम कराके उसे लकड़ी लेने जंगल में भेजते। इस बीच घर के आटे से जो भूसी निकलती उसकी रोटी बनाकर रख दी जाती और फूटे नारियल की नारेली में पानी। एक दिन वह लकड़ी लेने जा रही थी, रास्ते में बहुत सी स्त्रियां संतोषी माता का व्रत करती दिखाई दी। संतोषी माता का व्रत-वह वहाँ खड़ी होकर कथा सुनने लगी और पूछा- बहिनों तुम किस देवता का व्रत करती हो और उसके करने से क्या फल मिलता है। यदि तुम इस व्रत का विधान मुझे समझा कर कहोगे तो मैं तुम्हारा बड़ा अहसान मानूंगी। तब उनमें से एक स्त्री बोली- सुनो, यह संतोषी माता का व्रत है। इसके करने से निर्धनता, दरिद्रता का नाश होता है और जो कुछ मन में कामना हो, सब संतोषी माता की कृपा से पूरी होती है। तब उसने उससे व्रत की विधि पूछी। संतोषी माता व्रत विधि-वह भक्तिनि स्त्री बोली- सवा आने का गुड़ चना लेना, इच्छा हो तो सवा पांच आने का लेना या सवा रुपए का भी सहूलियत के अनुसार लाना। बिना परेशानी और श्रद्धा व प्रेम से जितना भी बन पड़े सवाया लेना। प्रत्येक शुक्रवार को निराहार रह कर कथा सुनना, इसके बीच क्रम टूटे नहीं, लगातार नियम पालन करना, सुनने वाला कोई न मिले तो धी का दीपक जला उसके आगे या जल के पात्र को सामने रख कर कथा कहना। जब कार्य सिद्ध न हो नियम का पालन करना और कार्य सिद्ध हो जाने पर व्रत का उद्यापन करना। तीन मास में माता फल पूरा करती है। यदि किसी के ग्रह खोटे भी हों, तो भी माता वर्ष भर में कार्य सिद्ध करती है, फल सिद्ध होने पर उद्यापन करना चाहिए बीच में नहीं। उद्यापन में अढ़ाई सेर आटे का खाजा तथा इसी परिमाण से खीर तथा चने का साग करना। आठ लड़कों को भोजन कराना, जहाँ तक मिलें देवर, जेठ, भाई-बंधु के हों, न मिले तो रिश्तेदारों और पास-पड़ोसियों को बुलाना। उन्हें भोजन करा यथा शक्ति दक्षिणा दे माता का नियम पूरा करना। उस दिन घर में खटाई न खाना। यह सुन बुढ़िया के लड़के की बहू चल दी। व्रत का प्रण करना और माँ संतोषी का दर्शन देना-रास्ते में लकड़ी के बोझ को बेच दिया और उन पैसों से गुड़-चना ले माता के व्रत की तैयारी कर आगे चली और सामने मंदिर देखकर पूछने लगी- यह मंदिर किसका है।सब कहने लगे संतोषी माता का मंदिर है, यह सुनकर माता के मंदिर में जाकर चरणों में लोटने लगी। दीन हो विनती करने लगी- माँ मैं निपट अज्ञानी हूँ, व्रत के कुछ भी नियम नहीं जानती, मैं दु:खी हूँ। हे माता ! जगत जननी मेरा दु:ख दूर कर मैं तेरी शरण में हूँ। माता को दया आई- एक शुक्रवार बीता कि दूसरे को उसके पति का पत्र आया और तीसरे शुक्रवार को उसका भेजा हुआ पैसा आ पहुँचा। यह देख जेठ-जिठानी मुंह सिकोडऩे लगे।लड़के ताने देने लगे- काकी के पास पत्र आने लगे, रुपया आने लगा, अब तो काकी की खातिर बढ़ेगी।बेचारी सरलता से कहती- भैया कागज आवे रुपया आवे हम सब के लिए अच्छा है। ऐसा

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अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा | बृहस्पतिदेव की कथा (Shri Brihaspatidev Ji Vrat Katha)

॥ अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा ॥भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा राज्य करता था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती, न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी।एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे, तो रानी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा माँगी रानी ने भिक्षा देने से इन्कार किया और कहा: हे साधु महाराज मैं तो दान पुण्य से तंग आ गई हूँ। मेरा पति सारा धन लुटाते रहिते हैं। मेरी इच्छा है कि हमारा धन नष्ट हो जाए फिर न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। साधु ने कहा: देवी तुम तो बड़ी विचित्र हो। धन, सन्तान तो सभी चाहते हैं। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर भी होने चाहिए। यदि तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखों को भोजन दो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, मुसाफिरों के लिए धर्मशालाएं खुलवाओ। जो निर्धन अपनी कुंवारी कन्याओं का विवाह नहीं कर सकते उनका विवाह करा दो। ऐसे और कई काम हैं जिनके करने से तुम्हारा यश लोक-परलोक में फैलेगा। परन्तु रानी पर उपदेश का कोई प्रभाव न पड़ा। वह बोली: महाराज आप मुझे कुछ न समझाएं। मैं ऐसा धन नहीं चाहती जो हर जगह बाँटती फिरूं। साधु ने उत्तर दिया यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तथास्तु! तुम ऐसा करना कि बृहस्पतिवार को घर लीपकर पीली मिट्‌टी से अपना सिर धोकर स्नान करना, भट्‌टी चढ़ाकर कपड़े धोना, ऐसा करने से आपका सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर वह साधु महाराज वहाँ से आलोप हो गये। साधु के अनुसार कही बातों को पूरा करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे, कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई। भोजन के लिए राजा का परिवार तरसने लगा। तब एक दिन राजा ने रानी से बोला कि हे रानी, तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूँ, क्योंकि यहाँ पर सभी लोग मुझे जानते हैं। इसलिए मैं कोई छोटा कार्य नहीं कर सकता। ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया। वहाँ वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा। इधर, राजा के परदेश जाते ही रानी और दासी दुःखी रहने लगी। एक बार जब रानी और दासी को सात दिन तक बिना भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से कहा: हे दासी! पास ही के नगर में मेरी बहिन रहती है। वह बड़ी धनवान है। तू उसके पास जा और कुछ ले आ, ताकि थोड़ी-बहुत गुजर-बसर हो जाए। दासी रानी की बहिन के पास गई। उस दिन गुरुवार था और रानी की बहिन उस समय बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी। दासी ने रानी की बहिन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन रानी की बड़ी बहिन ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब दासी को रानी की बहिन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुःखी हुई और उसे क्रोध भी आया। दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी। सुनकर रानी ने अपने भाग्य को कोसा। उधर, रानी की बहिन ने सोचा कि मेरी बहिन की दासी आई थी, परंतु मैं उससे नहीं बोली, इससे वह बहुत दुःखी हुई होगी। कथा सुनकर और पूजन समाप्त करके वह अपनी बहिन के घर आई और कहने लगी: हे बहिन! मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी। तुम्हारी दासी मेरे घर आई थी परंतु जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली। कहो दासी क्यों गई थी? रानी बोली: बहिन, तुमसे क्या छिपाऊं, हमारे घर में खाने तक को अनाज नहीं था। ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आई। उसने दासी समेत पिछले सात दिनों से भूखे रहने तक की बात अपनी बहिन को विस्तार पूर्वक सुना दी। रानी की बहिन बोली: देखो बहिन! भगवान बृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं। देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो। पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहिन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया। यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई। दासी रानी से कहने लगी: हे रानी! जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी व्रत कर सकें। तब रानी ने अपनी बहिन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा। उसकी बहिन ने बताया, बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन ही करें। इससे बृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं। व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहिन अपने घर को लौट गई। सात दिन के बाद जब गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा। घुड़साल में जाकर चना और गुड़ लेकर आईं। फिर उससे केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया। अब पीला भोजन कहाँ से आए इस बात को लेकर दोनों बहुत दुःखी थे। चूंकि उन्होंने व्रत रखा था, इसलिए बृहस्पतिदेव उनसे प्रसन्न थे। इसलिए वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुन्दर पीला भोजन दासी को दे गए। भोजन पाकर दासी प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया। उसके बाद वे सभी गुरुवार को व्रत और पूजन करने लगी। बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति आ गई, परंतु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी। तब दासी बोली: देखो रानी! तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया और अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है। रानी को समझाते हुए दासी कहती है कि बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन कराना चाहिए, और धन को शुभ कार्यों में खर्च करना

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Hanuman Ji Vrat Katha: मंगलवार के व्रत में पढ़ें ये व्रत कथा और इस विधि से पूजन करने से प्रसन्न होंगे बजरंगबली

Hanuman Ji Vrat Katha: हिंदू धर्म में मंगलवार का दिन भगवान हनुमान को समर्पित है. इस दिन हनुमान जी विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. Hanuman Ji Vrat Katha: हिंदू धर्म में मंगलवार का दिन भगवान हनुमान को समर्पित है. इस दिन हनुमान जी की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. धार्मिक मान्यता है कि बजरंगबली की पूजा करने से व्यक्ति को बल, बुद्धि और विद्या की प्राप्ति होती है. जिस जातक की कुंडली में सूर्य कमजोर स्थिति में होता है मंगलवार के दिन हनुमान जी के व्रत रखने से सूर्य मजबूत होता है.  मंगलवार के दिन उपवास करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और मंगल का आगमन होता है. मान्यता है कि इस दिन पूजा के दौरान मंगलवार की कथा श्रवण करने और पाठ करने से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं. आइए जानते हैं मंगलवार की व्रत कथा और पूजन विधि के बारे में.  मंगलवार व्रत कथा पुराणों में दी गई कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक ब्राह्मण दम्पत्ति थे. उनकी कोई संतान नहीं थी. संतान प्राप्ति के लिए ब्राह्मणी मंगलवार के दिन व्रत किया करती थी. मंगलवार के दिन हनुमान जी को भोग लगाने के बाद ही वह कुछ खाती थी. किसी कारण वश एक मंगलवार वह हनुमान जी को भोग नहीं लगा पाई.  इससे दुखी हो ब्राह्मणी ने प्रतिज्ञा ली कि वह अगले मंगलवार से हनुमान जी को भोग लगाने के बाद ही भोजन ग्रहण करेगी. भूखे-प्यासे रहकर ब्राह्मणी ने 6 दिन जैसे-तैसे निकाल लिए, लेकिन सातवें दिन वह मूर्छित होकर गिर पड़ीं. तब हनुमान जी प्रकट हुए और ब्राह्मणी को पुत्र रत्न दिया. ब्राह्मण को इस बात की जानकारी हुई तो उसने बालक को अपना पुत्र मानने से इनकार कर दिया और उसका वध करने की ठानी ली. हालांकि, ब्राह्मण को इसमें सफलता नहीं मिल पाई. उस समय हनुमान जी ने ब्रह्मण के स्वप्न में आकर उन्हें ज्ञात कराया और कहा कि मंगल तुम्हारा पुत्र है. फिर ब्राह्मण ने हनुमान जी से क्षमा याचना की. तब से ही मंगलवार के दिन ये व्रत करने का विधान है. मान्यता है कि इस व्रत को करने से संतान की प्राप्ति होती है. साथ ही, भक्तों को सभी दुखों से छुटकारा मिलता है.  हनुमान जी की पूजा विधि मंगलवार के दिन सुबह उठकर भगवान श्रीराम को प्रणाम करें और अपने दिन की शुरुआत करें. नित्य कर्मों से निवृत होकर गंगाजल युक्त पानी से स्नान करें. अब आमचन कर लाल रंग के वस्त्र धारण करें. इसके बाद हनुमान जी की पूजा लाल रंग के पुष्प, फल, धूप, दीप, अगरबत्ती, मिष्ठान आदि चीजों के साथ करें. पूजा के दौरान हनुमान चालीसा, सुंदर कांड और मंगलवार की कथा का पाठ अवश्य करें. आखिर में आरती अर्चना करें. व्रत के दौरान उपवास रखें. शाम में आरती करने के बाद ही भोजन ग्रहण करें. व्रत में सात्विक भोजन ही ग्रहण करें.  Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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Shani Pradosh Vrat Katha : आज प्रदोष काल में पूजा के समय पढ़े ये व्रत कथा

हर माह की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat) रखा जाता है. ये व्रत महादेव को समर्पित है और उन्हें अत्यंत प्रिय है. कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय जब महादेव ने संसार को बचाने के लिए विषपान किया था, उस दिन त्रयोदशी (Trayodashi) तिथि थी. तब सभी देवताओं ने उनका आभार व्य​क्त करने के लिए प्रदोष काल में उनका पूजन किया था. इससे महादेव अत्यंत प्रसन्न हुए थे और तभी से महादेव को समर्पित ये व्रत रखा जाने लगा. इस व्रत में आज भी महादेव की पूजा प्रदोष काल (Pradosh Kaal) में ही की जाती है. दिन के हिसाब से प्रदोष का महत्व भी बदल जाता है. आज 15 जनवरी को साल 2022 का पहला प्रदोष व्रत रखा जा रहा है. इस मौके पर पूजा करते समय आप आज शनि प्रदोष की ये कथा जरूर पढ़ें. शनि प्रदोष व्रत कथा (Shani Pradosh Vrat Katha) पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय में एक नगर में प्रसिद्ध व्यापारी रहता था. वो काफी संपन्न था और हमेशा दूसरों की मदद किया करता था. उसके दरवाजे पर जो भी मदद मांगने आ जाता, उसे वो खाली हाथ कभी नहीं लौटाता था. अपने परोपकारी स्वभाव की वजह से समाज में उसकी अच्छी खासी प्रतिष्ठा थी. लोग उसका काफी सम्मान करते थे. उनके घर में बस कमी थी तो संतान की, इस कारण वो व्यापारी और उसकी पत्नी काफी दुखी रहते थे. उन्होंने इसके लिए हर प्रकार के प्रयास किए, लेकिन उनको संतान प्राप्त नहीं हो सकी. एक बार दुखी मन से वो पति और पत्नी तीर्थ यात्रा के लिए निकल पड़े. नगर के बाहर पहुंचने पर उन्हें एक पेड़ के नीचे बैठे साधु दिखे. साधु ध्यान की अवस्था में थे. वे दोनों साधु के पास गए और उनके सामने हाथ जोड़कर बैठ गए. जब साधु का ध्यान खत्म हुआ तो उन्होंने दोनों को देखा और उनसे कहा कि तुम्हारा जो भी दुख है, वो मैं अच्छी तरह से जानता हूं. मुझे मालूम है कि तुम अपने कुल को आगे बढ़ाने के लिए एक संतान चाहते हो. इसके लिए तुम दोनों को महादेव की आराधना करनी चाहिए और शनि प्रदोष व्रत विधि विधान से करना चाहिए. शिव कृपा से ही तुम्हें संतान प्राप्त होगी. इसके बाद साधु ने उन्हें शनि प्रदोष की व्रत विधि भी बताई. इसके बाद व्यापारी और उसकी पत्नी ने उस साधु को प्रणाम किया और तीर्थयात्रा पर चले गए. तीर्थयात्रा से लौटकर आने के बाद उन्होंने शनि प्रदोष का व्रत साधु के बताए अनुसार विधि से किया. कुछ समय तक व्रत करने के बाद एक दिन व्यापारी की पत्नी गर्भवती हो गई और उसने पुत्र रत्न को जन्म दिया. इस प्रकार शनि प्रदोष व्रत करने से उनके जीवन का खालीपन भर गया और परिवार में खुशियां आ गईं. माना जाता है कि जो भी नि:संतान दंपति इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करता है, उसे संतान सुख जरूर मिलता है.

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क्‍या है होलाष्‍टक का अर्थ, क्‍या इस समय उग्र रहते हैं ग्रह?

होलाष्‍टक का अर्थहोलाष्टक शब्द होली और अष्टक दो शब्दों से मिलकर बना है. इसका अर्थ होता है होली से पहले के आठ दिन. इसी दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां शुरू हो जाती है.  होलाष्‍टक की अशुभता क्‍या है?ज्‍योतिष के अनुसार, होलाष्टक के दौरान सभी ग्रह उग्र स्वभाव में होते हैं. इसलिए इस दौरान जो शुभ कार्य किए जाते हैं उनका उत्‍तम फल प्राप्‍त नहीं होता. कहा जाता है कि होलाष्टक के दौरान अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहू उग्र स्वभाव में होते हैं. क्‍या ना करेंइन दिनों में शुभ कार्य करने की मनाही होती है. इस समय में विवाह, गृह प्रवेश, निर्माण, नामकरण आदि शुभ कार्य वर्जित होते हैं. नए काम भी शुरू नहीं किए जाते. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इन दिनों में जो कार्य किए जाते हैं उनस कष्ट, पीड़ा आती है. विवाह आदि किए जाएं तो भविष्‍य में संबंध विच्छेद, कलह का शिकार होते हैं. होलाष्‍टक में दानशास्त्रों के अनुसार होलाष्टक में व्रत, पूजन व दान का विशेष महत्‍व है. इन दिनों में किए गए व्रत और दान से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है. ईश्वर आशीर्वाद देते हैं. इसलिए इन दिनों में वस्त्र, अनाज आदि दान करने चाहिए. किन कारण से होलाष्टक लगते हैं… दरअसल, जब राजा हिरणकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद और उसकी भगवान विष्णु के प्रति भक्ति भाव देखकर क्रोधित हो उठे तो होली के आठ दिन पहले से उसकी भक्ति छुड़वाने के लिए यातनाएं देने लगे। विष्णु भगवान की कृपा से प्रह्लाद ने हर तरह के कष्ट और परेशानियों को झेल लीं और अपनी भक्ति को जारी रखा। इसके बाद हिरणकश्यप ने अपनी बहन होलिका की मदद ली, जिसे आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। इसके बाद भी भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका का अग्नि में जलने से अंत हो गया। इन आठ दिनों में प्रह्लाद के साथ जो कुछ हुआ, उसकी वजह से ही होलाष्टक लगते हैं। होलाष्टक पर न करें शुभ कार्य हिंदुओं में सोलह संस्कार जन्म से लेकर मृत्यु तक किए जाते हैं। इनमें गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, विद्यारंभ भूत संस्कार, कर्णवेध, यज्ञोपवीत, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह, अन्त्येष्टि हैं। होलाष्टक में सोलह संस्कार समेत कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित होता है। इन दिनों में भगवान की भक्ति और पूजा-अर्चना करनी चाहिए जो उत्तम माना गया है। होलाष्टक के दौरान दान-पुण्य करने का अक्षय फल प्राप्त होता है।

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