श्रीलक्ष्मी आर्यावृत्तम एक संस्कृत श्लोक है जो देवी लक्ष्मी की स्तुति करता है। यह श्लोक 12वीं शताब्दी के कवि और दार्शनिक वल्लभाचार्य द्वारा रचित है।
श्रीलक्ष्मी आर्यावृत्तम की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:
श्रीलक्ष्मी आर्यावृत्तम
अथ श्रीमहालक्ष्मीआर्यावृत्तम
मङ्गलमूल मंगलमङ्गलरूपिणी मङ्गलदायिनी मङ्गलसङ्गता। सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
अर्थ:
हे मंगलमूल, मंगलमूर्ति, मंगलदायिनी, मंगलसङ्गता, हे सर्वमङ्गलमङ्गल्ये, शिवे सर्वार्थसाधिके, हे शरण्ये त्र्यम्बके, हे गौरी, हे नारायणी, आपको नमस्कार।
इस श्लोक में, भक्त देवी लक्ष्मी से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें सभी प्रकार की मंगल प्रदान करें।
श्रीलक्ष्मी आर्यावृत्तम का पाठ करने का सबसे अच्छा समय सुबह उठकर या रात को सोने से पहले होता है। इस श्लोक को पढ़ने के लिए कोई विशेष विधि नहीं है, लेकिन इसे ध्यानपूर्वक और श्रद्धापूर्वक पढ़ना चाहिए।
श्रीलक्ष्मी आर्यावृत्तम की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
- यह एक बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण श्लोक है।
- यह श्लोक देवी लक्ष्मी को सभी प्रकार की मंगल प्रदान करने वाली देवी के रूप में प्रकट करता है।
- यह श्लोक भक्तों को सभी प्रकार की मंगल प्राप्त करने में मदद करता है।
श्रीलक्ष्मी आर्यावृत्तम का पाठ करने से भक्तों को आध्यात्मिक और भौतिक दोनों तरह से लाभ होता है। यह श्लोक उन्हें सभी प्रकार की मंगल प्राप्त करने में मदद करता है।
श्रीलक्ष्मी आर्यावृत्तम का पाठ नियमित रूप से करने से भक्तों को इन सभी लाभों की प्राप्ति होती है।
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