वृजराजसुतष्टक एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण की वृंदावन में लीलाओं की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 16वीं शताब्दी के कवि सूरदास द्वारा रचित है।
वृजराजसुतष्टक की कुछ पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं:
vrajrajasutashtakam
वृजराजसुतष्टक
वृंदावन विहारि, वंशीधर, कृष्णचन्द्र, गोविन्द, मधुसूदन, नंदलाल, गोपाल, श्यामसुन्दर।
वसुदेवसुत, देवकीनन्दन, अर्जुनप्रिय, गीतावाचक, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वोत्तम।
नंदनंदन, मोहन, गोपियों के प्रियतम, ब्रजवासियों के त्राता, दुष्टों के दलनहार।
भक्तों के स्वामी, भक्तों के प्रियतम, भक्तों के हितकारी, भक्तों के रक्षक।
हे वृजराजसुत, हे कृष्ण, हे गोविन्द, हे श्यामसुन्दर, हे मेरे प्रियतम।
मुझे तुम्हारी शरण में ले लो, मुझे तुम्हारी कृपा से भर दो, मुझे तुम्हारे प्रेम में डुबो दो, मुझे तुम्हारी लीलाओं में निमग्न कर दो।
वृजराजसुतष्टक भगवान कृष्ण की वृंदावन में लीलाओं का एक सुंदर वर्णन करता है। यह स्तोत्र भगवान कृष्ण के भक्तों के लिए एक प्रेरणा है।
यहाँ स्तोत्र का एक और अनुवाद दिया गया है:
वृजराजसुतष्टक
KARMASU