हरिहरष्टकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान विष्णु और शिव की एक साथ स्तुति करता है। इस स्तोत्र की रचना 14वीं शताब्दी में संत कबीर ने की थी।
हरिहरष्टकम् में भगवान विष्णु और शिव को एक ही ब्रह्मांड के दो पहलू बताया गया है। भगवान विष्णु सृष्टि के सृजनकर्ता हैं, जबकि भगवान शिव सृष्टि के संहारकर्ता हैं। दोनों ही भगवान एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों मिलकर ही ब्रह्मांड को संचालित करते हैं।
हरिहरष्टकम् में भगवान विष्णु और शिव की स्तुति निम्नलिखित प्रकार से की गई है:
श्लोक 1:
जय हरिहर, जय हरिहर, जय हरिहर।
सकल जग के स्वामी, तुम हो सकल धार।
श्लोक 2:
हरि सृष्टि के सृजनकर्ता, शिव सृष्टि के संहारकर्ता।
दोनों ही भगवान एक ही हैं, दोनों ही परम सत्ता के रूप हैं।
श्लोक 3:
हरि पालनहार हैं, शिव संहारकर्ता हैं।
दोनों ही भगवान एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों मिलकर ही ब्रह्मांड को संचालित करते हैं।
श्लोक 4:
हरि ज्ञान के भंडार हैं, शिव शक्ति के भंडार हैं।
दोनों ही भगवान एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों मिलकर ही भक्तों को मोक्ष प्रदान करते हैं।
श्लोक 5:
हरि प्रेम के सागर हैं, शिव भक्ति के सागर हैं।
दोनों ही भगवान एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों मिलकर ही भक्तों के जीवन को सुखी बनाते हैं।
श्लोक 6:
हरि अज्ञान का नाश करने वाले हैं, शिव दुखों का नाश करने वाले हैं।
दोनों ही भगवान एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों मिलकर ही भक्तों को मुक्ति प्रदान करते हैं।
श्लोक 7:
हरि सभी जीवों के स्वामी हैं, शिव सभी जीवों के पालनहार हैं।
दोनों ही भगवान एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों मिलकर ही ब्रह्मांड को संचालित करते हैं।
श्लोक 8:
हरि और शिव एक ही हैं, दोनों ही परम सत्ता के रूप हैं।
जो भक्त इन दोनों भगवानों की भक्ति करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है।
हरिहरष्टकम् एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है जो भक्तों को भगवान विष्णु और शिव की कृपा प्राप्त करने में मदद करता है।
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