वृत्तचतुष्टकिका एक संस्कृत श्लोक संग्रह है जो 12वीं शताब्दी के कवि और दार्शनिक जयदेव द्वारा रचित है। यह संग्रह चार श्लोकों में विभाजित है, और प्रत्येक श्लोक में एक अलग विषय पर विचार किया गया है।
वृत्तचतुष्टकिका की कुछ पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं:
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वृत्तचतुष्टकिका
- प्रथम श्लोक: प्रेम और भक्ति का महत्व
प्रेम एव जीवनं सर्वं, प्रेम एव धर्मोत्तमः। प्रेम एव परमो गतिः, प्रेम एव परमं पदम्।।
अर्थात्:
प्रेम ही जीवन का सब कुछ है, प्रेम ही सर्वोच्च धर्म है। प्रेम ही परम लक्ष्य है, प्रेम ही परम स्थिति है।
- द्वितीय श्लोक: मनुष्य का कर्तव्य
कर्माणि कर्तुं त्वया, कर्तात्वं नैव विद्यते। कर्तात्वं त्वं परस्य, त्वं कर्मान्विता तस्य।।
अर्थात्:
तुम कर्म करने वाले नहीं हो, तुम्हारे पास कर्तात्व नहीं है। कर्तात्व परमात्मा का है, तुम उसके कर्मों से युक्त हो।
- तृतीय श्लोक: जीवन का उद्देश्य
जीवनस्य उद्देश्यं, मोक्षप्राप्तिर्न संशयः। मोक्षं प्राप्तुं त्वया, भगवत्सेवनं कर्तव्यम्।।
अर्थात्:
जीवन का उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति है, इसमें कोई संदेह नहीं है। मोक्ष प्राप्ति के लिए, तुम्हें भगवान की सेवा करनी चाहिए।
- चतुर्थ श्लोक: भगवान की महिमा
भगवान सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञः। भगवान परमार्थ, भक्तियोगेन पूज्यः।।
अर्थात्:
भगवान सर्वव्यापी हैं, सर्वशक्तिमान हैं, सर्वज्ञ हैं। भगवान परमार्थ हैं, भक्तियोग से पूजनीय हैं।
वृत्तचतुष्टकिका एक संक्षिप्त और सुंदर कृति है जो जीवन के मूल सिद्धांतों पर विचार करती है। यह कृति सभी हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए एक आवश्यक पठन है।
वृत्तचतुष्टकिका की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- यह कृति संस्कृत के चार छन्दों में विभाजित है।
- प्रत्येक श्लोक में एक अलग विषय पर विचार किया गया है।
- यह कृति जीवन के मूल सिद्धांतों पर विचार करती है।
- यह कृति सभी हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए एक आवश्यक पठन है।
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