Yogini Ekadashi 2026

Yogini Ekadashi 2026 Date And Time : पापों और गंभीर रोगों से मुक्ति का महामार्ग जाने सही तिथि, शुभ मुहूर्त, अचूक पूजा विधि और व्रत कथा….

Yogini Ekadashi 2026 Mein Kab Hai : सनातन धर्म और भारतीय वैदिक पंचांग की आध्यात्मिक दुनिया में एकादशी के पावन व्रत का स्थान हमेशा से ही सर्वोपरि और अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। पूरे वर्ष में आने वाली सभी एकादशियों का अपना एक अलग और विशेष महत्व होता है। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष (जब चंद्रमा का आकार घटता है) में पड़ने वाली एकादशी को शास्त्रों में बहुत ही जाग्रत और फलदायी बताया गया है। इस उपवास को कठोर निर्जला एकादशी के ठीक बाद और देवशयनी एकादशी से पहले रखा जाता है। इस वर्ष Yogini Ekadashi 2026 का यह पवित्र अवसर अपने साथ असीम आध्यात्मिक ऊर्जा, शारीरिक रोगों से मुक्ति और भगवान श्री हरि विष्णु का विशेष आशीर्वाद लेकर आ रहा है। यह एक ऐसा अद्भुत उपवास है जो व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया के भवसागर से निकालकर परम मोक्ष की ओर ले जाता है और चातुर्मास की शुरुआत से पहले शरीर व मन को पूरी तरह से शुद्ध कर देता है। Yogini Ekadashi 2026 Subh Muhurat : की सटीक तिथि और पंचांग के शुभ मुहूर्त…… किसी भी वैदिक उपवास का शत-प्रतिशत और अचूक फल इंसान को तभी प्राप्त होता है जब वह व्रत सही तिथि और एकदम सटीक शुभ मुहूर्त में किया जाए। आधिकारिक हिंदू पंचांग की एकदम सटीक गणनाओं के अनुसार, इस साल Yogini Ekadashi 2026 का महाव्रत 10 जुलाई, दिन शुक्रवार को पूरे भारतवर्ष में अपार श्रद्धा और उल्लास के साथ रखा जाएगा। व्रत की पवित्र तिथियों और शुभ समय का विस्तृत विवरण इस प्रकार है: एकादशी तिथि का विधिवत आरंभ 10 जुलाई 2026 को सुबह 08 बजकर 16 मिनट से हो जाएगा। इस पावन तिथि का पूर्ण समापन अगले दिन यानी 11 जुलाई 2026 को सुबह 05 बजकर 22 मिनट पर होगा। व्रत का पारण (उपवास खोलने का पवित्र समय): धर्म शास्त्रों के अनुसार पारण हमेशा अगले दिन किया जाता है। स्थानीय सूर्योदय के अनुसार पारण का शुभ मुहूर्त 11 जुलाई को सुबह 05:50 बजे से लेकर 08:35 बजे तक, अथवा दोपहर 02:03 बजे से लेकर शाम 04:42 बजे तक रहेगा। Yogini Ekadashi 2026 का आध्यात्मिक महत्व और अद्भुत लाभ : Spiritual Significance and Remarkable Benefits of Yogini Ekadashi 2026 पद्म पुराण और अन्य प्राचीन शास्त्रों में इस व्रत की अपार महिमा का गुणगान किया गया है। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से Yogini Ekadashi 2026 का नियमपूर्वक पालन करता है, उसे अपने जीवन में अभूतपूर्व और सकारात्मक बदलाव देखने को मिलते हैं। इस महान उपवास के सबसे बड़े लाभ इस प्रकार हैं: शारीरिक रोगों से मुक्ति: यह उपवास त्वचा संबंधी गंभीर रोगों, विशेष रूप से कुष्ठ रोग और अन्य शारीरिक कष्टों को दूर करने का एक अत्यंत शक्तिशाली और अचूक उपाय माना गया है। पापों का आमूल नाश: यह व्रत इंसान के उन सभी अनैतिक और बुरे कर्मों को जड़ से नष्ट कर देता है जिनके कारण उसे वर्तमान जीवन में भारी शारीरिक और मानसिक दुख भोगने पड़ते हैं। महान पुण्य की प्राप्ति: भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं यह स्पष्ट किया है कि इस एक दिन का उपवास करने से मनुष्य को 88,000 योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर असीम पुण्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। Yogini Ekadashi 2026 की पौराणिक और चमत्कारी व्रत कथा : The Mythological and Miraculous Story of the Yogini Ekadashi Fast (2026) इस व्रत की कथा स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता राजा युधिष्ठिर को सुनाई थी। प्राचीन काल में अलकापुरी नाम के एक अत्यंत सुंदर राज्य में धन के देवता कुबेर का शासन हुआ करता था। राजा कुबेर भगवान शिव के बहुत बड़े और परम भक्त थे तथा वे प्रतिदिन अपनी शिव पूजा के लिए ताजे फूलों का उपयोग करते थे। Yogini Ekadashi 2026 उनके दरबार में हेममाली नाम का एक यक्ष माली का काम करता था, जिसका मुख्य कार्य मानसरोवर से प्रतिदिन ताजे फूल लाना था। हेममाली अपनी अत्यंत सुंदर पत्नी स्वरूपवती से बहुत अधिक प्रेम करता था। एक दिन वह अपनी पत्नी के मोह और कामुकता में इतना अंधा हो गया कि वह अपना मुख्य कर्तव्य ही भूल गया; फूल लाने के बजाय वह अपनी पत्नी के साथ समय बिताने लगा। दोपहर तक फूलों का लंबा इंतजार करने के बाद राजा कुबेर को भारी क्रोध आ गया। जब राजा को हेममाली की इस घोर लापरवाही का असली कारण पता चला, तो उन्होंने भयंकर क्रोध में आकर उसे एक कठोर श्राप दे दिया। कुबेर ने कहा कि कामुकता के कारण भगवान का अपमान करने के जुर्म में उसे ‘सफेद कुष्ठ रोग’ (कोढ़) हो जाएगा और वह अपनी प्रिय पत्नी से हमेशा के लिए अलग हो जाएगा। श्राप के प्रबल प्रभाव के कारण हेममाली अलकापुरी से धरती पर गिर पड़ा और भयंकर दर्द व गंभीर बीमारी से तड़पने लगा। कई वर्षों तक घने जंगलों में दर-दर भटकने के बाद अंततः वह हिमालय पर्वत पर महान ऋषि मार्कंडेय के शांत आश्रम में जा पहुँचा। Yogini Ekadashi 2026 ऋषि ने उसकी इस दयनीय स्थिति को देखकर उस पर भारी दया की। तब ऋषि मार्कंडेय ने उसे अपने सभी पापों के प्रायश्चित के लिए Yogini Ekadashi 2026 का व्रत करने का अचूक और परम उपाय बताया। हेममाली ने पूरे उत्साह और पूर्ण विश्वास के साथ इस उपवास का कड़ाई से पालन किया, जिसके प्रभाव से उसका कोढ़ पूरी तरह मिट गया, उसका शरीर सोने के समान चमकने लगा और वह खुशी-खुशी अपनी पत्नी के पास लौट गया। Yogini Ekadashi 2026 की अचूक पूजा विधि और कड़े नियम व्रत का पूर्ण और चमत्कारी फल प्राप्त करने के लिए आपको पूजा के नियमों का बहुत ही गहराई और कड़ाई से पालन करना चाहिए। इस उपवास के नियम दशमी तिथि की रात से ही शुरू हो जाते हैं: दशमी की रात के नियम: दशमी (व्रत से एक दिन पहले) के दिन सूर्यास्त के बाद से ही सात्विक जीवन अपनाएं। Yogini Ekadashi 2026 जमीन पर बिस्तर लगाकर सोएं और किसी भी प्रकार के भौतिक व कामुक सुखों से खुद को पूरी तरह दूर रखें। स्नान और दृढ़ संकल्प: एकादशी के शुभ दिन सुबह जल्दी उठकर पानी में थोड़ा सा तिल या कुशा घास मिलाकर पवित्र स्नान करें और हाथ जोड़कर पूरे सच्चे मन से अपने व्रत का संकल्प

Yogini Ekadashi 2026 Date And Time : पापों और गंभीर रोगों से मुक्ति का महामार्ग जाने सही तिथि, शुभ मुहूर्त, अचूक पूजा विधि और व्रत कथा…. Read More »

Bhairavi Stotra

Tripura Bhairavi Stotra : त्रिपुर भैरवी स्तोत्र…..

त्रिपुर भैरवी स्तोत्र हिंदी पाठ : Tripura Bhairavi Stotra in Hindi ब्रह्मादयस्स्तुति शतैरपि सूक्ष्मरूपंजानन्तिनैव जगदादिमनादिमूर्तिम् तस्मादमूं कुचनतां Bhairavi Stotra नवकुङ्कुमास्यां स्थूलांस्तुवे सकलवाङ्मयमातृभूताम् ॥ १ ॥ सद्यस्समुद्यत सहस्र दिवाकराभांविद्याक्षसूत्रवरदाभयचिह्नहस्तां ।नेत्रोत्पलैस्त्रिभिरलङ्कृतवक्त्रपद्मां त्वांतारहाररुचिरां त्रिपुरां भजामः ॥ २ ॥ सिन्दूरपूररुचिरां कुचभारनम्रांजन्मान्तरेषु कृतपुण्य फलैकगम्यां ।अन्योन्य भेदकलहाकुलमानभेदैर्जानन्तिकिञ्जडधिय स्तवरूपमन्ये ॥ ३ ॥ स्थूलां वदन्ति मुनयः श्रुतयो गृणन्तिसूक्ष्मां वदन्ति Bhairavi Stotra वचसामधिवासमन्ये ।त्वांमूलमाहुरपरे जगताम्भवानिमन्यामहे वयमपारकृपाम्बुराशिम् ॥ ४ ॥ चन्द्रावतंस कलितां शरदिन्दुशुभ्रांपञ्चाशदक्षरमयीं Bhairavi Stotra हृदिभावयन्ती ।त्वां पुस्तकञ्जपपटीममृताढ्य कुम्भांव्याख्याञ्च हस्तकमलैर्दधतीं त्रिनेत्राम् ॥ ५ ॥ शम्भुस्त्वमद्रितनया कलितार्धभागोविष्णुस्त्वमम्ब कमलापरिणद्धदेहः ।पद्मोद्भवस्त्वमसि Bhairavi Stotra वागधिवासभूमिरेषां क्रियाश्च जगति त्रिपुरेत्वमेव ॥ ६ ॥ आश्रित्यवाग्भव भवाम्श्चतुरः परादीन्भावान्पदात्तु विहितान्समुदारयन्तीं ।कालादिभिश्च करणैः परदेवतां त्वांसंविन्मयींहृदिकदापि नविस्मरामि ॥ ७ ॥ आकुञ्च्य वायुमभिजित्यच वैरिषट्कंआलोक्यनिश्चलधिया निजनासिकाग्रां ।ध्यायन्ति मूर्ध्नि कलितेन्दुकलावतंसंत्वद्रूपमम्ब कृतिनस्तरुणार्कमित्रम् ॥ ८ ॥ त्वं प्राप्यमन्मथरिपोर्वपुरर्धभागंसृष्टिङ्करोषि जगतामिति वेदवादः ।सत्यन्तदद्रितनये जगदेकमातःनोचेद शेषजगतः स्थितिरेवनस्यात् ॥ ९ ॥ पूजांविधायकुसुमैः सुरपादपानांपीठेतवाम्ब कनकाचल कन्दरेषु ।गायन्तिसिद्धवनितास्सहकिन्नरीभिरास्वादितामृतरसारुणपद्मनेत्राः ॥ १० ॥ विद्युद्विलास वपुषः श्रियमावहन्तींयान्तीमुमांस्वभवनाच्छिवराजधानीं ।सौन्दर्यमार्गकमलानिचका सयन्तींदेवीम्भजेत परमामृत सिक्तगात्राम् ॥ ११ ॥ आनन्दजन्मभवनं भवनं श्रुतीनांचैतन्यमात्र तनुमम्बतवाश्रयामि ।ब्रह्मेशविष्णुभिरुपासितपादपद्मंसौभाग्यजन्मवसतिं त्रिपुरेयथावत् ॥ १२ ॥ सर्वार्थभाविभुवनं सृजतीन्दुरूपायातद्बिभर्ति पुनरर्क तनुस्स्वशक्त्या ।ब्रह्मात्मिकाहरतितं सकलम्युगान्ते तांशारदां मनसि जातु न विस्मरामि ॥ १३ ॥ नारायणीति नरकार्णवतारिणीतिगौरीति खेदशमनीति सरस्वतीति ।ज्ञानप्रदेति नयनत्रयभूषितेतित्वामद्रिराजतनये विबुधा पदन्ति ॥ १४ ॥ येस्तुवन्तिजगन्मातःश्लोकैर्द्वादशभिःक्रमात् ।त्वामनु पाप्र्यवाक्सिद्धिंप्राप्नुयुस्ते पराम्श्रियम् ॥ १५ ॥ इतिते कथितं देवि पञ्चाङ्गं भैरवीमयं ।गुह्याद्गोप्यतमङ्गोप्यं गोपनीयं……

Tripura Bhairavi Stotra : त्रिपुर भैरवी स्तोत्र….. Read More »

Tripura Sundari

Tripura Sundari Veda-Pada Stotram : त्रिपुर सुन्दरी वेद-पाद स्तोत्रम्….

त्रिपुर सुन्दरी वेद-पाद स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Tripura Sundari Veda-Pada Stotram in Hindi वेदपादस्तवं वक्ष्ये देव्याः प्रियचिकीर्षया ।यथामति मतिं देवस्तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥ १ ॥ अकिञ्चित्करकर्मभ्यः प्रत्याहृत्य कृपावशात् ।सुब्रह्मण्यः स्तुतावस्यां तन्नः षण्मुखः प्रचोदयात् ॥ २ ॥ अकारादिक्षकारान्तवर्णावयवशालिनी ।वीणापुस्तकहस्ताव्यात्प्रणो देवी सरस्वती ॥ ३ ॥ या वर्णपदवाक्यार्थगद्यपद्यस्वरूपिणी ।वाचि नर्तयतु क्षिप्रं मेधां देवी सरस्वती ॥ ४ ॥ उपास्यमाना विप्रेन्द्रैः सन्ध्यासु च तिसृष्वपि ।सद्यः प्रसीद मे मातः सन्ध्याविद्ये सरस्वती ॥ ५ ॥ मन्दा निन्दालोलुपाहं स्वभावा–देतत्स्तोत्रं पूर्यते किं मयेति ।मा ते भीतिर्हे मते त्वादृशाना–मेषा नेत्री राधसा सूनृतानाम् ॥ ६ ॥ तरङ्गभ्रुकुटीकोटिभङ्ग्या Tripura Sundari तर्जयते जराम् ।सुधामयाय शुभ्राय सिन्धूनां पतये नमः ॥ ७ ॥ तस्य मध्ये मणिद्वीपः कल्पकारामभूषितः ।अस्तु मे ललितावासः स्वस्तिदा अभयङ्करः ॥ ८ ॥ कदम्बमञ्जरीनिर्यद्वारुणीपारणोन्मदैः ।द्विरेफैर्वर्णनीयाय वनानां पतये नमः ॥ ९ ॥ तत्र वप्रावली लीला Tripura Sundari गगनोल्लङ्घिगोपुरम् ।मातः कौतूहलं दद्यात्सग्ंहार्यं नगरं तव ॥ १० ॥ मकरन्दझरीमज्जन्मिलिन्दकुलसङ्कुलाम् ।महापद्माटवीं वन्दे यशसा सम्परीवृताम् ॥ ११ ॥ तत्रैव चिन्तामणिधोरणार्चिभि–र्विनिर्मितं रोपितरत्नशृङ्गम् ।भजे भवानीभवनावतंस–मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥ १२ ॥ मुनिभिः स्वात्मलाभाय Tripura Sundari यच्चक्रं हृदि सेव्यते ।तत्र पश्यामि बुद्ध्या तदक्षरे परमे व्योमन् ॥ १३ ॥ पञ्चब्रह्ममयो मञ्चस्तत्र यो बिन्दुमध्यगः ।तव कामेशि वासोऽयमायुष्मन्तं करोतु माम् ॥ १४ ॥ नानारत्नगुलुच्छालीकान्तिकिम्मीलितोदरम् ।विमृशामि वितानं तेऽतिश्लक्ष्णमतिलोमशम् ॥ १५ ॥ पर्यङ्कतल्पोपरि दर्शनीयंसबाणचापाङ्कुशपाशपाणिम् ।अशेषभूषारमणीयमीडेत्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम् ॥ १६ ॥ जटारुणं चन्द्रकलाललामंउद्वेललावण्यकलाभिरामम् ।कामेश्वरं कामशरासनाङ्कंसमस्तसाक्षिं तमसः परस्तात् ॥ १७ ॥ तत्र कामेशवामाङ्के Tripura Sundari खेलन्तीमलिकुन्तलाम् ।सच्चिदानन्दलहरीं महालक्ष्मीमुपास्महे ॥ १८ ॥ चारुगोरोचनापङ्कजम्बालितघनस्तनीम् ।नमामि त्वामहं लोकमातरं पद्ममालिनीम् ॥ १९ ॥ शिवे नमन्निर्जरकुञ्जरासुर–प्रतोलिकामौलिमरीचिवीचिभिः ।इदं तव क्षालनजातसौभगंचरणं नो लोके सुधितां दधातु ॥ २० ॥ कल्पस्यादौ कारणेशानपि त्री–न्स्रष्टुं देवि त्रीन्गुणानादधानाम् ।सेवे नित्यं श्रेयसे भूयसे त्वा–मजामेकां लोहितशुक्लकृष्णाम् ॥ २१ ॥ केशोद्भूतैरद्भुतामोदपूरै–राशाबृन्दं सान्द्रमापूरयन्तीम् ।त्वामानम्य त्वत्प्रसादात्स्वयम्भू–रस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् ॥ २२ ॥ अर्धोन्मीलद्यौवनोद्दामदर्पांदिव्याकल्पैरर्पयन्तीं मयूखान् ।देवि ध्यात्वा त्वां पुरा कैटभारि–र्विश्वं बिभर्ति भुवनस्य नाभिः ॥ २३ ॥ कल्हारश्रीमञ्जरीपुञ्जरीतिंधिक्कुर्वन्तीमम्ब ते पाटलिम्ना ।मूर्तिं ध्यात्वा शाश्वतीं भूतिमाय–न्निन्द्रो राजा जगतो य ईशे ॥ २४ ॥ देवतान्तरमन्त्रौघजपश्रीफलभूतया ।जापकस्तव देव्यन्ते विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ २५ ॥ पुंस्कोकिलकलक्वाणकोमलालापशालिनि ।भद्राणि कुरु मे मातर्दुरितानि परासुव ॥ २६ ॥ अन्तेवासिन्नस्ति चेत्ते मुमुक्षावक्ष्ये युक्तिं मुक्तसर्वैषणः सन् ।सद्भ्यः साक्षात्सुन्दरीं ज्ञप्तिरूपांश्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवेहि ॥ २७ ॥ षोढान्यासादिदेवैश्च सेविता चक्रमध्यगा ।कामेशमहिषी भूयः षोडशी शर्म यच्छतु ॥ २८ ॥ शान्तो दान्तो देशिकेन्द्रं प्रणम्यतस्यादेशात्तारकं मन्त्रतत्त्वम् ।जानीते चेदम्ब धन्यः समानंनातः परं वेदितव्यं हि किञ्चित् ॥ २९ ॥ त्वमेव कारणं कार्यं क्रिया ज्ञानं त्वमेव च ।त्वामम्ब न विना किञ्चित्त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ३० ॥ परागमद्रीन्द्रसुते तवाङ्घ्रि–सरोजयोरम्ब दधामि मूर्ध्ना ।अलङ्कृतं वेदवधूशिरोभि–र्यतो जातो भुवनानि विश्वा ॥ ३१ ॥ दुष्टान्दैत्यान्हन्तुकामां महर्षीन्शिष्टानन्यान्पातुकामां कराब्जैः ।अष्टाभिस्त्वां सायुधैर्भासमानांदुर्गां देवीग्ं शरणमहं प्रपद्ये ॥ ३२ ॥ देवि सर्वानवद्याङ्गि त्वामनादृत्य ये क्रियाः ।कुर्वन्ति निष्फलास्तेषामदुग्धा इव धेनवः ॥ ३३ ॥ नाहं मन्ये दैवतं मान्यमन्य–त्त्वत्पादाब्जादम्बिके कुम्भजाद्याः ।ये ध्यातारो भक्तिसंशुद्धचित्ताःपरामृतात्परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ३४ ॥ कुर्वाणोऽपि दुरारम्भांस्तव Tripura Sundari नामानि शाम्भवि ।प्रजपन्नेति मायान्तमति मृत्युं तराम्यहम् ॥ ३५ ॥ कल्याणि त्वं कुन्दहासप्रकाशै–रन्तर्ध्वान्तं नाशयन्ती क्षणेन ।हन्तास्माकं ध्यायतां त्वत्पदाब्ज–मुच्चतिष्ठ महते सौभगाय ॥ ३६ ॥ तितीर्षया भवाम्भोधेर्हयग्रीवादयः पुरा ।अप्रमत्ता भवत्पूजां सुविद्वांसो वितेनिरे ॥ ३७ ॥ मद्वश्या ये दुराचारा ये च सन्मार्गगामिनः ।भवत्याः कृपया सर्वे सुवर्यन्तु यजमानाः ॥ ३८ ॥ श्रीचक्रस्थां शाश्वतैश्वर्यदात्रींपौण्ड्रं चापं पुष्पबाणान्दधानाम् ।बन्धूकाभां भावयामि त्रिनेत्रांतामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीम् ॥ ३९ ॥ भवानि तव पादाब्जनिर्णेजनपवित्रताः ।भवामयप्रशान्त्यै त्वामपो याचामि भेषजम् ॥ ४० ॥ चिदानन्दसुधाम्भोधेस्तवानन्दलवोऽस्ति यः ।कारणेशैस्त्रिभिः साकं तद्विश्वमुपजीवति ॥ ४१ ॥ नो वा यागैर्नैव पूर्तादिकृत्यै–र्नो वा जप्यैर्नो Tripura Sundari महद्भिस्तपोभिः ।नो वा योगैः क्लेशकृद्भिः सुमेधानिचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ ४२ ॥ प्रातः पाहि महाविद्ये Tripura Sundari मध्याह्ने तु मृडप्रिये ।सायं पाहि जगद्वन्द्ये पुनर्नः पाहि विश्वतः ॥ ४३ ॥ बन्धूकाभैर्भानुभिर्भासयन्तीविश्वं शश्वत्तुङ्गपीनस्तनार्धा ।लावण्याब्धेः सुन्दरि त्वं प्रसादा–दायुः प्रजाग्ं रयिमस्मासु धेहि ॥ ४४ ॥ कर्णाकर्णय मे तत्त्वं या चिच्छक्तिरितीर्यते ।त्रिर्वदामि मुमुक्षूणां सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ४५ ॥ वाग्देवीति त्वां वदन्त्यम्ब केचि–ल्लक्ष्मीर्गौरीत्येवमन्येऽप्युशन्ति ।शश्वन्मातः प्रत्यगद्वैतरूपांशंसन्ति केचिन्निविदो जनाः ॥ ४६ ॥ ललितेति सुधापूरमाधुरीचोरमम्बिके ।तव नामास्ति यत्तेन जिह्वा मे मधुमत्तमा ॥ ४७ ॥ ये सम्पन्नाः साधनैस्तैश्चत्तुर्भिःशुश्रूषाभिर्देशिकं Tripura Sundari प्रीणयन्ति ।सम्यग्विद्वान् शुद्धसत्त्वान्तराणांतेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत ॥ ४८ ॥ अभिचारादिभिः कृत्यां यः प्रेरयति मय्युमे ।तव हुङ्कारसन्त्रस्ता प्रत्यक्कर्तारमृच्छतु ॥ ४९ ॥ जगत्पवित्रि मामिकामपाहराशु दुर्जराम् ।प्रसीद मे दयाधुने प्रशस्तिमम्ब नः स्कृधि ॥ ५० ॥ कदम्बारुणमम्बाया रूपं Tripura Sundari चिन्तय चित्त मे ।मुञ्च पापीयसीं निष्ठां मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥ ५१ ॥ भण्डभण्डनलीलायां रक्तचन्दनपङ्किलः ।अङ्कुशस्तव तं हन्याद्यश्च नो द्विषते जनः ॥ ५२ ॥ रे रे चित्त त्वं वृधा शोकसिन्धौमज्जस्यन्तर्वच्म्युपायं विमुक्त्यै ।देव्याः पादौ पूजयैकाक्षरेणतत्ते पदं सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योम् ॥ ५३ ॥ चञ्चद्बालातपज्योत्स्नाकलामण्डलशालिने ।ऐक्षवाय नमो मातर्बाहुभ्यां तव धन्वने ॥ ५४ ॥ तामेवाद्यां ब्रह्मविद्यामुपासेमूर्तैर्वेदैः स्तूयमानां भवानीम् ।हन्त स्वात्मत्वेन यां मुक्तिकामोमत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ ५५ ॥ शरणं करवाण्यम्ब चरणं तव सुन्दरि ।शपे त्वत्पादुकाभ्यां मे नान्यः पन्था अयनाय ॥ ५६ ॥ रत्नच्छत्रैश्चामरैर्दर्पणाद्यै–श्चक्रेशानीं सर्वदोपाचरन्त्यः ।योगिन्योऽन्याः शक्तयश्चाणिमाद्यायूयं पातः स्वस्तिभिः सदा नः ॥ ५७ ॥ दरिद्रं मां विजानीहि Tripura Sundari सर्वज्ञासि यतः शिवे ।दूरीकृत्याशु दुरितमथा नो वर्धया रयिम् ॥ ५८ ॥ महेश्वरि महामन्त्रकूटत्रयकलेबरे ।कादिविद्याक्षरश्रेणिमुशन्तस्त्वा हवामहे ॥ ५९ ॥ मूलाधारादूर्ध्वमन्तश्चरन्तींभित्त्वा ग्रन्थीन्मूर्ध्नि Tripura Sundari निर्यत्सुधार्द्राम् ।पश्यन्तस्त्वां ये च तृप्तिं लभन्तेतेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ ६० ॥ मह्यं द्रुह्यन्ति ये मातस्त्वद्ध्यानासक्तचेतसे ।तानम्ब सायकैरेभिरव ब्रह्मद्विषो जहि ॥ ६१ ॥ त्वद्भक्तानामम्ब शान्तैषणानांब्रह्मिष्ठानां दृष्टिपातेन पूतः ।पापीयानप्यावृतः स्वर्वधूभिःशोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ ६२ ॥ सन्तु विद्या जगत्यस्मिन्संसारभ्रमहेतवः ।भजेऽहं त्वां यया विद्वान्विद्ययामृतमश्नुते ॥ ६३ ॥ विद्वन्मुख्यैर्विद्रुमाभं विशाल–श्रोणीशिञ्जन्मेखलाकिङ्किणीकम् ।चन्द्रोत्तंसं चिन्मयं वस्तु किञ्चि–द्विद्धि त्वमेतन्निहितं गुहायाम् ॥ ६४ ॥ न विस्मरामि Tripura Sundari चिन्मूर्तिमिक्षुकोदण्डशालिनीम् ।मुनयः सनकप्रेष्ठास्तामाहुः परमां गतिम् ॥ ६५ ॥ चक्षुःप्रेङ्खत्प्रेमकारुण्यधारांहंसज्योत्स्नापूरहृष्यच्चकोराम् ।यामाश्लिष्यन्मोदते देवदेवःसा नो देवी सुहवा शर्म यच्छतु ॥ ६६ ॥ मुञ्च वञ्चकतां चित्त Tripura Sundari पामरं चापि दैवतम् ।गृहाण पदमम्बाया एतदालम्बनं परम् ॥ ६७ ॥ का मे भीतिः का क्षतिः किं दुरापंकामेशाङ्कोत्तुङ्गपर्यङ्कसंस्थाम् ।तत्त्वातीतामच्युतानन्ददात्रींदेवीमहं निरृतिं वन्दमानः ॥ ६८ ॥ चिन्तामणिमयोत्तंसकान्तिकञ्चुकितानने ।ललिते त्वां सकृन्नत्वा न बिभेति कुतश्चन ॥ ६९ ॥ तारुण्योत्तुङ्गितकुचे Tripura Sundari लावण्योल्लासितेक्षणे ।तवाज्ञयैव कामाद्या मास्मान्प्रापन्नरातयः ॥ ७० ॥ आकर्णाकृष्टकामासस्त्रसञ्जातं तापमम्ब मे ।आचामतु कटाक्षस्ते पर्जन्यो वृष्टिमानिव ॥ ७१ ॥ कुर्वे गर्वेणापचारानपारा–नद्यप्यम्ब त्वत्पदाब्जं तथापि ।मन्ये धन्ये देवि विद्यावलम्बंमातेव पुत्रं बिभृतास्वेनम् ॥ ७२ ॥ यथोपास्तिक्षतिर्न स्यात्तव चक्रस्य सुन्दरि ।कृपया कुरु कल्याणि तथा मे स्वस्तिरायुषि ॥ ७३ ॥ चक्रं सेवे तारकं सर्वसिध्यैश्रीमन्मातः सिद्धयश्चाणिमाद्याः ।नित्या मुद्रा शक्तयश्चाङ्गदेव्योयस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः ॥ ७४ ॥ सुकुमारे सुखाकारे Tripura Sundari सुनेत्रे सूक्ष्ममध्यमे ।सुप्रसन्ना भव शिवे सुमृडीका सरस्वती ॥ ७५ ॥ विद्युद्वल्लीकन्दलीं कल्पयन्तींमूर्तिं स्फूर्त्या पङ्कजं धारयन्तीम् ।ध्यायन्हि त्वां जायते सार्वभौमोविश्वा आशाः पृतनाः सञ्जयञ्जयन् ॥ ७६ ॥ अविज्ञाय परां शक्तिमात्मभूतां महेश्वरीम् ।अहो पतन्ति निरयेष्वेके चात्महनो जनाः ॥ ७७ ॥ सिन्दूराभैः सुन्दरैरंशुबृन्दै–र्लाक्षालक्ष्म्यां मज्जयन्तीं जगन्ति ।हेरम्बाम्ब त्वां हृदा लम्बते य–स्तस्मै विशः स्वयमेवानमन्ते ॥ ७८ ॥ तव तत्त्वं विमृशतां प्रत्यगद्वैतलक्षणम् ।चिदानन्दघनादन्यन्नेह नानास्ति किञ्चन ॥ ७९ ॥ कण्ठात्कुण्डलिनीं नीत्वा सहस्रारं शिवे तव ।न पुनर्जायते गर्भे सुमेधा अमृतोक्षितः ॥ ८० ॥ त्वत्पादुकानुसन्धानप्राप्तसर्वात्मतादृशि ।पूर्णाहङ्कृतिमत्यस्मिन्न कर्म लिप्यते नरे ॥ ८१ ॥ तवानुग्रहनिर्भिन्नहृदयग्रन्थिरद्रिजे ।स्वात्मत्वेन जगन्मत्वा ततो न विजुगुप्सते ॥ ८२ ॥ कदा वसुदलोपेते त्रिकोणनवकान्विते ।आवाहयामि चक्रे त्वां सूर्याभां श्रियमैश्वरीम् ॥

Tripura Sundari Veda-Pada Stotram : त्रिपुर सुन्दरी वेद-पाद स्तोत्रम्…. Read More »

Sahasranama Stotram

Tripura Bhairavi Sahasranama Stotram : त्रिपुर भैरवी सहस्रनाम स्तोत्रम्….

त्रिपुर भैरवी सहस्रनाम स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Tripura Bhairavi Sahasranama Stotram in Hindi ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयङ्गुर्वङ्गनागमः ॥ महापातककोट्यस्तु तथा चैवोपपातकाः ।स्तोत्रेण भैरवोक्तेन सर्वन्नश्यति तत्क्षणात् ॥ सर्वव्वा श्लोकमेकव्वा पठनात्स्मरणादपि ।पठेद्वा पाठयेद्वापि सद्यो मुच्येत बन्धनात् ॥ राजद्वारे रणे दुर्गे सङ्कटे गिरिदुर्ग्गमे ।प्रान्तरे पर्वते वापि नौकायाव्वा महेश्वरि ॥ वह्निदुर्गभये प्राप्ते सिंहव्याघ्रभ्याकुले ।पठनात्स्मरणान्मर्त्त्यो मुच्यते सर्वसङ्कटात् ॥ अपुत्रो लभते पुत्रन्दरिद्रो धनवान्भवेत् ।सर्वशास्त्रपरो विप्रः सर्वयज्ञफलल्लभेत् ॥ अग्निवायुजलस्तम्भङ्गतिस्तम्भविवस्वतः ।मारणे द्वेषणे चैव तथोच्चाटे महेश्वरि ॥ गोरोचनाकुङ्कुमेन लिखेत्स्तोत्रमनन्यधीः ।गुरुणा वैष्णवैर्वापि सर्वयज्ञफलल्लभेत् ॥ वशीकरणमत्रैव जायन्ते सर्वसिद्धयः ।प्रातःकाले शुचिर्ब्भूत्वा मध्याह्ने च निशामुखे ॥ पठेद्वा पाठयेद्वापि सर्वयज्ञफलल्लभेत् ।वादी मूको भवेद्दुष्टो राजा च सेवको यथा ॥ आदित्यमङ्गलदिने गुरौ वापि महेश्वरि ।गोरोचनाकुङ्कुमेन लिखेत्स्तोत्रमनन्यधीः ॥ गुरुणा वैष्णवैर्वापि सर्वयज्ञफलल्लभेत् ।धृत्वा सुवर्णमध्यस्थं सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ स्त्रीणाव्वामकरे धार्यम्पुमान्दक्षकरे तथा ।आदित्यमङ्गलदिने गुरौ वापि महेश्वरि ॥ शनैश्चरे लिखेद्वापि सर्वसिद्धिं लभेद्ध्रुवम् ।प्रान्तरे वा श्मशाने वा निशायामर्द्धरात्रके ॥ शून्यागारे च देवेशि लिखेद्यत्नेन साधकः ।सिंहराशौ गुरुगते कर्क्कटस्थे दिवाकरे ॥ मीनराशौ गुरुगते लिखेद्यत्नेन साधकः ।रजस्वलाभगन्दृष्ट्वा तत्रस्थो विलिखेत्सदा ॥ सुगंधिकुसुमैः शुक्रैः सुगंधिगंधचन्दनैः ।मृगनाभिमृगमदैर्विलिखेद्यत्नपूर्वकम् ॥ लिखित्वा च पठित्वा च धारयेच्चाप्यनन्यधीः ।कुमारीम्पूजयित्वा च नारीश्चापि प्रपूजयेत् ॥ पूजयित्वा च कुसुमैर्ग्गन्धचन्दनवस्त्रकैः ।सिन्दूररक्तकुसुमैः पूजयेद्भक्तियोगतः ॥ अथवा पूजयेद्देवि कुमारीर्द्दशमावधीः ।सर्वाभीष्टफलन्तत्र लभते तत्क्षणादपि ॥ नात्र सिद्धाद्यपेक्षास्ति न वा मित्रारिदूषणम् ।न विचार्यञ्च देवेशि जपमात्रेण सिद्धिदम् ॥ सर्वदा सर्वकार्येषु Sahasranama Stotram षट्साहस्रप्रमाणतः ।बलिन्दत्त्वा विधानेन प्रत्यहम्पूजयेच्छिवाम् ॥ स्वयंभूकुसुमैः पुष्पैर्ब्बलिदानन्दिवानिशम् ।पूजयेत्पार्वतीन्देवीम्भैरवीन्त्रिपुरात्मिकाम् ॥ ब्राह्मणान्भोजयेन्नित्यन्दशकन्द्वादशन्तथा ।अनेन विधिना देवि बालान्नित्यम्प्रपूजयेत् ॥ मासमेकम्पठेद्यस्तु त्रिसन्ध्यव्विधिनामुना ।अपुत्रो लभते पुत्रन्निर्द्धनो धनवान्भवेत् ॥ सदा चानेन विधिना Sahasranama Stotram तथा मासत्रयेण च ।कृतकार्यं भवेद्देवि तथा मासचतुष्टये ॥ दीर्ग्घरोगात्प्रमुच्येत पञ्चमे कविराड्भवेत् ।सर्वैश्वर्यं लभेद्देवि मासषट्के तथैव च ॥ सप्तमे खेचरत्वञ्च Sahasranama Stotram अष्टमे च वृहद्द्युतिः ।नवमे सर्वसिद्धिः स्याद्दशमे लोकपूजितः ॥ एकादशे राजवश्यो Sahasranama Stotram द्वादशे तु पुरन्दरः ।वारमेकम्पठेद्यस्तु प्राप्नोति पूजने फलम् ॥ समग्रं श्लोकमेकव्वा यः पठेत्प्रयतः शुचिः ।स पूजाफलमाप्नोति भैरवेण च भाषितम् ॥ आयुष्मत्प्रीतियोगे च ब्राह्मैन्द्रे च विशेषतः ।पञ्चम्याञ्च तथा षष्ठ्याय्यत्र कुत्रापि तिष्ठति ॥ शङ्का न विद्यते तत्र न च मायादिदूषणम् ।वारमेकं पठेन्मर्त्त्यो मुच्यते सर्वसङ्कटात् ।किमन्यद्बहुना देवि सर्वाभीष्टफलल्लभेत् ॥ ॥ इति श्रीविश्वसारे महाभैरवविरचितं त्रिपुर भैरवी सहस्रनाम स्तोत्रम्………

Tripura Bhairavi Sahasranama Stotram : त्रिपुर भैरवी सहस्रनाम स्तोत्रम्…. Read More »

Cow

Seeing Cow In A Dream : सपने में गाय देखना शुभ या अशुभ ? जानें सटीक और विस्तृत अर्थ…..

Cow In A Dream : रात की गहरी और शांत नींद के आगोश में हम अक्सर सपनों की एक अलग ही दुनिया में चले जाते हैं। स्वप्न शास्त्र (Swapna Shastra) और मनोविज्ञान के अनुसार, हमारे द्वारा देखा गया हर सपना हमारे अचेतन मन की उपज होने के साथ-साथ हमारे आने वाले भविष्य को लेकर कोई न कोई गुप्त ईश्वरीय संकेत जरूर देता है। सनातन धर्म में गाय को केवल एक साधारण पशु नहीं माना गया है, बल्कि उन्हें साक्षात ‘माता’ (गौ माता) का सर्वोच्च और परम पवित्र दर्जा प्राप्त है। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों की गहरी मान्यताओं के अनुसार, गौ माता के शरीर में 33 कोटि (करोड़) देवी-देवताओं का जाग्रत वास होता है। इसलिए, जब भी किसी व्यक्ति को सोते समय Cow In A Dream दिखाई देती है, तो उसके मन में कई तरह के आध्यात्मिक सवाल उठने लगते हैं कि आखिर यह भविष्य की किस बड़ी घटना की ओर एक अलौकिक इशारा है। हिन्दू धर्म की मजबूत आस्थाओं में गाय को धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी का साक्षात स्वरूप भी माना गया है। अधिकतर लोगों की यह गहरी जिज्ञासा होती है कि जीवन के अलग-अलग पड़ावों पर Cow In A Dream देखने का असली और सटीक अर्थ क्या होता है। आज के इस अत्यंत विस्तृत, शत-प्रतिशत मौलिक (100% Human Written) ब्लॉग पोस्ट में हम आपको 5 अलग-अलग अवस्थाओं में गाय देखने का एकदम सटीक अर्थ बताएंगे। विभिन्न अवस्थाओं में Cow In A Dream देखने के 5 सबसे सटीक अर्थ…. Sapne me gay dekhna kaisa hota hai : स्वप्न विज्ञान के विशेषज्ञों के अनुसार, ज्यादातर स्थितियों में सपने में गाय का दिखाई देना एक बेहद शुभ, फलदायी और सकारात्मक संकेत होता है। लेकिन सपनों का एकदम सटीक फल इस बात पर निर्भर करता है कि आपने Cow In A Dream को किस विशेष अवस्था, रंग या रूप में देखा है। 1. एक शांत और सामान्य अवस्था में Cow In A Dream देखना अगर आप रात को एक बहुत ही शांत, सौम्य और सुखद अवस्था में Cow In A Dream देखते हैं, तो स्वप्न शास्त्र के अनुसार यह आपके लिए एक बहुत ही शानदार और शुभ संकेत है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि आपके जीवन में जो भी भयंकर परेशानियां या मानसिक तनाव चल रहा था, वह अब हमेशा के लिए खत्म होने वाला है। यह सपना इस बात की पूरी गारंटी देता है कि आपके परिवार में अपार खुशियां आएंगी, समाज में आपका रुतबा और सम्मान बहुत तेजी से बढ़ेगा, और यदि आप कोई व्यापार या नौकरी करते हैं, तो उसमें आपको भारी उन्नति प्राप्त होगी। 2. गाय के साथ उसका बछड़ा (Calf) देखना सपनों की जादुई दुनिया में अगर आपको गाय के साथ उसका एक छोटा सा प्यारा बछड़ा भी दिखाई दे, तो इस Cow In A Dream के दृश्य को ज्योतिष में अत्यंत मंगलकारी और दुर्लभ माना जाता है। यह सपना इस बात की ओर एक बहुत ही मजबूत इशारा करता है कि आने वाले कुछ ही दिनों में आपको अचानक कोई बहुत बड़ा आर्थिक लाभ (धन लाभ) होने की प्रबल संभावना है। इसके अलावा, यह इस बात का भी प्रमाण है कि आप अपने हाथों से जिस भी नए शुभ काम की शुरुआत करेंगे, उस काम में आपको ईश्वर की कृपा से शत-प्रतिशत सफलता और विजय मिलेगी। 3. सपने में गाय को अपने हाथों से रोटी खिलाना स्वप्न शास्त्र में खुद को कोई सात्विक कार्य करते हुए देखना बहुत पुण्य का काम माना जाता है। अगर आप खुद को एक अत्यंत सुखद Cow In A Dream में गाय को रोटी, गुड़ या हरा चारा खिलाते हुए देखते हैं, तो यह आपके लिए साक्षात एक ईश्वरीय वरदान के समान है। स्वप्न शास्त्र के जाने-माने जानकारों के अनुसार, यह सपना सीधे तौर पर आपकी आयु (दीर्घायु) में वृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की ओर इशारा कर रहा है। यदि आपका खुद का या आपके परिवार के किसी भी सदस्य का स्वास्थ्य काफी लंबे समय से खराब चल रहा है, तो जल्द ही उस गंभीर बीमारी से आपको छुटकारा मिलने वाला है। 4. एक साथ कई गायों का झुंड (Herd of Cows) देखना क्या आपने कभी अपनी नींद में बहुत सारी गायों को एक ही जगह पर एक साथ देखा है? सपने में गाय का एक विशाल झुंड देखना (Herd of Cow In A Dream) यह साफ तौर पर दर्शाता है कि बहुत ही जल्द आपके पास चारों दिशाओं से छप्पर फाड़ कर पैसा आने वाला है। जो लोग व्यापार, प्रॉपर्टी या किसी बड़े कारोबार से जुड़े हैं, उनके लिए यह सपना किसी बड़ी लॉटरी के लगने जैसा है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, यह सपना आपको जल्द ही अपार धनवान बनने और जीवन में बेतहाशा तरक्की करने की तरफ स्पष्ट संकेत करता है। 5. मृत (मरी हुई) गाय को देखना: एक बहुत बड़ी चेतावनी जैसा कि हमने पहले बताया, सपनों की दुनिया में हर संकेत शुभ नहीं होता; कुछ सपने हमें आने वाले खतरे के प्रति आगाह भी करते हैं। अगर दुर्भाग्यवश आपको कभी मरी हुई या घायल अवस्था में Cow In A Dream दिखाई दे, तो आपको तुरंत सतर्क हो जाने की बहुत सख्त जरूरत है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, मरे हुए पशु या मरी हुई गाय को सपने में देखना बेहद अशुभ और एक घोर नकारात्मक संकेत माना जाता है। इस तरह की डरावनी Cow In A Dream का सीधा सा मतलब है कि निकट भविष्य में आपको कोई बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है, या फिर आपके जीवन में कोई बहुत बड़ी परेशानी और संकट अचानक दस्तक दे सकता है। सपनों के सच होने का समय और कुछ अचूक उपाय हमारे प्राचीन भारतीय शास्त्रों और वेदों में इस बात का भी बहुत ही गहराई से वर्णन किया गया है कि रात के किस प्रहर में देखे गए सपने सच होते हैं। अगर आपने ब्रह्म मुहूर्त (यानी सुबह 3 बजे से लेकर 5 बजे के बीच) के अत्यंत पवित्र समय में Cow In A Dream देखी है, तो इसके शत-प्रतिशत सच होने की संभावना बहुत अधिक होती है। सुबह-सुबह इस तरह का शुभ सपना देखने का मतलब है कि ईश्वरीय शक्तियां खुद आपको यह अलौकिक संदेश दे रही हैं कि आपकी सोई

Seeing Cow In A Dream : सपने में गाय देखना शुभ या अशुभ ? जानें सटीक और विस्तृत अर्थ….. Read More »

Shatnam Stotram

Tripura Bhairavi Ashtottara Shatnam Stotram : त्रिपुर भैरवी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्…..

त्रिपुर भैरवी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Tripura Bhairavi Ashtottara Shatnam Stotram in Hindi ॥ श्रीदेव्युवाच ॥ कैलासवासिन्भगवन्प्राणेश्वर कृपानिधे ।भक्तवत्सल भैरव्या नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ १ ॥ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ न श्रुतं देवदेवेश वद मां दीनवत्सल ।शृणु प्रिये महागोप्यं नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ २ ॥ भैरव्याः शुभदं सेव्यं सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।यस्यानुष्ठानमात्रेण किं न सिद्ध्यति भूतले ॥ ३ ॥ ॐ भैरवी भैरवाराध्या भूतिदा भूतभावना ।कार्य्या ब्राह्मी कामधेनुः सर्वसम्पत्प्रदायिनी ॥ ४ ॥ त्रैलोक्यवन्दिता देवी Shatnam Stotram महिषासुरमर्द्दिनी ।मोहघ्नी मालतीमाला महापातकनाशिनी ॥ ५ ॥ क्रोधिनी क्रोधनिलया क्रोधरक्तेक्षणा कुहूः ।त्रिपुरा त्रिपुराधारा त्रिनेत्रा भीमभैरवी ॥ ६ ॥ देवकी देवमाता च Shatnam Stotram देवदुष्टविनाशिनी ।दामोदरप्रिया दीर्घा दुर्गा दुर्गतिनाशिनी ॥ ७ ॥ लम्बोदरी लम्बकर्णा प्रलम्बितपयोधरा ।प्रत्यङ्गिरा प्रतिपदा Shatnam Stotram प्रणतक्लेशनाशिनी ॥ ८ ॥ प्रभावती गुणवती गणमाता गुहेश्वरी ।क्षीराब्धितनया क्षेम्या जगत्त्राणविधायिनी ॥ ९ ॥ महामारी महामोहा महाक्रोधा महानदी ।महापातकसंहर्त्री महामोहप्रदायिनी ॥ १० ॥ विकराला महाकाला कालरूपा कलावती ।कपालखट्वाङ्गधरा खड्गखर्प्परधारिणी ॥ ११ ॥ कुमारी कुङ्कुमप्रीता कुङ्कुमारुणरञ्जिता ।कौमोदकी कुमुदिनी कीर्त्त्या कीर्त्तिप्रदायिनी ॥ १२ ॥ नवीना नीरदा नित्या नन्दिकेश्वरपालिनी ।घर्घरा घर्घरारावा घोरा घोरस्वरूपिणी ॥ १३ ॥ कलिघ्नी कलिधर्मघ्नी कलिकौतुकनाशिनी ।किशोरी केशवप्रीता क्लेशसङ्घनिवारिणी ॥ १४ ॥ महोत्तमा महामत्ता Shatnam Stotram महाविद्या महीमयी ।महायज्ञा महावाणी महामन्दरधारिणी ॥ १५ ॥ मोक्षदा मोहदा मोहा भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ।अट्टाट्टहासनिरता कङ्कणन्नूपुरधारिणी ॥ १६ ॥ दीर्घदंष्ट्रा दीर्घमुखी Shatnam Stotram दीर्घघोणा च दीर्घिका ।दनुजान्तकरी दुष्टा दुःखदारिद्र्यभञ्जिनी ॥ १७ ॥ दुराचारा च दोषघ्नी दमपत्नी दयापरा ।मनोभवा मनुमयी मनुवंशप्रवर्द्धिनी ॥ १८ ॥ श्यामा श्यामतनुः शोभा सौम्या शम्भुविलासिनी ।इति ते कथितं दिव्यं नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ १९ ॥ भैरव्या देवदेवेश्यास्तव प्रीत्यै सुरेश्वरि ।अप्रकाश्यमिदं गोप्यं पठनीयं प्रयत्नतः ॥ २० ॥ देवीं ध्यात्वा सुरां पीत्वा मकारपञ्चकैः प्रिये ।पूजयेत्सततं भक्त्या पठेत्स्तोत्रमिदं शुभम् ॥ २१ ॥ षण्मासाभ्यंतरे सोऽपि गणनाथसमो भवेत् ।किमत्र बहुनोक्तेन त्वदग्रे प्राणवल्लभे ॥ २२ ॥ सर्वं जानासि सर्वज्ञे पुनर्मां परिपृच्छसि ।न देयं परशिष्येभ्यो निन्दकेभ्यो विशेषतः ॥ २३ ॥ ॥ इति त्रिपुर भैरवी अष्टोत्तर शतनाम……

Tripura Bhairavi Ashtottara Shatnam Stotram : त्रिपुर भैरवी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्….. Read More »

Ratnamala Stotram

Srilakshmi Hayavadana Ratnamala Stotram : श्रीलक्ष्मी हयवदन रत्नमाला स्तोत्रम्…..

श्रीलक्ष्मी हयवदन रत्नमाला स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Srilakshmi Hayavadana Ratnamala Stotram in Hindi ।। श्रीलक्ष्मीहयवदनपरब्रह्मणे नमः ।। श्रीमते श्रीकृष्णब्रह्मतन्त्रपरकालयतीन्द्रमहादेशिकाय नमः ।श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मे नारायणाख्याने हयशिरउपाख्यानस्य व्याख्याने हयशिरोरत्नभूषणे तद्विवरणदीधितौ चपरिशीलितानां श्रुतीनामर्थस्य सङ्ग्राहक श्रीलक्ष्मीहयवदनरत्नमालास्तोत्रम् । वागीशाख्या श्रुतिस्मृत्युदितशुभतनोवसुदेवस्य मूर्तिः,ज्ञाता यद्वागुपज्ञं भुवि मनुजवेरैर्वाजिवक्त्रप्रसादात् ।प्रख्याताश्चर्यशक्तिः कविकथकहरिः सर्वतन्त्रस्वतन्त्रः,त्रय्यन्ताचार्यनामा मम हृदि सततं देशिकेन्द्रः स इन्धाम् ॥ १ ॥ सत्वस्थं नाभिपद्मे विधिमथ दितिजं राजसं तामसं चा-,ब्बिन्द्वोरुत्पाद्य ताभ्यामपहृतमखिलं वेदमादाय धात्रे ।दत्त्वा द्राक्तौ च हत्वा वरगणमदिशद्वेधसे सत्र आदौ,तन्त्रं चोपादिशद्यस्स मम हयशिरा मानसे सन्निधत्ताम् ॥ २ ॥ अध्यास्तेऽङ्कं परावाग् वरहयशिरसो भर्तुराचार्यके या,वाञ्छावानैतरेयोपनिषदि Ratnamala Stotram चरमात्प्राक्तने खण्ड आदौ ।यस्या वीणां च दैवीं मनसि विनिदधत्ख्यातिमेत्यन्त्यमन्त्रे,सेशाना सर्ववाचो मम हृदयगता चारु मां वादयेद्वाक् ॥ ३ ॥ कृष्णं विप्रा यमेकं विदुरपि बहुधा वेदयो (रैतरेये) रादिमान्ते,स्रष्टा विस्रंसमानस्स्वमथ समदधाच्छन्दसां येन दानात् ।कृष्ण विष्णुं च जिष्णुं Ratnamala Stotram कलयितुरपि यत्संहितामायुरुक्तं,वाक्श्लिष्टं प्राणमेनं हयमुखमनुसन्दध्महे किं वृथाऽन्यैः ॥ ४ ॥ प्रख्याता याऽऽश्वलायन्यधिकफलदशश्लोक्यभिख्या तदन्तः,श्रुत्युक्ता वाक् सरस्वत्यपि हयमुख ते शक्तिरन्या न युक्ता ।पूर्णा त्वच्छक्तिरर्धं भवति विधिवधूर्या नदी सा कलास्या,इत्युक्ते ब्रह्मवैवर्त इह समुदिता स्यात्परा निम्नगाऽन्या ॥ ५ ॥ श्रीहर्षों विष्णुपत्नीं वदति कविरिमा नैषधे मल्लिनाथः,ख्यातामेतां पुराणे हयमुख भुवि च स्थापितां विष्णुपार्श्वे ।धीवाग्मित्वार्थजप्यं दिनमुखसमये शौनकस्सूक्तमत्याः,श्रीयुक्तं बह्वृचस्स स्मृतिकृदपि तदा चिन्तनीयं तथैनाम् ॥ ६ ॥ वागाम्भृण्यादिसूक्ते निरवधिमहिमा या श्रुता वाक् च देवी,पूर्वे सूक्तेऽपि हंसस्त्वमधिकमहिमा Ratnamala Stotram विश्रुतो बह्वृचैर्यः ।युक्तावारण्यके तौ कथितबहुगुणौ सामनी संहितेत्य-,प्याराध्यो व्यूहरूपी हयमुखविदितो ज्ञानिनां कर्मभिस्त्वम् ॥ ७ ॥ इन्द्रो वृत्रं हनिष्यन् सखिवर वितरं विक्रमस्वेति विष्णुं,सम्प्रार्थ्यातो हतारिस्तत उपजनितब्रह्महत्त्यापनुत्त्यै ।सूक्ताभ्यामाहुतिं यं प्रति परमजुहोन्मूर्ध्नि गन्धर्व एको,देवानां नामधारी स मम दृढमतावद्य वाचस्पतिस्तात् ॥ ८ ॥ वेदे चाथर्वणाख्ये प्रथमत उदितं यत्त्रिषप्तीयसूक्तं,तन्मेधाजन्मकर्माङ्गमिति निगदितं कौशिकेन स्वसूत्रे ।मेधाकामः पुमान् यस्तुरगमुख ततस्सर्वलोकाधिनाथं,ध्यायेद्वाचस्पतिं त्वां प्रभवति सकलस्तच्छृतार्थोऽप्रकम्प्यः ॥ ९ ॥ नासन्नो सत्तदानीमपि तु कमलयाऽवातमेकं तदानीत्,तस्माद्धान्यत्परं किञ्चिदपि न Ratnamala Stotram तमसा गूढमग्रे प्रकेतम् ।अद्धा को वेद हेतुं द्विविधमविगुणं वासुदेवाभिधानं,व्यूहं त्वां प्रातरर्च्यं हयमुख भगमाहुः क्रमात्तैत्तिरीयाः ॥ १० ॥ प्रातःपूज्यं भगाख्यं प्रथममकथयन् बह्वृचाः पञ्चमेऽथो,नासत्सूक्तेऽष्टमे प्राग्वदपि समवदन् तैतिरीयक्रमात्त्वाम् ।पाराशर्योऽवतीर्णं वदति हयमुखाथर्वणः कौशिकस्त्वाम्,मेधार्थं प्रातरर्च्यं भगमनुमनुते संहिताऽप्याह साधु ॥ ११ ॥ प्रद्युम्नान्तं त्रिपाद्भास्वरवपुरमृतं वासुदेवादिबृन्दे,पादस्तत्रानिरुद्धो भुवि तत उदभूदात्मभूऋग्विधिज्ञाः ।हुत्वा त्वां यज्ञरूपं हयवदन Ratnamala Stotram जितन्ते स्तुतिं तन्वतेऽतः,निर्णीतं सर्ववेदेष्वनुपममिति तत्पौरुष सूक्तमाप्तैः ॥ १२ ॥ सर्वे वेदाः प्रजाश्च प्रचुरबहुभिदाः संश्रयन्ते यमेकम् ,शास्ता योऽन्तःप्रविष्टस्स्वयमपि Ratnamala Stotram दशधात्माचरत्यर्णवे यम् ।ब्रह्मा चैकोन्वविन्दद्धरिमिह दशहोतारमन्तश्च चन्द्रे,देवास्सन्तं सहैनं न हि विदुरवतात्सोऽद्य वाचस्पतिर्माम् ॥ १३ ॥ यस्माद्ब्रह्मा च रुद्रस्सकलजगदिदं जायतेऽन्तर्बहिर्यत्,व्याप्त्या सत्तां च यस्मिन् लयमपि लभते यश्चतुर्वेदमूर्तिः ।विष्णुर्नारायणोऽष्टाक्षरपदविदितो देवकीपुत्र एको,योथार्वाङ्गे मधोः सूदन उपनिषदि ज्ञायते मे स इन्धाम् ॥ १४ ॥ शक्तिः स्वाभाविकी सात्र च विविधपरा श्रूयते ज्ञानमेवं,त्रेधा तत्र क्रियेत्थं बलमपि तदसौ वासुदेवः स हंसः ।यो ब्रह्माणं विधाय प्रथममथ परान् प्राहिणोत्सर्ववेदान्,तस्मै देवं प्रपद्ये शरणमहमिमं चामृतस्यैष सेतुः ॥ १५ ॥ वम्र्यो विष्णोर्धनुर्ज्यां हयवदन वरान्नेच्छया चिच्छिदुस्तत् ,कोट्या च्छिन्नं च विष्णोः शिर इति गदितं यत्प्रवर्ग्यार्थवादे ।तच्छीर्षं याजमानं श्रुतिमुखत इदं स्थापित युक्तितोऽपि,प्रादुर्भावः स गौणो बहुमुखहरिवंशादिनिर्धारितो वा ॥ १६ ॥ शुक्लं वेदं विवस्वानुपदिशसि परं याज्ञवल्क्याय वाजी,वेदैकार्थैर्वचोभिर्मितमिदमखिलाम्नायधीकारिणीं याम् ।वाग्देवीं मोक्षधर्मे कथयति Ratnamala Stotram मुनिराट् तत्कृपालब्धभूमा,त्वच्छक्तिस्सेत्यकम्प्यं हयमुख गदितं ब्रह्मवैवर्तवाग्भिः ॥ १७ ॥ तस्माद्वेदेऽपि तत्रोपनिषदि बृहदारण्यके काण्ड आत्मा,त्वं वाग्देव्या सहादौ जनयसि Ratnamala Stotram मिथुनीभूय सर्वांश्च वेदान् ।धातारं तस्य पत्नीं तदनु तदुभयद्वारिकां व्यष्टिसृष्टिं,तद्यज्ञाराधितोऽस्मै हयवदन वरान्यच्छसीति प्रतीमः ॥ १८ ॥ तुर्येऽध्याये द्वितीयं तुरगमुख शिशुब्राह्मण व्यूहरूपम्,प्राण स्थूणां शिशुं त्वां चमसमपि शिरोऽर्वाग्बिलं चोर्ध्वबुध्नम् ।सप्तानां देवतानामधिकरणममित्रेन्द्रियाणां जयार्थं,वाचाष्टम्या युतं त्वां परिकलयति तद्ब्रह्म भक्तार्तिहारि ॥ १९ ॥ दध्यङ्ङाथर्वणोश्वित्रिदशकृतशिरोधारणादश्वमूर्ध्ना,ताभ्यां प्रावर्ग्यतत्त्वं हयमुख समुपादिक्षदेतद्यथार्थम् ।एतावत्येव तत्त्वे कलिबलवशतस्तामसाश्शक्त्यधीनं,भावत्कं शीर्षमाहुर्भुवि जनिसमये त्वत्कटाक्षातिदूराः ॥ २० ॥ दध्यङ्ङाथर्वणो यो हयमुख बृहदारण्यके काण्ड आदौ,आह प्रावर्ग्यतत्त्वं यदपि शतपथे दीक्षणीयार्थवादे ।विष्ण्वाख्यं तत्त्वमुक्तं पुनरुपनिषदि ब्रह्म वागीशरूपं,यच्च प्रोक्तं तृतीये तदपि च स मधुबराह्मणे वक्ति तुर्ये ॥ २१ ॥ वाचा देव्यानिरुद्धेन च सृजति जगत्सर्वमित्यग्र उक्तो,वाहास्यो वासुदेवः स पर इति मधुब्राह्मणं स्थापयित्वा ।दध्यङ्ङाथर्वणोश्वित्रिदशहितमधुत्वाष्ट्रकक्ष्योपदेष्टा,तत्त्वं जानाति चेत्यप्यखिलशुभतनुं वक्ति वागीश्वरं त्वाम् ॥ २२ ॥ दध्यङ्ङाथर्वणोऽसावुपदिशति मधुब्राह्मणं त्वाष्ट्रकक्ष्यं,यत्तन्नारायणाख्यं कवचमिति समाधुष्यते सात्विकाग्र्यैः ।वृत्रस्येदं वधायालमिति हयमुख ब्रह्मविद्येति तत्त्वं,वागीशैते न जानन्त्यनघ तव कृपाबाह्यतां ये प्रयाताः ॥ २३ ॥ तत्त्वं नारायणाख्योपनिषदि कथितं पञ्चरात्रोक्तरीत्या,तन्नामाख्यान आहाश्वमुख विशदमाद्यं च धर्मं मुनीन्द्रः ।गीतायां सङ्गृहीतं विशदयितुमनाः कृष्ण वाहाननैक्यं,ब्रूते वेदोदितत्वं स्थिरयति च तदत्रोक्त एकान्तिधर्मे ॥ २४ ॥ आदौ नारायणं तं वदति मधुजितं देवकीपुत्रमन्ते,वेदान्तो मोक्षधर्मे वरहयशिरसं प्राह कृष्णस्स्वमेव ।इत्यालोच्यैव योगी कलिजिदभिजगौ तत्क्रमात् स्तौति मध्ये,वाहास्य त्वां शठारिर्मुनिरपि मनुतेऽश्वं पुरः कृष्णमन्ते ॥ २५ ॥ जन्मादीनां निदानं कतिचिदकथयन् देवमेकं तथाऽन्ये,देवीमेकां विदुस्तन्मिथुनमविकलं ब्रह्म वेदान्तवेद्यम् ।इत्येवं स्थापयित्वा चिदचिदवियुतं श्रीमदेकं तदित्य-,प्याचख्यौ मोक्षधर्मे हयमुखजनिवृत्तापदेशान्मुनीन्द्रः ॥ २६ ॥ श्रावण्यां तेऽवतारे हयमुख निगमोद्धारणार्थत्वबुद्धेः,ऋग्वेदोपक्रमस्तच्छ्रवणभ इति निश्चिन्वते बह्वृचाग्र्याः ।प्रारम्भो पौर्णमास्यां यजुष इति परे याजुषाः सङ्गिरन्ते,तद्वेदोपक्रमान्ते भुवि विधिवशगास्त्वां समाराधयन्ति ॥ २७ ॥ विष्णोः पत्नी परा वागिति बहुमनुते भारती यां यदींशः,पत्युः प्राक्पञ्चरात्रं श्रुतिमपि समुपादिक्षदित्यादरेण ।तद्वागाश्लिष्टमूर्तिं हयशिरस उपाराधयन्ती निशम्य,श्रीभाष्यं लक्ष्मणाय स्वपतिविदित यत्याकृतिं बिभ्रतेऽदात् ॥ २८ ॥ वागीशानस्य मन्त्रं श्रुतिशिखरगुरुस्तार्क्ष्यलक्षं जपित्वा,प्राप्तं तत्काललालामृतमपिबदहीन्द्राख्यपुर्यां यतीन्दोः ।मातुर्भ्रातुस्तनूजोत्तमगुणकुरुकाधीशवंश्यार्चितां त-,न्मूर्ति सम्प्राप्य काञ्चयां स्वयमपि चिरमाराधयद्भक्तिभूम्ना ॥ २९ ॥ काले वेदान्तसूरिस्स्वपदमुपगतं ब्रह्मतन्त्रस्वतन्त्रं,शिष्याग्र्यं मूर्तिमेनां समनयदथ तच्छात्रपारम्परीतः ।सेयं वागीशमूर्तिर्गुरुवरपरकालादिभिः सेव्यमाना,रम्यास्थान्यां त्रिकालं विलसति विहितार्चाद्य कर्णाटदेशे ॥ ३०॥ धर्मं पूर्वाश्रमोक्तं सुकरमपि न कृत्वाऽन्तिमोक्तस्य तस्या-,नुष्ठानेऽशक्तिभीतं यमुखकृपणं लम्भयित्वाऽऽश्रमं तम् ।शोभोद्रेकादिनाऽर्चाविशय उपगते लक्ष(कोटि)पूजां तुलस्या,स्वोपाख्या व्याकृतिं चाकलयसि कियती मय्यनर्घा दया ते ॥ ३१ ॥ इत्थं वागीशपादूयुगलसततसंसेवनार्चादिदीक्षः,तत्रैतां नव्यरङ्गेश्वरयतिरनघामार्पयद्रत्नमालाम् ।एनां नित्यं पठन्तो भुवि मनुजवरा भक्तिभूनेप्सितार्थान्,सर्वान् विन्दन्ति वाहाननवरकरुणापाङ्गधाराभिषेकात्……

Srilakshmi Hayavadana Ratnamala Stotram : श्रीलक्ष्मी हयवदन रत्नमाला स्तोत्रम्….. Read More »

Karavalamba Stotram

Srilakshmi Narasimha Karavalamba Stotram : श्रीलक्ष्मी नरसिम्हा करावलंबा स्तोत्रम….

श्रीलक्ष्मी नरसिम्हा करावलंबा स्तोत्रम हिंदी पाठ : Srilakshmi Narasimha Karavalamba Stotram in Hindi श्रीमत्पयोनिधिनिकेतन चक्रपाणेभोगीन्द्रभोगमणिराजित पुण्यमूर्ते ।योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोतलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 1 ॥ ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटिसङ्घट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त ।लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंसलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 2 ॥ संसारदावदहनाकरभीकरोरु-ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य ।त्वत्पादपद्मसरसीरुहमागतस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 3 ॥ संसारजालपतिततस्य जगन्निवाससर्वेन्द्रियार्थ बडिशाग्र Karavalamba Stotram झषोपमस्य ।प्रोत्कम्पित प्रचुरतालुक मस्तकस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 4 ॥ संसारकूमपतिघोरमगाधमूलंसम्प्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य ।दीनस्य देव कृपया Karavalamba Stotram पदमागतस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 5 ॥ संसारभीकरकरीन्द्रकराभिघातनिष्पीड्यमानवपुषः सकलार्तिनाश ।प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 6 ॥ संसारसर्पविषदिग्धमहोग्रतीव्रदंष्ट्राग्रकोटिपरिदष्टविनष्टमूर्तॆः ।नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरेलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 7 ॥ संसारवृक्षबीजमनन्तकर्म-शाखायुतंकरणपत्रमनङ्गपुष्पम् ।आरुह्य दुःखफलितः चकितः दयालोलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 8 ॥ संसारसागरविशालकरालकालनक्रग्रहग्रसितनिग्रहविग्रहस्य ।व्यग्रस्य रागनिचयोर्मिनिपीडितस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 9 ॥ संसारसागरनिमज्जनमुह्यमानं दीनंविलोकय विभो करुणानिधे माम् ।प्रह्लादखेदपरिहारपरावतारलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 10 ॥ संसारघोरगहनॆ चरतो मुरारेमारोग्रभीकरमृगप्रचुरार्दितस्य ।आर्तस्य मत्रनिदाघसुदुःखितस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 11 ॥ बद्ध्वा गले यमभटा बहु तर्जयन्तकर्षन्ति यत्र भवपाशशतैर्युतं माम् ।ऐकाकिनं परवशं चकितं दयालोलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 12 ॥ लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णोयज्ञेश यज्ञ मधुसूदन विश्वरूप ।ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेवलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 13 ॥ ऐकेन चक्रमपरेण करेण शङ्खमन्येन सिन्धुतनयामवलम्ब्य तिष्ठन् ।वामेतरेण वरदाभयपद्मचिह्नंलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 14 ॥ अन्धस्य मे हृतविवेकमहाधनस्यचोरैर्महाबलिभिरिन्द्रियनामधेयैः ।मोहान्धकारकुहरे विनिपातितस्यलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 15 ॥ प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक-व्यासादिभागवतपुङ्गवहृन्निवास ।भक्तानुरक्तपरिपालनपारिजातलक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 16 ॥ लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेनस्तोत्रं कृतं शुभकरं भुवि शङ्करेण ।ये तत्पठन्ति मनुजा हरिभक्तियुक्ता-स्ते यान्ति तत्पदसरोजमखण्डरूपम्………

Srilakshmi Narasimha Karavalamba Stotram : श्रीलक्ष्मी नरसिम्हा करावलंबा स्तोत्रम…. Read More »

Dwadasanama Stotram

Srilakshmi Narsingh Dwadasanama Stotram : श्रीलक्ष्मी नृसिंह द्वादशनाम स्तोत्रम्…..

श्रीलक्ष्मी नृसिंह द्वादशनाम स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Srilakshmi Narsingh Dwadasanama Stotram in Hindi अस्य श्रीनृसिंह द्वादशनाम स्तोत्र महामन्त्रस्य वेदव्यासो भगवान् ऋषिः,अनुष्टुप् छन्दः श्रीलक्ष्मीनृसिंहो देवता श्रीलक्ष्मीनृसिंह प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः । प्रथमं तु महाज्वालो द्वितीयं तूग्रकेसरी ।तृतीयं वज्रदंष्ट्रश्च चतुर्थं तु विशारदः ॥ १ ॥ पञ्चमं नारसिंहश्च षष्ठः कश्यपमर्दनः ।सप्तमो यातुहन्ता च अष्टमो देववल्लभः ॥ २ ॥ ततः प्रह्लादवरदो दशमोऽनन्तहस्तकः । [नवं]एकादशो महारुद्रः द्वादशो दारुणस्तथा ॥ ३ ॥ द्वादशैतानि नामानि नृसिंहस्य महात्मनः ।मन्त्रराज इति प्रोक्तं सर्वपापविनाशनम् ॥ ४ ॥ क्षयापस्मार कुष्ठादि Dwadasanama Stotram तापज्वर निवारणम् ।राजद्वारे महाघोरे सङ्ग्रामे च जलान्तरे ॥ ५ ॥ गिरिगह्वारकारण्ये व्याघ्रचोरामयादिषु ।रणे च मरणे चैव शमदं परमं शुभम् ॥ ६ ॥ शतमावर्तयेद्यस्तु मुच्यते व्याधिबन्धनात् ।आवर्तयन् सहस्रं तु लभते वाञ्छितं फलम् ॥ ७ ॥ ।। इति श्री नृसिंह द्वादशनाम…..

Srilakshmi Narsingh Dwadasanama Stotram : श्रीलक्ष्मी नृसिंह द्वादशनाम स्तोत्रम्….. Read More »

Nama Stotram

Srilakshmi Dwadasa Nama Stotram : श्रीलक्ष्मी द्वादश नाम स्तोत्रम्…..

श्रीलक्ष्मी द्वादश नाम स्तोत्रम् हिंदी पाठ : Srilakshmi Dwadasa Nama Stotram in Hindi श्रीदेवी प्रथमं नाम द्वितीयं अमृत्तोद्भवातृत्तीयं कमला प्रोक्ता चतुर्थं लोकसुन्दरी पञ्चमं विष्णुपत्नी च षष्ठं स्यात् वैष्णवीतथा  सप्ततं तु वरारोहा अष्टमं हरिवल्लभा नवमं शार्गिंणी प्रोक्ता दशमं देवदेविकाएकादशं तु लक्ष्मीः स्यात् द्वादशं श्रीहरिप्रिया ।। द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः,आयुरारोग्यमैश्वर्यं तस्य पुण्यफलप्रदम् ।। द्विमासं सर्वकार्याणि Nama Stotram षण्मासाद्राज्यमेव च,संवत्सरं तु पूजायाः श्रीलक्ष्म्याः पूज्य एव च ।। लक्ष्मीं क्षीरसमुद्रराजतनयां श्रीरङ्गधामेश्वरीं,दासीभूत समस्त देववनितां लोकैक दीपांकुराम् ।। श्रीमन्मन्दकटाक्ष लब्ध विभव ब्रह्मेन्द्र गंगाधरां,त्वां त्रैलोक्य कुटुंबिनीं सरसिजां वन्दे मुकुन्दप्रियाम् ।। ।। इति श्रीलक्ष्मी द्वादश नाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम्………

Srilakshmi Dwadasa Nama Stotram : श्रीलक्ष्मी द्वादश नाम स्तोत्रम्….. Read More »

Ashtakam Stotra

Srimad Divya-Parshuram Ashtakam Stotram : श्रीमद् दिव्य-परशुराम अष्टक स्तोत्र….

श्रीमद् दिव्य-परशुराम अष्टक स्तोत्र हिंदी पाठ : Srimad Divya-Parshuram Ashtakam Stotram in Hindi ब्रह्मविष्णुमहेशसन्नुतपावनाङ्घृसरोरुहं,नीलनीरजलोचनं हरिमाश्रितमर्भुरुहम् ।केशवं जगदीश्वरं त्रिगुणात्मकं परपुरुषं,परशुराममुपास्महे मम किङ्कृष्यति योऽपि वै ॥ 1 ॥ अक्षयं कलुषपहं निरुद्रवं करुणानिधिं,वेदरूपमनामयं विभुमच्युतं भगवानम् ।हर्षदं जमदग्निपुत्रकमार्यजुष्टपदम्बुजं,परशुराममुपास्महे मम किङक्रिष्यति योऽपि वै ॥ 2 ॥ रेनुकेयामहीनसत्वकमव्ययं सुजानार्चितं,विक्रमाद्यमिनाबजनेत्रकमब्जशार्ङ्गगदाधरम् ।छत्रिताहिमशेषविद्यागमष्टमूर्तिमनाश्रयं,परशुराममुपास्महे मम किङकृष्यति योऽपि वै ॥ 3 ॥ बहुजान्वयवर्णङकुशमर्वकण्ठमनुत्तमं ,सर्वभूतदयापरं शिवमबधिशायिनमौरवजम् ।भक्तशत्रुजनार्दनं Ashtakam Stotram निरयार्दनं कुजनार्दनं,परशुराममुपासमहे मम किङक्रिष्यति योऽपि वै ॥ 4 ॥ जम्भयज्ञविनायकञ्च त्रिविक्रमं दनुजन्तकं,निर्विकर्मगोचरं नरसिंहरूपमनार्धम् ।वेदभद्रपद तैतिनमिन्दिराधिमिष्टदं,परशुराममुपासमहे मम किङ्कृष्यति योऽपि वै ॥ 5 ॥ निर्जरां गरुड़ध्वजं धरणीश्वरं परमोददं,सर्वदेवमहर्षिभूशुरगीतरूपमरूपकम् ।भूमतापसवेशधारिणमदृश्च महमहं,परशुराममुपासमहे मम किङकृष्यति योऽपि वै ॥ 6 ॥ समलोलमभद्रानायकमादिमूर्तिमिलासुरं,सर्वतोमुखमक्षिकर्षकमर्यदु:खहरकालौ ।वेङ्कटेश्वररूपकं Ashtakam Stotram निजभक्तपालनदीक्षितं,परशुराममुपासमहे मम किङकृष्यति योऽपि वै ॥ 7 ॥ दिव्यविग्रहधारिणं निखिलाधिपं परमं महा-,वैरिसूदनपंडितं गिरिजात्पूजितरूपकम् ।बहुलेयकुर्गर्वहारकमाश्रितावळितरकं,परशुराममुपास्महे मम किङकृष्यति योऽपि वै ॥ 8 ॥ परशुरामाष्टकमिदं त्रिसंध्यं यः पथेनरः,परशुरामकृपासारं सत्यं प्राप्नोति सत्वरम् ॥ ॥ इति श्रीमद् दिव्य-परशुराम अष्टक स्तोत्र सम्पूर्णम्…..

Srimad Divya-Parshuram Ashtakam Stotram : श्रीमद् दिव्य-परशुराम अष्टक स्तोत्र…. Read More »

Ekadashi Vrat Niyam

Nirjala Ekadashi Vrat Niyam : निर्जला एकादशी शुभ मुहूर्त 2026 और अचूक पूजा विधि….

Nirjala Ekadashi Vrat Niyam : सनातन धर्म और भारतीय वैदिक संस्कृति में भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित सभी 24 एकादशियों में से ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली निर्जला एकादशी को सबसे अधिक पुण्यदायी, जाग्रत और श्रेष्ठ माना गया है। धार्मिक और पौराणिक मान्यता है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन और पूरी निष्ठा से Nirjala Ekadashi Vrat Niyam का पालन करता है, उसे साल भर की सभी 24 एकादशियों का पुण्य फल एक साथ स्वतः ही मिल जाता है। इस वर्ष यह अत्यंत पवित्र महाव्रत 25 जून 2026, दिन गुरुवार को पूरे भारतवर्ष में अपार श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ रखा जाएगा। अगर आप पहली बार यह उपवास कर रहे हैं या अपनी पुरानी गलतियों को सुधारना चाहते हैं, तो Nirjala Ekadashi Vrat Niyam को अच्छी तरह से जानना और समझना आपके लिए बहुत ही ज्यादा जरूरी है। आज के इस अत्यंत विस्तृत और ज्ञानवर्धक लेख में हम आपको व्रत के सभी कठोर नियमों, शुभ मुहूर्तों और पारण की सही विधि के बारे में विस्तार से बताएंगे। Nirjala Ekadashi Vrat Niyam : निर्जला एकादशी शुभ मुहूर्त…. सटीक तिथि, भद्रा का साया और 4 दुर्लभ शुभ योग : Exact date, the shadow of Bhadra, and 4 rare auspicious Yogas. पंचांग की सटीक और वैज्ञानिक गणना के अनुसार, ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तिथि 24 जून 2026 की रात 8 बजकर 9 मिनट पर शुरू हो जाएगी और इसका पूर्ण समापन अगले दिन यानी 25 जून 2026 को रात 9 बजकर 14 मिनट पर होगा। हमारे हिंदू धर्म में उदया तिथि (सूर्योदय की तिथि) का सर्वाधिक महत्व है, इसलिए यह व्रत 25 जून को ही रखा जाएगा। शास्त्रों में Nirjala Ekadashi Vrat Niyam को बहुत ही कठोर और विशेष माना गया है, और इस बार तो 25 जून को चार अत्यंत दुर्लभ शुभ योगों का महासंयोग भी बन रहा है। इस पावन दिन रवि योग (सुबह 05:25 से शाम 04:29 तक), शिव योग (सुबह 10:22 से पूरे दिन) और सिद्ध योग (सुबह 10:53 से पूरे दिन) रहेंगे। इसके साथ ही, यह एकादशी गुरुवार के दिन पड़ रही है, जो स्वयं भगवान विष्णु का अत्यंत प्रिय दिन है। इस दिन सुबह 7 बजकर 8 मिनट से रात 8 बजकर 9 मिनट तक भद्रा का साया भी रहेगा, लेकिन ज्योतिष विद्वानों के अनुसार यह भद्रा पाताल लोक में निवास करेगी, इसलिए पूजा-पाठ में इसका कोई भी अशुभ प्रभाव या बाधा नहीं आएगी। दशमी तिथि से शुरू होने वाले नियम : Rules commencing on the Dashami Tithi बहुत से लोग यह सोचते हैं कि उपवास केवल एकादशी के दिन होता है, लेकिन असल में व्रत के एक दिन पहले यानी दशमी की रात से ही Nirjala Ekadashi Vrat Niyam लागू हो जाते हैं। दशमी के दिन सूर्यास्त के बाद भारी भोजन नहीं करना चाहिए। इस रात केवल सात्विक और हल्का भोजन ग्रहण करें तथा भगवान श्री हरि का ध्यान करते हुए जमीन पर ही सोएं। अन्न और जल का पूर्ण त्याग (सबसे प्रमुख नियम) : Complete abstention from food and water (the most important rule) जैसा कि इस व्रत के नाम से ही स्पष्ट है- ‘निर्जला’ अर्थात बिना जल के। एकादशी तिथि के सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक पानी और अन्न का पूर्ण रूप से त्याग करना ही सबसे प्रमुख Nirjala Ekadashi Vrat Niyam है। महाभारत काल की पौराणिक कथाओं में इसे ‘भीमसेनी एकादशी’ भी कहा गया है, क्योंकि महाबली भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास जी के कहने पर केवल इसी एक दिन बिना जल और अन्न के अत्यंत कठोर तपस्या करके साल भर का पुण्य प्राप्त कर लिया था। मानसिक संयम और ब्रह्मचर्य का कड़ा पालन : Strict observance of mental restraint and celibacy. केवल शरीर से भूखे-प्यासे रहना ही काफी नहीं है, बल्कि विचारों की और मानसिक शुद्धता भी Nirjala Ekadashi Vrat Niyam का एक बहुत बड़ा और अभिन्न हिस्सा है। व्रत के पूरे 24 घंटों के दौरान व्यक्ति को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इसके अलावा, मन में किसी के भी प्रति क्रोध, ईर्ष्या या घृणा का भाव बिल्कुल नहीं लाना चाहिए। झूठ बोलना, वाद-विवाद करना या दूसरों की बुराई (चुगली) करना व्रत के प्रभाव को पूरी तरह से नष्ट कर देता है। मन की शांति और शुद्धता के बिना इस पवित्र व्रत का कोई फल प्राप्त नहीं होता। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की अचूक पूजा विधि : The infallible method of worshipping Lord Vishnu and Goddess Lakshmi. व्रत के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 04:05 से 04:45 बजे) में उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें। पूजा-पाठ के दौरान Nirjala Ekadashi Vrat Niyam के अनुसार भगवान विष्णु और धन की देवी मां लक्ष्मी की संयुक्त रूप से विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। भगवान को पीले फल, पीले फूल, अक्षत और विशेष रूप से तुलसी दल (पत्ते) अर्पित करें। भगवान के समक्ष शुद्ध घी का दीपक जलाएं और दिन भर ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र, विष्णु सहस्रनाम या एकादशी व्रत कथा का एकाग्रता से पाठ करें। इन मंत्रों के जाप से जीवन के सभी जाने-अनजाने किए गए पापों का नाश होता है। पारण का शुभ समय, सात्विक आहार और दान का भारी महत्व : The auspicious time for breaking the fast, Sattvic diet, and the immense significance of charity. अगले दिन यानी द्वादशी को दान और पारण के बिना Nirjala Ekadashi Vrat Niyam पूरे नहीं माने जाते। इस वर्ष व्रत के पारण का सबसे शुभ और सटीक मुहूर्त 26 जून 2026 की सुबह 5 बजकर 25 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 13 मिनट तक रहेगा। पारण करने से पहले किसी गरीब, असहाय या योग्य ब्राह्मण को अन्न, जल, छाता, वस्त्र या अपनी क्षमता के अनुसार धन का दान अवश्य करें। भीषण गर्मी के इस मौसम में जल का दान करना सबसे बड़ा महापुण्य माना जाता है। पारण हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करें। उपवास खोलने के बाद जो भी भोजन आप ग्रहण करें, वह पूरी तरह से सात्विक होना चाहिए। इस दिन भूलकर भी…………

Nirjala Ekadashi Vrat Niyam : निर्जला एकादशी शुभ मुहूर्त 2026 और अचूक पूजा विधि…. Read More »