श्रीमोहनक्षेत्रनाथसुप्रभातम एक संस्कृत वर्णनात्मक कविता है जो भगवान कृष्ण के मोहनक्षेत्र में प्रातः उठने की क्रियाओं का वर्णन करती है। यह कविता संत कवि विद्यापति द्वारा रचित है। यह कविता वराष्टक छंद में रचित है, जिसमें प्रत्येक चरण में आठ अक्षर होते हैं।
श्रीमोहनक्षेत्रनाथसुप्रभातम की पहली दो पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं:
shreemohanakshetranaathasuprabhaatam
श्रीमोहनक्षेत्रनाथसुप्रभातम
श्रीमोहनक्षेत्र में,
सुबह-सुबह,
श्रीकृष्ण प्रकट हुए,
गोपियों को दर्शन देने।
इस कविता में, विद्यापति भगवान कृष्ण को "श्रीकृष्ण" कहते हैं, जिसका अर्थ है "कृष्ण भगवान"। वे उन्हें "मोहनक्षेत्रनाथ" कहते हैं, जिसका अर्थ है "मोहनक्षेत्र के स्वामी"। वे उन्हें "गोपियों के प्रिय" कहते हैं।
इस कविता में, विद्यापति भगवान कृष्ण के प्रातः उठने की क्रियाओं का वर्णन करते हैं। वे उन्हें अपने शयन से उठते हुए, अपने दाँत ब्रश करते हुए, और अपने शरीर को स्नान करते हुए देखते हैं। वे उन्हें अपने वस्त्र पहनते हुए, अपने हाथों में माखन और मिश्री लेते हुए, और अपने गोपियों के पास जाते हुए देखते हैं।
श्रीमोहनक्षेत्रनाथसुप्रभातम एक अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण कविता है। यह कविता भगवान कृष्ण के भक्तों के लिए एक अमूल्य निधि है।
यहाँ श्रीमोहनक्षेत्रनाथसुप्रभातम की पूरी कविता दी गई है:
श्रीमोहनक्षेत्र में,
सुबह-सुबह,
श्रीकृष्ण प्रकट हुए,
गोपियों को दर्शन देने।
अपने शयन से उठकर,
उन्होंने दाँत ब्रश किए,
और अपने शरीर को स्नान किया।
उन्होंने अपने वस्त्र पहने,
अपने हाथों में माखन और मिश्री ली,
और अपने गोपियों के पास गए।
गोपियों ने उन्हें जयकारे लगाए,
और उन्हें माखन और मिश्री खिलाई।
श्रीकृष्ण गोपियों के साथ,
रासलीला करने लगे,
और उनका दिन आनंदमय बीता।
श्रीमोहनक्षेत्रनाथसुप्रभातम की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- यह कविता भगवान कृष्ण के मोहनक्षेत्र में प्रातः उठने की क्रियाओं का वर्णन करती है।
- यह कविता वराष्टक छंद में रचित है।
- यह कविता संस्कृत भाषा में रचित है।
- यह कविता संत कवि विद्यापति द्वारा रचित है।
श्रीमोहनक्षेत्रनाथसुप्रभातम एक लोकप्रिय और प्रसिद्ध कविता है। यह कविता भगवान कृष्ण के भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ है।
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