MYTHOLOGICAL PLACE

सृष्टि के रचयिता ब्रम्ह देव के 4 सिर क्यों है, जानें इसकी पौराणिक कथा

हिन्दू धर्म कई रहस्यों से भरा हुआ है. जितना जानने की कोशिश करें उतना ही कम है. हिन्दू पुराणों में उल्लेख है कि सृष्टि की रचना परमपिता ब्रम्हा द्वारा की गई है. हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार संसार के जीव-जंतु, पेड़-पौधे, नर-नारी सभी की रचना भगवान ब्रम्हा ने की है. यह कार्य उन्हें भगवान शिव ने सौंपा था. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सृष्टि की रचना के समय ब्रम्हा के 5 मुख हुआ करते थे, और इन्हीं से वह सभी दिशाओं में देखा करते थे, लेकिन आज हम जहां भी देखते हैं वहां तस्वीरों में ब्रम्ह देव के 4 मुख ही दिखाए जाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रह्म देव का 5वां सिर कहां गया? आइए जानते हैं. माँ सरस्वती की कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार हिन्दू पौराणिक कथाओं में सारी सृष्टि, जीव-जंतु, पेड़-पौधे, नर-नारी सभी भगवान ब्रम्हा द्वारा रचित बताए गए हैं. ऐसा माना जाता है कि भगवान ब्रम्हा के चार सिर हैं जो चारों वेदों के प्रतीक हैं. ब्रम्ह देव का एक सिर और हुआ करता था. मतलब उनके कुल 5 सिर थे. कथाओं में उल्लेख मिलता है कि जब ब्रह्म देव ने सारी सृष्टि की रचना कर ली, तब सृष्टि में मानव विकास के लिए उन्होंने एक बेहद सुन्दर स्त्री को बनाया. जिसका नाम सतरूपा था. देवी सतरूपा वैसे तो ब्रम्हा की पुत्री थीं. परन्तु वे इतनी सुन्दर थीं कि ब्रम्ह देव उनको देखते ही उनपर मोहित हो गए और उनको अपनाने के लिए आगे बढ़े, देवी सतरूपा उनसे बचने के लिए हर दिशा की तरफ जाने लगीं लेकिन ब्रम्ह देव ने अपने 3 सिर और उत्पन्न कर हर तरफ से देवी सतरूपा को देखना नहीं छोड़ा. जब सतरूपा ब्रम्ह देव की नजरों से नहीं बच पाईं. तब वे ऊपर की तरफ दौड़ने लगीं. उस समय ब्रम्ह देव ने अपने एक और सिर की उत्पत्ति की जो ऊपर की तरफ देख सके. देवी सतरूपा की ब्रम्हा से बचने की हर कोशिश नाकाम साबित हो गई. भगवान शिव ब्रम्ह देव की ये सब हरकतें देख रहे थे. शिव की दृष्टि में सतरूपा ब्रह्मा की पुत्री थीं, इसीलिए उन्हें यह घोर पाप लगा. इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने एक गण भगवान भैरव को प्रकट किया और भगवान भैरव ने ब्रह्म देव का पांचवा सिर काट दिया. ताकि सतरूपा को उनकी कुदृष्टि से बचाया जा सके. जब ब्रम्हा का पांचवां सिर कट गया तब उन्हें होश आया और उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ.  (Disclaimer इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)

सृष्टि के रचयिता ब्रम्ह देव के 4 सिर क्यों है, जानें इसकी पौराणिक कथा Read More »

कौन थे सीता माता के दो भाई जिनका रामायण में नहीं मिलता जिक्र

हम सभी ने पढ़ा, सुना और देखा है कि माता सीता की तीन बहनें थीं लेकिन आज हम आपको माता सीता के उन भाइयों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनका जिक्र रामयण में नहीं मिलता है।   रामायण में राजा जनक की चार पुत्रियों का वर्णन मिलता है जो कुछ इस प्रकार है- माता सीता, उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति। इस तथ्य से यह पता चलता है कि माता सीता की मात्र तीन बहनें ही थीं लेकिन कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि माता सीता के दो भाई भी थे। हालांकि माता सीता के इन भाइयों के बार में रामयण में कोई भी बात वर्णित नहीं है। हमें बताया कि रामायण में भले ही माता सीता के भाइयों का उल्लेख नहीं मिलता है लेकिन अन्य ग्रंथों में माता सीता के भाइयों के नाम और उनके बारे में जानकारी दी गई हैं। तो चलिए जानते हैं कौन थे माता सीता के भाई। पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता सीता और श्री राम का विवाह तय हुआ था तब विवाह के समय ब्रह्महर्षि वशिष्ठ एवं राजर्षि विश्वामित्र उपस्थित थे। यहां तक कि श्री राम  और मात सीता का विवाह देखने स्वयं ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र ब्राह्मणों के वेश में आए थे। दूसरी ओर सभी देवी और देवता भी विभिन्न वेश में विवाह के दौरान उपस्थित थे। विवाह का मंत्रोच्चार चल रहा था और उसी बीच कन्या के भाई द्वारा की जाने वाली रस्म की बारी आई। इस रस्म में कन्या का भाई कन्या के आगे-आगे चलते हुए लावे का छिड़काव करता है। विवाह करवाने वाले पुरोहित ने जब इस प्रथा के लिए कन्या के भाई को बुलाने के लिए कहा तो वहां समस्या खड़ी हो गई, क्योंकि उस समय तक जनक का कोई पुत्र नहीं था।   ऐसे में सभी एक दूसरे से विचार करने लगे। इसके चलते विवाह में विलंब होने लगा। अपनी पुत्री के विवाह में इस प्रकार विलम्ब होता देखकर पृथ्वी माता भी दुखी हो गयी। तभी विवाह के समारोह के बीच एक रक्तवर्ण का युवक उठा और इस रस्म को पूरा करने के लिए आकर खड़ा हो गया। उस युवक ने राजा जनक से माता सीता के भाई द्वारा की जाने वाली रस्म निभाने का आग्रह किया।  असल में वह और कोई नहीं बल्कि स्वयं मंगलदेव थे जो वेश बदलकर नवग्रहों सहित श्रीरामचन्द्र और सीता का विवाह देखने हेतु वहां उपस्थित हुए थे। चूंकि माता सीता का जन्म पृथ्वी से हुआ और मंगल भी पृथ्वी के पुत्र थे। इसी सम्बन्ध से मंगलदेव माता सीता के भाई भी लगते थे। इसी कारण पृथ्वी माता के संकेत से वे इस विधि को पूर्ण करने के लिए आगे आए। वहीं, अन्य पौराणिक कथा के अनुसार राजा जनक के छोटे भाई के पुत्र थे लक्ष्मीनिधि जो रिश्ते में मात सीता के भाई लगते थे। तो इस प्रकार माता सीता के दो भाई थे एक मंगल और दूसरे लक्ष्मी निधि। हालांकि मंगल ग्रह के माता सीता के भाई होने पर सनातनियों द्वारा पुष्टि की गई है लेकिन लक्ष्मीनिधि नामक भाई के बारे में कोई खास प्रमाण नहीं मिलता है।  तो ये थे माता सीता के वो दो भाई जिनका जिक्र रामायण में साक्षात रूप से नहीं मिलता है। अगर हमारी स्टोरीज से जुड़े आपके कुछ सवाल हैं, तो वो आप हमें आर्टिकल के नीचे दिए कमेंट बॉक्स में बताएं। हम आप तक सही जानकारी पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

कौन थे सीता माता के दो भाई जिनका रामायण में नहीं मिलता जिक्र Read More »

रविवार, पीपल व लक्ष्मी माता का गहरा संबंध, जानने के लिए पढ़ें ये पौराणिक कथा

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ वास्तु शास्त्र के अलावा हमारे हिंदू धर्म में भी पेड़-पौधों को बहुत महत्व प्रदान है। यही कारण है कि इनकी विधि वत पूजा का विधान है। इन्हीं में से एक है पीपल का पेड़ जिसे ब्रह्मा जी का रूप माना जाता है। पौराणिक व धार्मिक मतों के अनुसार पीपल पर जल चढ़ाने से व इनकी पूजा करने से कई तरह के लाभ प्राप्त होते हैं। परंतु क्या आप जानते हैं इसकी पूजा करने समय दिन वार का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है। दरअसल शास्त्रों में पीपल के वृक्ष से जुड़ी एक कथा वर्णित है, जिसमें बताया गया है कि सप्ताह का एक ऐसा भी दिन होता है जिस दौरान पीपल के वृक्ष की पूजा करना फलदायी नहीं कष्टकारी साबित होता है। तो अगर आप जानना चाहते हैं कि कौन सा है वो दिन व क्या इसके पीछे की पौराणिक कथा तो आगे की जानकारी को ध्यान से पढ़िए। पीपल के वृक्ष बारे में एक कथा प्रचलित है कि, एक बार माता लक्ष्मी और उनकी छोटी बहन दरिद्रा श्री विष्णु के पास गई और उनसे बोली, हमें कहीं तो रहने का स्थान दो। तब भगवान विष्णु ने उन्हें पीपल के वृक्ष पर वास करने को कहा। इसलिए पीपल पर जल चढ़ाने से धन-संपदा की परेशानी दूर हो जाती है।  तो वहीं रविवार को पीपल की पूजा नहीं की जाती क्योंकि जब विष्णु भगवान ने माता लक्ष्मी से विवाह करना चाहा तो लक्ष्मी माता ने मना कर दिया था क्योंकि उनकी बहन दरिद्रा का विवाह नहीं हुआ था। दरिद्रा के विवाह के उपरांत ही वह श्री हरी विष्णु से विवाह कर सकती थी। उन्होंने दरिद्रा से पूछा,” वो कैसा वर पाना चाहती हैं।”तो वह बोली कि,” वह ऐसा पति चाहती हैं जो कभी पूजा-पाठ न करे और उसे ऐसे स्थान पर रखे जहां कोई भी पूजा-पाठ न करता हो। तब श्री विष्णु ने उनके लिए ऋषि नामक वर चुना और दोनों विवाह सूत्र में बंध गए। अब दरिद्रा की शर्तानुसार उन दोनों को ऐसे स्थान पर वास करना था जहां कोई भी धर्म कार्य न होता हो। ऋषि उसके लिए उसका मन भावन स्थान ढूंढने निकल पड़े लेकिन उन्हें कहीं पर भी ऐसा स्थान नही मिला। दरिद्रा उनकी प्रतीक्षा में विलाप करने लगी और यहाँ श्री विष्णु ने दोबारा लक्ष्मी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो लक्ष्मी जी बोली,” जब तक मेरी बहन की गृहस्थी नहीं बसती मैं विवाह नहीं करूंगी। धरा पर ऐसा कोई स्थान नहीं है।  जहां कोई धर्म कार्य न होता हो। उन्होंने अपने निवास स्थान पीपल को रविवार के लिए दरिद्रा व उसके पति को दे दिया। इसलिए हर रविवार पीपल के नीचे देवताओं का वास न होकर दरिद्रा का वास होता है। यही वजह है कि इस दिन पीपल की पूजा वर्जित मानी जाती है। इसी लोक विश्वास के आधार पर लोग पीपल के वृक्ष को काटने से आज भी डरते हैं, लेकिन साथ में यह भी बताया गया है कि यदि पीपल के वृक्ष को काटना-छांटना बहुत ही आवश्यक हो तो उसे रविवार को ही काटा-छांटा जा सकता है।

रविवार, पीपल व लक्ष्मी माता का गहरा संबंध, जानने के लिए पढ़ें ये पौराणिक कथा Read More »

कौन थे भगवान शिव के प्रथम शिष्य, जानें भगवान शिव से जुड़े 7 अनजान रहस्य

शिव या महादेव सनातन संस्कृति में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक है। वह त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव महादेव भी कहते हैं। इन्हें भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधार आदि  कई नामों से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है। शिव हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। शंकर जी को संहार का देवता कहा जाता है। शंकर जी सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं। रावण, शनि, कश्यप ऋषि आदि इनके भक्त हुए है। शिव सभी को समान दृष्टि से देखते है इसलिये उन्हें महादेव कहा जाता है। पुराणों के अनुसार भोलेनाथ स्वयंभू है लेकिन भोलेनाथ से जुड़ी की रहस्यमयी कथाएं प्रचलित हैं। आइए आपको भगवान शिव से जुड़े कुछ ऐसे रहस्यों के बारे में बताते हैं जो शायद ही लोगों को पता है। भगवान शिव की उत्पत्ति  भगवान शिव स्वयंभू हैं, लेकिन पुराणों में उनकी उत्पत्ति का विवरण मिलता है। विष्णु पुराण के अनुसार जहां भगवान विष्णु ब्रह्माजी की नाभि से उत्पन्न हुए वहीं शिव विष्णु जी के माथे के तेज से उत्पन्न हुए, ऐसा उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण के अनुसार माथे के तेज से उत्पन्न होने के कारण ही शिव-शंभू हमेशा योगमुद्रा में रहते हैं।  शिव और शंकर एक ही हैं कुछ पुराणों में भगवान शंकर को शिव इसलिए कहते हैं क्योंकि वे निराकार शिव के समान है। निराकार शिव को शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है। शंकर को हमेशा योगी के रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए चित्रित किया गया है। अतः शिव और शंकर दो अलग सत्ताएं हैं। मान्यता है कि महेश(नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं और रुद्रदेवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं। भगवान शिव से हुई असुरों की उत्पत्ति  पुराणों के अनुसार जालंधर नामक राक्षस की उत्पत्ति भगवान शंकर के तेज से हुई थी। इसलिए जालंधर को भगवान शिव का एक अंश माना जाता है। अन्य मान्यता के अनुसार भूमा नामक असुर कि उत्पत्ति भगवान भोलेनाथ के पसीने की बूंद से हुई थी। इसके अतिरिक्त कुछ पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि अंधक और खुजा भी भगवान शंकर के पुत्र थे परन्तु धर्म शास्त्रों में इन दोनों का कहीं कोई उल्लेख प्राप्त नहीं है।  शिव के प्रथम शिष्य पुराणों के अनुसार भगवान शिव के प्रारम्भिक शिष्य सप्तऋषि माने जाते हैं। मान्यता है कि सप्तऋषियों ने भगवान शिव के ज्ञान का प्रचार प्रसार पृथ्वी पर किया था जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। मान्यता है कि भगवान शिव ने ही गुरु शिष्य की परंपरा का आरंभ किया था। शिव के शिष्यों में बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेंद्र, प्राचेतस मनु, भारद्वाज शामिल थे। शिव की पत्नियां ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव की दो पत्नियां थी पहली देवी सती और दूसरी माता पार्वती। लेकिन यदि हिन्दू पौराणिक कथाओं की मानें तो भगवान नीलकंठेश्वर ने एक दो नहीं बल्कि चार विवाह किए थे। उन्होंने यह सभी विवाह आदिशक्ति के साथ ही किए थे।  भगवान शिव ने पहला विवाह माता सती के साथ किया जो कि प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। माता सती के पिता द्वारा भगवान शिव का अपमान न सह पाने के कारण उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसके बाद हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्मी आदिशक्ति ने भगवान शिव से दूसरा विवाह किया। हमारे धर्मग्रंथों में भगवान शिव का तीसरी पत्नी देवी उमा को बताया गया है। देवी उमा को भूमि की देवी भी कहा जाता है। भगवान शिव की चौथी पत्नी मां महाकाली को बताया गया है। उन्होंने इस पृथ्वी पर भयानक दानवों का संहार किया और तीनो लोक की रक्षा की। भगवान शिव क्यों लगाते हैं भस्म  भगवान शिव के भस्म लगाने की पीछे कई मान्यता जुड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव को मृत्यु का स्वामी माना गया है।  इसी वजह से ‘शव’ से ‘शिव’ नाम बना।  महादेव के मुताबिक शरीर नश्वर है और इसे एक दिन भस्म की तरह राख हो जाना है।  जीवन के इस पड़ाव के सम्मान में शिव जी अपने शरीर पर भस्म लगाते हैं। एक अन्य कथा के अनुसार जब देवी सती ने क्रोध में आकर खुद को अग्नि के हवाले कर दिया था, उस वक्त भगवान शंकर  उनका शव लेकर धरती से आकाश तक हर जगह घूमे थे। विष्णु जी से उनकी यह दशा देखी नहीं गई और उन्होंने माता सती के शव को छूकर भस्म में तब्दील कर दिया। अपने हाथों में भस्म देखकर शिव जी और परेशान हो गए और सती की याद में वो राख अपने शरीर पर लगा ली।  भगवान शिव हर युग में थे उपस्थित  भगवान शिव को आदिपुरुष कहा जाता है। और इसी वजह से माना जाता है भोलेनाथ ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जिन्होंने हर युग में अपने भक्तों को दर्शन दिए हैं। सतुग में समुद्र मंथन के समय वे उपस्थित थे। त्रेतायुग में भगवान राम ने भी रामेश्वरम में उनके शिवलिंग रूप की आराधना की। रात्रि प्रवास के दौरान राम को स्वप्न में शिवलिंग का दर्शन हुआ था। द्वापरयुग में भगवान शिव स्वयं कृष्ण के बालरूप के दर्शन करने गोकुल पहुंचे थे। और कलयुग में राजा विक्रमादित्य कि तपस्या प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए थे, ऐसा उल्लेख मिलता है

कौन थे भगवान शिव के प्रथम शिष्य, जानें भगवान शिव से जुड़े 7 अनजान रहस्य Read More »

कहां और कैसे हुई शिवलिंग की उत्पत्ति, जानिए शिवजी से जुड़े ये रहस्य

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस ब्रह्मांड के सृष्टि बनने से पहले पृथ्वी एक अंतहीन शक्ति थी। सृष्टि बनने के बाद भगवान विष्णु पैदा हुए और भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की नाभि से पैदा हुए भगवान ब्रह्मा। पृथ्वी पर पैदा होने के बाद कई सालों तक इन दोनों में युद्ध होता रहा है। दोनों आपस में एक दूसरे को ज्यादा शक्तिशाली मानते रहे। तभी आकाश में एक चमकता हुआ पत्थर दिखा और आकाशवाणी हुई कि जो इस पत्थर का अंत ढूंढ लेगा, उसे ही ज्यादा शक्तिशाली माना जाएगा। वह पत्थर शिवलिंग था। भगवान शिव को भक्त शिवशंकर, त्रिलोकेश, कपाली, नटराज समेत कई नामों से पुकराते हैं। भगवान शिव की महिमा अपरंपार है। हिंदू धर्म में भगवान शिव की मूर्ति व शिवलिंग दोनों की पूजा का विधान है। कहते हैं कि जो भी भक्त भगवान शिव की सच्ची श्रद्धा से पूजा-अर्चना करता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है। धार्मिक शास्त्रों में शिवलिंग का महत्व बताया गया है. शिवलिंग को इस ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है. तो चलिए पंडित इंद्रमणि घनस्याल से जानते हैं शिवलिंग से जुड़ी कुछ रोचक बातें। मान्यता है कि शिवलिंग की पूजा समस्त ब्रह्मांड की पूजा के बराबर मानी जाती है, क्योंकि शिव ही समस्त जगत के मूल हैं। शिवलिंग के शाब्दिक अर्थ की बात की जाए तो ‘शिव’ का अर्थ है ‘परम कल्याणकारी’ और ‘लिंग’ का अर्थ होता है ‘सृजन’। लिंग का अर्थ संस्कृत में चिंह या प्रतीक होता है। इस तरह शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक। भगवान शिव को देव आदिदेव भी कहा जाता है। जिसका मतलब है कोई रूप ना होना। भगवान शिव अनंत काल और सृजन के प्रतीक हैं। भगवान शिव प्रतीक हैं, आत्मा के जिसके विलय के बाद इंसान परमब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। शिव जी की पूजा ही क्यों होती है लिंग रूप में, जानें अद्भुत रहस्य महार्षि भृगु जी द्वारा रचित ग्रंथ भृगु संहिता जो कि ताम्र पत्रों पर लिखित सुल्तानपुर लोधी में स्थित है। इस प्राचीन ग्रंथ में भगवान शिव जी की शिवलिंग के रूप में ही क्यों पूजा होती है सवाल का ऑथेंटिकेट जवाब लिखा हुआ है। ग्रंथ को पढ़ने वाले महायश वाचक श्री मुकेश पाठक जी ने बताया की भगवान शिव की पूजा भी लिंगाकृति में होती है इसका भी कारण है भृगु जी द्वारा दिया गया श्राप।  त्रिदेवों में से सर्वश्रेष्ठ कौन हैं ? इसकी परीक्षा लेने के लिये भृगु जी महाराज पहले सृष्टि रचियता ब्रह्मा जी के पास गये परन्तु सर्वश्रेष्ठ होने का गुण न पाकर फिर भगवान शंकर के पास कैलाश गये। शिव जी समाधी में लीन थे, उनके गणों ने भृगु जी को मिलने से मना कर दिया। महर्षि होने के कारण किसी भी स्थान पर जाने के लिय कोई रोक टोक नहीं थी। फिर भी महर्षि ने कहा कि, कृपा आप उन्हें मेरे आने का संदेशा अवश्य दें परन्तु शिव जी के गण हरगिज मानने को तैयार ना थे और ऐसा वाद-विवाद हो गया कि गणों ने भृगु जी का अपमान करना आरम्भ कर दिया। उनको मारने के लिये त्रिशूल इत्यादि शस्त्रों को साथ लेकर भृगु जी के पीछे-पीछे भागने लगे। अब भृगु जी ठहरे महर्षि उनके पास कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं था। अगर था तो केवल एक कमंडल। भागते-भागते भृगु जी एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां आकर वह ठहर गये और उनको क्रोध आ गया और मन ही मन सोचने लगे कि हे शंकर जी आज मैं आपके पास आया तो किसी और काम से था। आज तो मैंने आपको एक बहुत बड़ी उपाधी से सुशोभित करना था परन्तु आपके गणों ने मेरी यह हालत कर दी।  इस हालात पर क्रोधित होकर महार्षि भृगु जी ने भगवान शंकर जी को श्राप दे दिया कि जाओ आपकी भी कलयुग में पूजा न हो। श्राप मिलते ही भगवान शंकर का तीसरा नेत्र खुल गया और महर्षि के सामने उपस्थित हो गये। कहने लगे, “हे भृगु ! अपना दिया श्राप वापिस लो क्योंकि इस सृष्ठि के निर्माण करने में मेरा भी नाम आता है। अगर मुझे ही इस सृष्टि से बाहर निकाल दोगे तो इस सृष्टि में कुछ नहीं बचेगा। अगर हम सृष्टि बना सकते हैं तो इसका विनाश भी कर सकते हैं। जब भृगु जी ने इस पर गंभीरता से विचार किया तो सोचने लगे कि यह कहते तो ठीक हैं – अगर बना सकते हैं तो बिगाड़ भी सकते हैं।  भृगु जी का भी क्रोध शांत हुआ और शंकर जी को कहा, हे शंकर जी दिया गया श्राप तो वापिस नहीं हो सकता परन्तु इसमें कुछ परिवर्तन किया जा सकता है। शंकर जी श्राप के परिवर्तन के लिये सहमत हो गये। तब महार्षि ने पूछा प्रभु क्या आप अब प्रसन्न हैं, तो शंकर जी ने सहमती जतायी। तब महर्षि भृगु जी बोले कि आपकी कलयुग में पूजा अवश्य होगी परन्तु जो यह शरीरिक आकार लिये हुए हो, इस रूप में पूजा न होकर ब्रह्मांड रूपी लिंग आकृति में होगी। यही भृगु जी का श्राप ही सबसे बडा कारण है कि – भगवान शंकर की पूजा एक लिंग की आकृति में होती है। तब भगवान शंकर जी ने महार्षि भृगु को आर्शीवाद दिया। हे महर्षि! आप जिस कार्य में लगे हुए हैं, आपका वह कार्य पूर्ण हो। धार्मिक ग्रंथों में लिखा गया है कि – संत वचन पलटे नहीं पलट जाये ब्रह्मांड। कैसे हुई शिवलिंग की उत्पत्ति पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि बनने के बाद भगवान विष्णु और ब्रह्माजी में युद्ध होता रहा। दोनों खुद को सबसे अधिक शक्तिशाली सिद्ध करने में लगे थे। इस दौरान आकाश में एक चमकीला पत्थर दिखा और आकाशवाणी हुई कि इस पत्थर का जो भी अंत ढूंढ लेगा, वह ज्यादा शक्तिशाली माना जाएगा. मान्यता है कि वह पत्थर शिवलिंग ही था। पत्थर का अंत ढूंढने के लिए भगवान विष्णु नीचे तो भगवान ब्रह्मा ऊपर चले गए परंतु दोनों को ही अंत नहीं मिला. तब भगवान विष्णु ने स्वयं हार मान ली. लेकिन ब्रह्मा जी ने सोचा कि अगर मैं भी हार मान लूंगा तो विष्णु को ज्यादा शक्तिशाली समझा जाएगा। इसलिए ब्रह्माजी ने कह दिया कि उनको पत्थर का अंत मिल गया है। इसी बीच फिर आकाशवाणी हुई कि मैं शिवलिंग हूं और मेरा ना कोई अंत है, ना ही शुरुआत और उसी

कहां और कैसे हुई शिवलिंग की उत्पत्ति, जानिए शिवजी से जुड़े ये रहस्य Read More »

भगवान शिव के पाँच डरावने और रहस्यात्मक मंदिर

पूरी दुनिया में भगवान शंकर के बहुत सारे मंदिर हैं ज्यादातर मंदिरे हमारे देश भारत में मौजूद हैं भगवान शंकर जितने सरल और सीधे हैं उतने ही वह रहस्य आत्मक भी हैं आज हम आपको भगवान शिव के कुछ मंदिर के विषय में  जानकारी देंगे। स्तंभेश्वर महादेव मंदिर भेश्वर महादेव मंदिर यह मंदिर अरब सागर के तट पर हैं इस मंदिर को लगभग डेढ़ सौ साल पहले खोजा गया था स्तंभेश्वर महादेव मंदिर का वर्णन शिव महापुराण के रूद्र संहिता में किया गया है। इस मंदिर के अंदर जो शिवलिंग है वह 4 फुट ऊंचा और दो व्यास वाला है यह मंदिर इसीलिए रहस्यात्मक है की यह मंदिर दिन में दो बार पल भर के लिए गायब हो जाता है। कुछ ही क्षणों बाद फिर से दिखाई देने लगता है इस मंदिर का दर्शन भक्त लोग तभी कर सकते हैं जब समुद्र की लहरें बहुत कम हो वहां जाने वाले सभी भक्तों को एक विशेष पर्ची दी जाती है। जिसमें वहां के दर्शन से लेकर सावधानी तक सभी प्रकार की सूचनाएं लिखी होती है इस मंदिर को लेकर एक पौराणिक कथा भी है। एक बार राक्षस तारकासुर ने भगवान शंकर को खुश करने के लिए बहुत वर्षों तक तपस्या की तारकासुर की तपस्या से भगवान शिव खुश होकर प्रकट हुए।  भगवान शंकर ने तारकासुर से वरदान मांगने को कहा वरदान में तारकासुर ने शिव से कहा कि मुझे सिर्फ आपका ही पुत्र मार सकेगा वह भी सिर्फ 6 दिन का होना चाहिए दूसरा कोई नहीं मुझे मार न सके। मुझे ऐसा वरदान दीजिए भगवान शंकर ने  वैसा ही वरदान दिया और वही अंतर्ध्यान हो गये जैसे ही भगवान शिव ने तारकासुर को वरदान दिया तो तारकासुर ने तीनों लोकों में सब को परेशान करना शुरू कर दिया। देवताऋषि मुनि डर के मारे भगवान भोलेनाथ के पास हाथ जोड़कर पहुंच गए देवताओं की बात सुनने के पश्चात भगवान भोलेनाथ ने कार्तिकेय को प्रकट किया। सिर्फ 6 दिन में ही कार्तिकेय ने तारकासुर को मार दिया कार्तिकेय को जब पता चला कि तारकासुर भगवान भोलेनाथ का अनन्य भक्त हैं तो उनको बहुत दुख हुआ। तब ब्रह्माजी ने कार्तिकेय को कहा जिस स्थान पर तुमने तारकासुर का वध किया है उसी स्थान पर भगवान भोलेनाथ का मंदिर बना दो तो तुम्हें शांति मिलेगी और तुम्हारा दुःख दूर होगा। तभी भगवान कार्तिकेय ने अपना दुख दूर करने के लिए तारकासुर के स्मरण मैं स्तंभेस्वर मंदिर का निर्माण कराया था। निष्कलंक महादेव मंदिर निष्कलंक महादेव मंदिर यह मंदिर गुजरात में स्थित है इस मंदिर के नाम से ही पता चल रहा है कि यह सभी कलंक को धोने वाला मंदिर है।  यह मंदिर पांचों पांडवों ने बनाया था जब कौरव और पांडवों में महाभारत का युद्ध हुआ युद्ध में पांडवों के हाथों कौरवों की मौत हो गई तब कौरवों को एहसास एहसास हुआ कि हमने तो अपने ही भाइयों का कत्ल किया है।  इस कलंक को मिटाने के लिए भगवान श्री कृष्ण के आदेश के अनुसार पांचो पांडव ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। अचलेश्वर महादेव मंदिर इस नाम से पूरे भारत देश में बहुत सारे मंदिर बने हुए हैं लेकिन प्रमुख मंदिर राजस्थान के धौलपुर में स्थित है। इस मंदिर की सबसे बड़ी और हैरान कर देने वाली बात यह है कि यह मंदिर में स्थित शिवलिंग एक दिन में तीन  बार अपना रंग बदलती है। सुबह शिवलिंग का रंग लाल और दोपहर में केसरिया और शाम ढलते ढलते इसका रंग सावला हो जाता है अचलेश्वर शिवलिंग की एक और विशेषता है। इस शिवलिंग के छोर को आज तक कोई नहीं जान पाया कि यह कितना बड़ा है बहुत बार शिवलिंग के छोर को जानने के लिए खुदाई भी की गई लेकिन इसका पता न चल सका। लक्ष्मेश्वर महादेव मंदिर लक्ष्मेश्वर महादेव मंदिर यह मंदिर भी बहुत प्राचीन है ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर की स्थापना स्वयं भगवान राम ने जब खर और दूषण को मार दिया उसके पश्चात लक्ष्मण के कहने पर किया था। इस शिवलिंग की यह विशेषता है इस शिव लिंग में एक लाख छेद हे और इन 1 लाख छिद्रों की अलग-अलग विशेषताएं हैं शिवलिंग में एक लाख छेद होने के कारण इस मंदिर का नाम लक्ष्यस्वर महादेव मंदिर पड़ा। बिजली महादेव मंदिर हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में स्थित बिजली महादेव मंदिर कुल्लू का पूरा इतिहास बिजली से ही जुड़ा हुआ है व्यास और पार्वती नदी के पास एक ऊंचे पर्वत में यह शिवलिंग स्थित है ऐसी मान्यता है कि हर 12 वर्ष में शिवलिंग के ऊपर एक बिजली गिरती है और वह शिवलिंग खंडित हो जाता है वहां के पुजारी मक्खन आदि से उस शिवलिंग को पुनः जोड़ कर यथावत कर देते हैं

भगवान शिव के पाँच डरावने और रहस्यात्मक मंदिर Read More »

महाकालेश्वर और काल भैरो मंदिर से जुड़े 3 बड़े रहस्य, जानें कैसे पहुंचें और कहां ठहरे

महाकालेश्वर मंदिर को लेकर कई सारी भ्रांतियां हैं। जैसे कई लोगों को लगता है कि महाकालेश्वर का मेन मंदिर ही वो है जहां भगवान को शराब पिलाई जाती है, लेकिन मैं आपको बता दूं कि ये दो अलग-अलग मंदिर हैं। ये मंदिर बहुत दूर नहीं हैं और कहा जाता है कि इस मंदिर के गर्भग्रह में एक गुफा है जो महाकाल मंदिर से जुड़ी हुई है। जहां भैरो बाबा का मंदिर अपने आप में प्रसिद्ध है वहीं महाकाल मंदिर से जुड़े भी कई रहस्य हैं। आज हम आपको महाकाल मंदिर से जुड़े तीन गहरे रहस्यों के बारे में बताने जा रहे हैं। इस लेख में यह भी बताने जा रहे हैं कि कैसे आप महाकालेश्वर मंदिर पहुंच सकते हैं और यहां ठहरने के लिए कुछ बेहतरीन जगहों के बारे में भी बताने जा रहे हैं।  भैरो बाबा के मंदिर में पिलाई जाती है शिव को शराब उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर और काल भैरो के मंदिर के बारे में तो आप जानते ही होंगे। काल भैरो का मंदिर देश का ही नहीं बल्कि दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान शिव को शराब पिलाई जाती है और जहां पूरी दुनिया में मंदिरों के आस-पास शराब आदि की दुकानें हटा दी जाती हैं वहीं दूसरी ओर महाकाल के मंदिर परिसर से लेकर इसके रास्ते तक में बहुत सारी शराब की दुकानें लगवाई गई हैं और यही नहीं यहां प्रसाद बेचने वाले लोग भी शराब अपने पास रखते हैं। 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर का शिवलिंग स्वयंभू (अपने आप प्रकट हुआ) माना जाता है। आज तक ये कोई भी नहीं जानता कि भगवान शिव को मदिरा पिलाने का रिवाज कब से आया और आखिर इतनी शराब जो भगवान शिव पीते हैं वो जाती कहां है। 1. महाकाल के नाम का रहस्य क्योंकि महाकाल में भस्म आरती होती है और ये कहा जाता है कि पहले यहां जलती हुई चिता की राख लाकर पूजा की जाती थी इसलिए माना जाता था कि महाकाल का संबंध मृत्यु से है, पर ये पूरा सच नहीं है। दरअसल, काल का मतलब मृत्यु और समय दोनों होते हैं और ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में पूरी दुनिया का मनक समय यहीं से निर्धारित होता था इसलिए इसे महाकालेश्वर नाम दे दिया गया।   दूसरा कारण भी काल से ही जुड़ा हुआ था। दरअसल, शिवलिंग तब प्रकट हुआ था जब एक राक्षस को मारना था। भगवान शिव उस राक्षस का काल बनकर आए थे और साथ ही साथ अवंति नगरी (अब उज्जैन) के वासियों के आग्रह पर महाकाल यहीं स्थापित हो गए। ये समय यानि काल के अंत तक यहीं रहेंगे इसलिए भी इन्हें महाकाल कहा जाने लगा। 2. आखिर क्यों रात नहीं गुजारता कोई राजा या मंत्री ऐसा माना जाता है कि विक्रमादित्य के समय से ही इस मंदिर के पास और शहर में कोई राजा या मंत्री रात नहीं गुजारता है। इससे जुड़े कई उदाहरण भी प्रसिद्ध हैं जिनके बारे में आपको जानकर आश्चर्य होगा। दरअसल, लंबे समय तक कांग्रेस और फिर भाजपा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया जो ग्वालियर के राजा भी हैं वो भी आज तक यहां रात को नहीं रुके हैं। इतना ही नहीं, देश के चौथे प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई भी जब मंदिर के दर्शन करने के बाद रात में यहां रुके थे तो उनकी सरकार अगले ही दिन गिर गई थी।   ऐसे ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री वी एस येदियुरप्पा भी जब उज्जैन में रुके थे तो उन्हें कुछ ही दिनों के अंदर इस्तीफा देना पड़ा था। इस रहस्य को कुछ लोग संयोग मानते हैं तो कुछ लोगों के मुताबिक एक लोककथा के अनुसार भगवान महाकाल ही इस शहर के राजा हैं और उनके अलावा कोई और राजा यहां नहीं रह सकता है।  3. भस्म आरती को लेकर भी है एक रहस्य भस्म आरती की कहानी शिवलिंग की स्थापना से ही देखी जाती है। दरअसल प्राचीन काल में राजा चंद्रसेन शिव के बहुत बड़े उपासक माने जाते थे। एक दिन राजा के मुख से मंत्रो का जाप सुन एक किसान का बेटा भी उनके साथ पूजा करने गया, लेकिन सिपाहियों ने उसे दूर भेज दिया। वो जंगल के पास जाकर पूजा करने लगा और वहां उसे अहसास हुआ कि दुश्मन राजा उज्जैन पर आक्रमण करने जा रहे हैं और उसने प्रार्थना के दौरान ही ये बात पुजारी को बता दी। ये खबर आग की तरह फैल गई और उस समय विरोधी राक्षस दूषण का साथ लेकर उज्जैन पर आक्रमण कर रहे थे। दूषण को भगवान ब्रह्मा का वर्दान प्राप्त था कि वो दिखाई नहीं देगा।  उस वक्त पूरी प्रजा ही भगवान शिवकी अराधना में व्यस्त हो गई और अपने भक्तों की ऐसी पुकार सुनकर महाकाल प्रकट हुए। महाकाल ने दूषण का वध किया और उसकी राख से ही अपना श्रृंगार किया। उसके बाद वो यहीं विराजमान हो गए। तब से भस्म आरती का विधान बन गया। ये दिन की सबसे पहली आरती होती है।   शिवपुराण के अनुसार कपिला गाय के गोबर के कंडे के साथ शमी, पीपल, पलाश, बेर के पेड़ की लड़कियां, अमलतास और बरगद के पेड़ की जड़ को एक साथ जलाया जाता है। इसके बाद ही वो राख बनती है जिससे हर सुबह भगवान शिव की भस्म आरती होती है।  महाकालेश्वर मंदिर कैसे पहुंचें- महाकालेश्वर मंदिर पहुंचना बहुत आसान है। यहां आप देश के किसी भी कोने से आसानी से पहुंच सकते हैं।  ट्रेन- दिल्ली, मुंबई, कोलकाता या चेन्नई जैसे शहर से आप ट्रेन लेकर उज्जैन सीटी जंक्शन या विक्रम नगर रेलवे स्टेशन पहुंचकर यहां से लोकल बस या टैक्सी लेकर महाकालेश्वर मंदिर पहुंचा सकते हैं। दिल्ली से आप 1000 रूपये के आसपास में पहुंच सकते हैं। हवाई सफ़र- अगर आप हवाई सफ़र से पहुंचना चाहते हैं तो महारानी अहिल्या बाई होल्कर एअरपोर्ट उज्जैन का सबसे निकटतम हवाई अड्डा है। यहां से आप लोकल टैक्सी या बस लेकर जा सकते हैं। दिल्ली से हवाई सफ़र लगभग 6 हज़ार पड़ेगा । सड़क मार्ग से-अगर आप बस या निजी वहान से जाना चाहते हैं उज्जैन देश के लगभग हर राज्य से जुडा हुआ है।  महाकालेश्वर मंदिर के आसपास ठहरने की जगह- महाकालेश्वर मंदिर के आसपास ठहरने के लिए ऐसे कई धर्मशाला हैं जहां आप बहुत कम पैसे में ठहर सकते हैं। जैसे-महाकाल धर्मशाला या फिर सूर्य नारायण व्यास धर्मशाला में

महाकालेश्वर और काल भैरो मंदिर से जुड़े 3 बड़े रहस्य, जानें कैसे पहुंचें और कहां ठहरे Read More »

कौन है बाबा खाटू श्यामजी? क्या है उनकी कहानी?

राजस्थान के शेखावाटी के सीकर जिले में स्थित है परमधाम खाटू। यहां विराजित हैं खाटू श्यामजी। खाटू का श्याम मंदिर बहुत ही प्राचीन है। यहां पर प्रतिवर्ष फाल्गुन माह शुक्ल षष्ठी से बारस तक यह मेला लगता है। श्याम बाबा की महिमा का बखान करने वाले भक्त राजस्थान या भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के कोने-कोने में मौजूद हैं। आओ जानते हैं कि कौन है बाबा खाटू श्यामजी? क्या है उनकी कहानी। कौन है खाटूश्यामजी खाटू श्यामजी भगवान श्रीकृष्ण के कलयुगी अवतार हैं। महाभारत के भीम के पुत्र घटोत्कच और घटोत्कच के पुत्र बर्बरिक थे। बर्बरीक को ही बाबा खाटू श्याम कहते हैं। इनकी माता का नाम हिडिम्बा है। खाटू श्याम की कहानी  बर्बरीक दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे। बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरवों और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। युद्ध के मैदान में भीम पौत्र बर्बरीक दोनों खेमों के मध्य बिन्दु एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो गए और यह घोषणा कर डाली कि मैं उस पक्ष की तरफ से लडूंगा जो हार रहा होगा। बर्बरीक की इस घोषणा से कृष्ण चिंतित हो गए। भीम के पौत्र बर्बरीक के समक्ष जब अर्जुन तथा भगवान श्रीकृष्ण उसकी वीरता का चमत्कार देखने के लिए उपस्थित हुए तब बर्बरीक ने अपनी वीरता का छोटा-सा नमूना मात्र ही दिखाया। कृष्ण ने कहा कि यह जो वृक्ष है ‍इसके सारे पत्तों को एक ही तीर से छेद दो तो मैं मान जाऊंगा। बर्बरीक ने आज्ञा लेकर तीर को वृक्ष की ओर छोड़ दिया। जब तीर एक-एक कर सारे पत्तों को छेदता जा रहा था उसी दौरान एक पत्ता टूटकर नीचे गिर पड़ा। कृष्ण ने उस पत्ते पर यह सोचकर पैर रखकर उसे छुपा लिया की यह छेद होने से बच जाएगा, लेकिन सभी पत्तों को छेदता हुआ वह तीर कृष्ण के पैरों के पास आकर रुक गया। तब बर्बरीक ने कहा कि प्रभु आपके पैर के नीचे एक पत्ता दबा है कृपया पैर हटा लीजिए, क्योंकि मैंने तीर को सिर्फ पत्तों को छेदने की आज्ञा दे रखी है आपके पैर को छेदने की नहीं। उसके इस चमत्कार को देखकर कृष्ण चिंतित हो गए। भगवान श्रीकृष्ण यह बात जानते थे कि बर्बरीक प्रतिज्ञावश हारने वाले का साथ देगा। यदि कौरव हारते हुए नजर आए तो फिर पांडवों के लिए संकट खड़ा हो जाएगा और यदि जब पांडव बर्बरीक के सामने हारते नजर आए तो फिर वह पांडवों का साथ देगा। इस तरह वह दोनों ओर की सेना को एक ही तीर से खत्म कर देगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण का भेष बनाकर सुबह बर्बरीक के शिविर के द्वार पर पहुंच गए और दान मांगने लगे। बर्बरीक ने कहा- मांगो ब्राह्मण! क्या चाहिए? ब्राह्मणरूपी कृष्ण ने कहा कि तुम दे न सकोगे। लेकिन बर्बरीक कृष्ण के जाल में फंस गए और कृष्ण ने उससे उसका शीश मांग लिया। बर्बरीक द्वारा अपने पितामह पांडवों की विजय हेतु स्वेच्छा के साथ शीशदान कर दिया गया। बर्बरीक के इस बलिदान को देखकर दान के पश्चात श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को कलियुग में स्वयं के नाम से पूजित होने का वर दिया। आज बर्बरीक को खाटू श्याम के नाम से पूजा जाता है। जहां कृष्ण ने उसका शीश रखा था उस स्थान का नाम खाटू है। अनजाने रहस्य :  1. खाटू श्याम अर्थात मां सैव्यम पराजित:। अर्थात जो हारे हुए और निराश लोगों को संबल प्रदान करता है। 2. खाटू श्याम बाबा दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं उनसे बड़े सिर्फ श्रीराम ही माने गए हैं। 3. खाटूश्याम जी का जन्मोत्सव हर साल कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। 4. खाटू का श्याम मंदिर बहुत ही प्राचीन है, लेकिन वर्तमान मं‍दिर की आधारशिला सन 1720 में रखी गई थी। इतिहासकार पंडित झाबरमल्ल शर्मा के मुताबिक सन 1679 में औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया था। मंदिर की रक्षा के लिए उस समय अनेक राजपूतों ने अपना प्राणोत्सर्ग किया था। 5. खाटू श्‍याम मंदिर परिसर में लगता है बाबा खाटू श्याम का प्रसिद्ध मेला। हिन्दू मास फाल्गुन माह शुक्ल षष्ठी से बारस तक यह मेला चलता है। ग्यारस के दिन मेले का खास दिन रहता है।  6. बर्बरीक देवी के उपासक थे। देवी के वरदान से उसे तीन दिव्य बाण मिले थे जो अपने लक्ष्य को भेदकर वापस उनके पास आ जाते थे। इसकी वजय से बर्बरिक अजेय थे। 7. बर्बरीक अपने पिता घटोत्कच से भी ज्यादा शक्तिशाली और मायावी था।  8. कहते हैं कि जब बर्बरिक से श्रीकृष्ण ने शीश मांगा तो बर्बरिक ने रातभर भजन किया और फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को स्नान करके पूजा की और अपने हाथ से अपना शीश काटकर श्रीकृष्ण को दान कर दिया।  9. शीश दान से पहले बर्बरिक ने महाभारत का युद्ध देखने की इच्‍छा जताई तब श्रीकृष्‍ण ने उनके शीश को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित करके उन्हें अवलोकन की दृष्टि प्रदान की।  10. युद्ध समाप्ति के बाद जब पांडव विजयश्री का श्रेय देने के लिए वाद विवाद कर रहे थे तब श्रीकृष्ण कहा कि इसका निर्णय तो बर्बरिक का शीश ही कर सकता है। तब बर्बरिक ने कहा कि युद्ध में दोनों ओर श्रीकृष्ण का ही सुदर्शन चल रहा था और द्रौपदी महाकाली बन रक्तपान कर रही थी।  10. अंत में श्रीकृष्ण ने वरदान दिया की कलियुग में मेरे नाम से तुम्हें पूजा जाएगा और तुम्हारे स्मरण मात्र से ही भक्तों का कल्याण होगा। 11. स्वप्न दर्शनोंपरांत बाबा श्याम, खाटू धाम में स्थित श्याम कुण्ड से प्रकट हुए थे और श्रीकृष्ण शालिग्राम के रूप में मंदिर में दर्शन देते हैं।

कौन है बाबा खाटू श्यामजी? क्या है उनकी कहानी? Read More »

भगवान विष्णु ने स्थापित किया था गोला में शिव श्रंग

छोटी काशी के सावन मेला पर विशेष: कई पुराणों में है गोकर्ण महात्म्य का वर्णन उज्जैन की तरह मंदिरों की नगरी के रूप में प्रसिद्ध गोला गोकर्णनाथ का पौराणिक शिवलिंग पूरे उत्तर भारत में आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि प्राचीन काल में अत्यंत प्रिय लगने के कारण भोले बाबा ने मृग रूप में यहां विचरण किया था। भगवान विष्णु ने स्वयं यहां शिव का श्रंग स्थापित किया था इसलिए यह नगर गोला गोकर्णनाथ और छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध है।वाराह पुराण में वर्णन है कि प्राचीन काल में शिव मृत्युलोक में भ्रमण करते हुए इस वन क्षेत्र में आए और क्षेत्र की रमणीयता पर मुग्ध होकर यहीं ठहर गए। ब्रह्मा, विष्णु और देवराज इंद्र जब उन्हें ढूंढते हुए इस वन प्रांत में पहुंचे तो तीन सींग वाले विशाल अद्भुत मृग रूप धारी शिव को पहचान लिया और दौड़कर उनके श्रंग(सींग)पकड़ लिए। शिवजी अपने मूल स्वरूप में आ गए लेकिन तीन सींग देवताओं के हाथ में रह गए। उनमें से एक सींग भगवान विष्णु ने यहां स्थापित किया जो गोकर्णनाथ नाम से जाना जाता है। शिव पुराण में यहां के शिव का नाम चंद्रभाल कहा गया है। दूसरा श्रंग ब्रह्माजी ने बिहार प्रांत के श्रंगवेश्वर में स्थापित किया। तीसरा देवराज इंद्र ने अपनी अमरावती में स्थापित कर पूजन अर्चन शुरू किया। एक अन्य कथा के अनुसार रावण ने जब इंद्र पर विजय प्राप्त की तो वह शिव श्रंग को कांवड़ में रख कर लंका की ओर चला, लंका जाते समय दक्षिण में समुद्र तट पर गोकर्ण स्थान प्रिय लगने पर शिवजी यहां स्थापित हो गए। छोटी काशी में स्थापित शिव के मनुष्यों के समक्ष प्राकट्य का वर्णन पद्मपुराण में मिलता है। वामन पुराण, कूर्म पुराण और स्कन्द पुराण में यहां जिक्र है।  मुस्लिम राजा ने बनवाया था मंदिर जंगल में बेल वृक्ष के नीचे स्थित शिव श्रंग सबसे पहले कोटद्वार नगर जो अब कोटवारा के नाम से प्रसिद्ध है, के ब्राह्मण सदानंद के समक्ष प्रकट हुआ था। सदानंद ने वहां एक मठिया बनवाकर पूजन शुरू किया। भक्तों की श्रद्धा बढ़ते देखकर बाद में कोटवारा रियासत के मुस्लिम राजा तरवियत हुसेन उर्फ टर्बी राजा ने गोल गुंबद के आकार का मंदिर बनवाकर शिखर पर दूज का चांद स्थापित करवाया जो प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अलीगंज स्थित पुराने हनुमान मंदिर और यहां के अलावा पूरे देश में कहीं भी देखने को नहीं मिलता है। गोकर्ण तीर्थ का भी है विशेष माहात्म्य पद्म पुराण में ब्राह्मण सदानंद द्वारा पंच तीर्थों की स्थापना और माहात्म्य का वर्णन मिलता है। इनमें पहला गोकर्ण तीर्थ प्राचीन शिव मंदिर के समीप, दूसरा कोणार्क तीर्थ भवानीगंज ग्राम में, तीसरा पोनाग्र तीर्थ पुनर्भूग्रंट गांव में, चौथा भद्र तीर्थ नगर के सिनेमा मार्ग के समीप, पांचवां अहमदनगर ग्राम में माण्ड ऋषि की तपस्थली में माण्ड तीर्थ के नाम से विख्यात है। श्रद्धालु पहले इन पंच तीर्थों में होकर पंच कोसीय परिक्रमा व स्नान कर गोकर्णनाथ शिव के दर्शन करते थे। अब यह परिक्रमा काफी पहले समाप्त हो चुकी है। गोकर्ण तीर्थ के बीच में भक्तों ने शिवजी की विशाल प्रतिमा स्थापित कराई है जो आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

भगवान विष्णु ने स्थापित किया था गोला में शिव श्रंग Read More »

जानिए काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़ी मान्यताएं और धार्मिक रहस्य

सनातन पंरपरा में द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन का बहुत ज्यादा धार्मिक महत्व है सनातन पंरपरा में द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन का बहुत ज्यादा धार्मिक महत्व है. देश के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा विश्वनाथ जो कि पूरे जगत के नाथ कहलाते हैं, उनका मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में स्थित है. हिंदू धर्म में प्राचीन सप्तपुरियों में से एक काशी या फिर कहें वारणसी शहर के बारे में मान्यता है कि वह भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी हुई है और प्रलय आने के बाद भी यहीं बनी रहती है. जिस काशी नगरी में बाबा विश्वनाथ विराजते हैं, उसकी महिमा इतनी निराली है कि देश-दुनिया का आदमी यहां हर रोज खिंचा चला आता है. सावन के महीने में बाबा विश्वनाथ के धाम पर भक्तों की भारी भीड़े जुटती है. आइए तीन लोकों से न्यारी माने जाने वाली काशी और वहां विराजने वाले विश्व के नाथ यानि बाबा विश्वनाथ से जुड़ी अनसुनी बातों को विस्तार से जानते हैं. द्वादश ज्योतिर्लिंगों में बाबा विश्वनाथ का नौवां स्थान है. जिनके बारे में मान्यता है कि उनकी स्थापना किसी व्यक्ति या देवता द्वारा नहीं हुई बल्कि यहां पर उनका स्वयं प्राकट्य हुआ है. मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ के मंदिर का निर्माण 11वीं सदी में राजा विक्रमादित्य ने करवाया था. जिसके बाद मुगल शासकों द्वारा कई बार तोड़ने के बाद दोबारा निर्माण करवाया गया. मान्यता है कि वर्तमान में मंदिर का जो स्वरूप है उसे इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने बनवाया था. जिसका हाल ही में विस्तार और सौंदर्यीकरण हुआ है. मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ के इस पावन धाम की रक्षा खुद काल भैरव कहते हैं, जिन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है, जिनके दर्शन के बगैर इस ज्योतिर्लिग की पूजा अधूरी मानी जाती है. हालांकि कुछ लोगों की मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ के दर्शन से पहले भगवान भैरव के दर्शन करना चाहिए. मान्यता है कि जहां शिव होते हैं, वहां पर शक्ति भी किसी न किसी रूप में अवश्य निवास करती हैं. बहुत कम लोग जानते हैं कि काशी में न सिर्फ ज्यो​​तिर्लिंग बल्कि शक्त्पिीठ भी स्थित है. बाबा विश्वनाथ के मंदिर के पास में ही मां विशालाक्षी का मंदिर है जो देश के उन 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां पर माता सती के अंग गिरे थे. काशी विश्वनाथ मंंदिर के ​गुंबद में लगे श्रीयंत्र के बारे में मान्यता है कि जो कोई भक्त उस ओर देखकर बाबा विश्वनाथ से प्रार्थना करता है, औढरदानी शिव शीध्र ही उसकी मनोकामना को पूरी करते हैं. काशी विश्वनाथ मंदिर की पूजा के बारे में मान्यता है कि जो कोई शिव भक्त यहां आकर बाबा विश्वनाथ के ज्योतिर्लिंग का स्पर्श, पूजन आदि करता है, उसे राजसूय यज्ञ का पुण्य फल प्राप्त होता है. काशी एक मात्र स्थान है, जहां गंगा उत्तर वाहिनी है. यहां पर गंगा के कई घाट हैं. काशी में होने वाली मां गंगा की आरती और इसके पावन घाट को देखने के लिए देश-दुनिया से लोग प्रतिदिन पहुंचते हैं. देवों के देव महादेव की नगरी काशी के बारे में मान्यता है कि यहां पर प्राण त्यागने वाले व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि काशी में रहने वाले भक्त को भगवान शिव खुद तारक मन्त्र देकर उन्हें मुक्ति प्रदान करते हैं. यही कारण है कि बहुत से लोग जीवन के अंतिम पड़ाव में बाबा विश्वनाथ की नगरी में आकर बसना चाहते हैं. पवित्र और प्राचीन नगरी काशी के बारे में मान्यता है कि यहां पर कण-कण में शिव का वास है. मान्यता यह भी है कि यहां पर 30 करोड़ देवी देवता निवास करते है. यही कारण है कि बनारस को मंदिरों का शहर कहा जाता है, जिसमें अलग-अलग देवी-देवता विराजते हैं.

जानिए काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़ी मान्यताएं और धार्मिक रहस्य Read More »

क्या है, भगवान श्रीकृष्ण के हृदय का रहस्य

 हमारा देश भारत, जो रहस्यों से भरा देश है। हमारे देश की सभ्यता, जितनी पुरानी है। उतने ही  पुराने, हमारे देश के मंदिर भी हैं। हजारों सालों से खड़े मंदिर, कई राज अपने अंदर  समेटे हुए हैं। भारत में मौजूद कोई भी मंदिर ऐसा नहीं है। जिससे जुड़ा कोई भी रहस्य वैज्ञानिकों को या आम आदमी की चर्चा का विषय न हो।       बद्रीनाथ धाम को, जहां जगत के पालनहार भगवान विष्णु का आठवां बैकुंठ लोक माना जाता है। वही जगन्नाथ धाम को धरती का बैकुंठ लोक माना जाता है। उड़ीसा के तटीय शहर, पूरी में स्थित यह विश्व प्रसिद्ध मंदिर, भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है।         पूरी का यह पौराणिक मंदिर, अपने आपमें काफी अलौकिक है। 800 साल से ज्यादा पुराने इस मंदिर में, ऐसे-ऐसे रहस्य छुपे हुए हैं। जो आपको हैरान कर देगें।       भगवान जगन्नाथ मंदिर से जुड़े, ऐसे कई रहस्य हैं। जिस पर पूरी दुनिया के आधुनिक वैज्ञानिकों ने, कई बार शोध किए। लेकिन वह इसके रहस्य को नहीं  सुलझा पाए। आपको भी जाना चाहिए कि भगवान श्री कृष्ण का ह्रदय आज भी जीवित है। भगवान श्री कृष्ण 16 कलाओं से युक्त, ईश्वर के पूर्ण अवतार माने जाते हैं। वैसे तो श्रीकृष्ण सर्वत्र व्याप्त हैं। लेकिन उन्हीं श्री कृष्ण के अवतारी शरीर का हृदय, आज भी जीवित अवस्था मे धड़क रहा है।       कहा जाता है कि जब श्रीकृष्ण ने अपनी देह का त्याग किया। तब उनका अंतिम संस्कार किया गया। अंतिम संस्कार में श्री कृष्ण की देह, पूरी तरह पंचतत्व में विलीन हो गई। लेकिन उनका ह्रदय वैसा का वैसा ही रहा। अग्निदाह में उनका ह्रदय नष्ट नहीं हुआ। वह एक जीवित व्यक्ति के ह्रदय तरह धड़क रहा था।         कहा जाता है कि श्रीकृष्ण की मृत्यु बाद, जारा सवर नामक एक आदिवासी शिकारी ने, उनके शरीर का अंतिम संस्कार किया। लेकिन श्री कृष्ण का हृदय नहीं जला। परंपरा के अनुसार, पिण्ड को जल में प्रवाहित कर दिया गया। जल शुद्धि के अनुसार, उस पिंड ने एक लठ्ठे का रूप ले लिया।        भगवान जगन्नाथ के भक्त राजा इंद्रदयुम्न को यह लट्ठा मिला। उन्होंने भगवान विश्वकर्मा के द्वारा, इस लट्ठे को भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर स्थापित करवा दिया। कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण का ह्रदय आज भी जस का तस है। जो भगवान जगन्नाथ के काठ की मूर्ति के अंदर स्थापित है।        भगवान जगन्नाथ का रहस्य, आज तक कोई भी नहीं जान पाया है। भगवान जगन्नाथ की मूर्ति को हर 12 साल में बदला जाता है। इस दौरान पूरे शहर की रोशनी बंद कर दी जाती है। बिजली बंद करने के बाद, मंदिर के पूरे परिसर को घेर लिया जाता है। सीआरपीएफ व सेना के संरक्षण में आने के बाद, मंदिर में कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता।          पुजारी की आंखों पर पट्टी बांधी जाती है। उनके हाथों में मोटे दस्तानें पहनाए जाते हैं। मंदिर के अंदर घोर-घने अंधकार के बीच, पुजारी उस पदार्थ को बाहर निकलता है। फिर उसे नई मूर्ति में स्थापित कर देता है। इसी भगवान श्रीकृष्ण के हृदय को ब्रह्म पदार्थ कहा जाता है। इस ब्रह्म पदार्थ के रहस्य को, आज तक कोई नहीं जान पाया।         सैकड़ों वर्षो से एक मूर्ति से दूसरी मूर्ति में, यह ब्रह्म पदार्थ स्थानांतरित किया जाता रहा है। खास बात यह है कि ब्रह्म पदार्थ को बदलने वाला पुजारी भी, यह नहीं जानता। कि वह किस चीज को हस्तांतरित कर रहा है। क्योंकि उसके हाथों में दस्ताने होते हैं। और आंख में पट्टी बंधी होती है।       हालांकि ब्रह्म पदार्थ को बदलने वाले पुजारी, यह जरूर कहते हैं। कि वह जिस पदार्थ को बदलते हैं। वह किसी खरगोश के जैसे उछलता है। आज जो पुरी के मंदिर के विषय में आश्चर्यजनक बातें सुनते हैं। यह उसी ब्रह्म पदार्थ का ही चमत्कार है। उसके चमत्कारों की व्याख्या अनंत है। ब्रह्म पदार्थ का वैज्ञानिक विश्लेषण ब्रह्म पदार्थ को आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण से, समझने की कोशिश करते हैं। कि वह क्या हो सकता है। हम सभी को पता है कि मां के गर्भ में, पिता के शुक्राणुओं के अंड निषेचन से, शरीर का निर्माण शुरू हो जाता है। जहां शरीर निर्माण तो जारी रहता है। लेकिन उस शरीर में धड़कन 2 से 3 महीने के बाद ही शुरू होती है।        यहां आधुनिक विज्ञान बिल्कुल खामोश हो जाता है। ऐसा कैसे होता है। आखिर वह कौन-सा तत्व है। जिसके शरीर में प्रवेश होते ही धड़कन शुरू हो जाती है। तो वह कौन सा तत्व है। जिसके शरीर में प्रवेश करते ही, बेजान शरीर धड़कने लगता है। इसके बारे में, विज्ञान आज तक नहीं जान सका।       जबकि हमारे ऋषियों ने, इसे बहुत पहले ही खोज लिया था। जिसे सनातन में, प्राण ऊर्जा के नाम से संबोधित किया गया था। प्राण ऊर्जा ही, वह ऊर्जा है। जो इस  नश्वर शरीर को, जीवंतता प्रदान करती है। जो जड़ शरीर में, चेतना का विस्तार करती है। तो प्राण ऊर्जा मूल है और असीमित भी।       इस ऊर्जा के प्रयोग की क्षमता, उस शरीर पर है। कि वह किस सीमा तक व  कितनी कर पाता है। यह प्राण ऊर्जा सृष्टि की सर्जनात्मक ऊर्जा का ही एक अंश है। इसको ऐसे समझते हैं। अगर हम शरीर को एक ट्रांसफार्मर मान लें और प्राण ऊर्जा को विद्युत। तो यह शरीर के ऊपर है कि वह 220 वोल्ट तक की ऊर्जा ग्रहण कर सकता है। या 21000 वोल्ट तक की।         इस ऊर्जा से शरीर को केवल जीवंतता ही नहीं मिलती। बल्कि आश्चर्यजनक और अचंभित करने वाले परिणाम भी देखने को मिलते हैं। हमारे यहां तो योगियों ने इस ऊर्जा को संकलित करके, जीवित रहते ही शरीर से बाहर निकल जाने की व्यवस्था को खोजा है। फिर अपनी मर्जी से शरीर में पुनः प्रवेश के मार्ग तक को भी। जिसे हम सभी परकाया प्रवेश के नाम से जानते हैं।        ऐसे ही हिमालय की गुफाओं में तपस्यारत योगियों के बारे सुना होगा। जिनकी तपस्या के मार्ग में, यह शरीर कभी  बाधा नहीं रहा। वह इसी प्राण ऊर्जा प पम चमत्कार से संभव है। या फिर उनके द्वारा किसी को आशीर्वाद या श्राप देने पर तुरंत फलित हो जाने के बारे में।

क्या है, भगवान श्रीकृष्ण के हृदय का रहस्य Read More »

दीपावली पर प्रचलित है लक्ष्मी जी की यह पौराणिक कथा

हमारी लोक संस्कृति में दीपावली त्योहार और माता लक्ष्मी की बड़ी सौंधी सी कथा प्रचलित है। एक बार कार्तिक मास की अमावस को लक्ष्मीजी भ्रमण पर निकलीं। चारों ओर अंधकार व्याप्त था। वे रास्ता भूल गईं। उन्होंने निश्चय किया कि रात्रि वे मृत्युलोक में गुजार लेंगी और सूर्योदय के पश्चात बैकुंठधाम लौट जाएंगी, किंतु उन्होंने पाया कि सभी लोग अपने-अपने घरों में द्वार बंद कर सो रहे हैं।  तभी अंधकार के उस साम्राज्य में उन्हें एक द्वार खुला दिखा जिसमें एक दीपक की लौ टिमटिमा रही थी। वे उस प्रकाश की ओर चल दीं। वहां उन्होंने एक वृद्ध महिला को चरखा चलाते देखा। रात्रि विश्राम की अनुमति मांग कर वे उस बुढ़िया की कुटिया में रुकीं।  वृ्द्ध महिला लक्ष्मीदेवी को बिस्तर प्रदान कर पुन: अपने कार्य में व्यस्त हो गई। चरखा चलाते-चलाते वृ्‍द्धा की आंख लग गई। दूसरे दिन उठने पर उसने पाया कि अतिथि महिला जा चुकी है किंतु कुटिया के स्थान पर महल खड़ा था। चारों ओर धन-धान्य, रत्न-जेवरात बिखरे हुए थे। कथा की फलश्रुति यह है कि मां लक्ष्मीदेवी जैसी उस वृद्धा पर प्रसन्न हुईं वैसी सब पर हों। और तभी से कार्तिक अमावस की रात को दीप जलाने की प्रथा चल पड़ी। लोग द्वार खोलकर लक्ष्मीदेवी के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे। किंतु मानव समाज यह तथ्य नहीं समझ सका कि मात्र दीप जलाने और द्वार खोलने से महालक्ष्मी घर में प्रवेश नहीं करेंगी। बल्कि सारी रात परिश्रम करने वाली वृद्धा की तरह कर्म करने पर और अंधेरी राहों पर भटक जाने वाले पथिकों के लिए दीपकों का प्रकाश फैलाने पर घरों में लक्ष्मी विश्राम करेंगी। ध्यान दिया जाए कि वे विश्राम करेंगी, निवास नहीं। क्योंकि लक्ष्मी का दूसरा नाम ही चंचला है। अर्थात् अस्थिर रहना उनकी प्रकृति है। इस दीपोत्सव पर कामना करें कि राष्ट्रीय एकता का स्वर्णदीप युगों-युगों तक अखंड बना रहे। हम ग्रहण कर सकें नन्हे-से दीप की कोमल-सी बाती का गहरा-सा संदेश कि बस अंधकार को पराजित करना है और नैतिकता के सौम्य उजास से भर उठना है।  ।। न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो ना शुभामति: भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां सूक्त जापिनाम्।। अर्थात् लक्ष्मी सूक्त का पाठ करने वाले की क्रोध, मत्सर, लोभ व अन्य अशुभ कर्मों में वृत्ति नहीं रहती। वे सत्कर्मों की ओर प्रेरित होते हैं।

दीपावली पर प्रचलित है लक्ष्मी जी की यह पौराणिक कथा Read More »