खंडिता एक संस्कृत स्तोत्र है जो भगवान कृष्ण के विरह में व्याकुल राधा की भावनाओं को व्यक्त करता है। यह स्तोत्र 12 अष्टपदीओं में विभाजित है, प्रत्येक अष्टपदी राधा के विरह की एक अलग भावना को व्यक्त करती है।
खंडिता की रचना 15वीं शताब्दी में भक्तिकाल के कवि रूपगोस्वामी ने की थी। रूपगोस्वामी एक कृष्ण भक्त कवि थे, और उनकी रचनाओं में कृष्ण और राधा के प्रेम का अद्भुत चित्रण मिलता है।
खंडिता में राधा कृष्ण के वियोग में पागल दिखाई गई हैं। वे कृष्ण के बिना जीना नहीं चाहती हैं। वे कृष्ण को पाने के लिए हर संभव प्रयास करती हैं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिलती है।
खंडिता कृष्ण भक्ति का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र कृष्ण भक्तों को राधा के विरह की तीव्रता का अनुभव कराता है।
खंडिता की कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं:
Khandita (Rupagoswamivirchita)
- कृष्ण बिना जीवन कैसे जिऊँ, कृष्ण बिना कैसे रहूँ।
- कृष्ण मेरी जान, कृष्ण मेरी प्राण, कृष्ण मेरे सब कुछ।
- कृष्ण बिना मैं तो मर ही जाऊँगी, कृष्ण बिना मैं तो जी ही नहीं सकती।
खंडिता कृष्ण भक्ति के क्षेत्र में एक अमूल्य धरोहर है। यह स्तोत्र कृष्ण भक्तों को राधा के विरह की तीव्रता का अनुभव कराता है।
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