CHALISA

Sita Chalisa:सीता चालीसा

Sita Chalisa:सीता चालीसा: आदर्श पत्नी और देवी का गुणगान Sita Chalisa:सीता चालीसा हिंदू धर्म में माता सीता की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। माता सीता को आदर्श पत्नी और देवी का दर्जा प्राप्त है। यह चालीसा भक्तों को माता सीता के करीब लाने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने का एक माध्यम है। Sita Chalisa:सीता चालीसा का महत्व Sita Chalisa:सीता चालीसा पढ़ने का तरीका Sita Chalisa:सीता चालीसा ॥ दोहा ॥बन्दौ चरण सरोज निज जनक लली सुख धाम,राम प्रिय किरपा करें सुमिरौं आठों धाम ॥कीरति गाथा जो पढ़ें सुधरैं सगरे काम,मन मन्दिर बासा करें दुःख भंजन सिया राम ॥ ॥ चौपाई ॥राम प्रिया रघुपति रघुराई,बैदेही की कीरत गाई ॥ चरण कमल बन्दों सिर नाई,सिय सुरसरि सब पाप नसाई ॥ जनक दुलारी राघव प्यारी,भरत लखन शत्रुहन वारी ॥ दिव्या धरा सों उपजी सीता,मिथिलेश्वर भयो नेह अतीता ॥4 सिया रूप भायो मनवा अति,रच्यो स्वयंवर जनक महीपति ॥ भारी शिव धनु खींचै जोई,सिय जयमाल साजिहैं सोई ॥ भूपति नरपति रावण संगा,नाहिं करि सके शिव धनु भंगा ॥ जनक निराश भए लखि कारन,जनम्यो नाहिं अवनिमोहि तारन ॥8 यह सुन विश्वामित्र मुस्काए,राम लखन मुनि सीस नवाए ॥ आज्ञा पाई उठे रघुराई,इष्ट देव गुरु हियहिं मनाई ॥ जनक सुता गौरी सिर नावा,राम रूप उनके हिय भावा ॥ मारत पलक राम कर धनु लै,खंड खंड करि पटकिन भू पै ॥12 जय जयकार हुई अति भारी,आनन्दित भए सबैं नर नारी ॥ सिय चली जयमाल सम्हाले,मुदित होय ग्रीवा में डाले ॥ मंगल बाज बजे चहुँ ओरा,परे राम संग सिया के फेरा ॥ लौटी बारात अवधपुर आई,तीनों मातु करैं नोराई ॥16 कैकेई कनक भवन सिय दीन्हा,मातु सुमित्रा गोदहि लीन्हा ॥ कौशल्या सूत भेंट दियो सिय,हरख अपार हुए सीता हिय ॥ सब विधि बांटी बधाई,राजतिलक कई युक्ति सुनाई ॥ मंद मती मंथरा अडाइन,राम न भरत राजपद पाइन ॥20 कैकेई कोप भवन मा गइली,वचन पति सों अपनेई गहिली ॥ चौदह बरस कोप बनवासा,भरत राजपद देहि दिलासा ॥ आज्ञा मानि चले रघुराई,संग जानकी लक्षमन भाई ॥ सिय श्री राम पथ पथ भटकैं,मृग मारीचि देखि मन अटकै ॥24 राम गए माया मृग मारन,रावण साधु बन्यो सिय कारन ॥ भिक्षा कै मिस लै सिय भाग्यो,लंका जाई डरावन लाग्यो ॥ राम वियोग सों सिय अकुलानी,रावण सों कही कर्कश बानी ॥ हनुमान प्रभु लाए अंगूठी,सिय चूड़ामणि दिहिन अनूठी ॥28 अष्ठसिद्धि नवनिधि वर पावा,महावीर सिय शीश नवावा ॥ सेतु बाँधी प्रभु लंका जीती,भक्त विभीषण सों करि प्रीती ॥ चढ़ि विमान सिय रघुपति आए,भरत भ्रात प्रभु चरण सुहाए ॥ अवध नरेश पाई राघव से,सिय महारानी देखि हिय हुलसे ॥32 रजक बोल सुनी सिय बन भेजी,लखनलाल प्रभु बात सहेजी ॥ बाल्मीक मुनि आश्रय दीन्यो,लवकुश जन्म वहाँ पै लीन्हो ॥ विविध भाँती गुण शिक्षा दीन्हीं,दोनुह रामचरित रट लीन्ही ॥ लरिकल कै सुनि सुमधुर बानी,रामसिया सुत दुई पहिचानी ॥36 भूलमानि सिय वापस लाए,राम जानकी सबहि सुहाए ॥ सती प्रमाणिकता केहि कारन,बसुंधरा सिय के हिय धारन ॥ अवनि सुता अवनी मां सोई,राम जानकी यही विधि खोई ॥ पतिव्रता मर्यादित माता,सीता सती नवावों माथा ॥40 ॥ दोहा ॥जनकसुत अवनिधिया राम प्रिया लवमात,चरणकमल जेहि उन बसै सीता सुमिरै प्रात ॥

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Parvati Chalisa:पार्वती चालीसा

Parvati Chalisa:पार्वती चालीसा: शक्ति और आशीर्वाद का मंत्र Parvati Chalisa:पार्वती चालीसा हिंदू धर्म में माता पार्वती की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। माता पार्वती को शक्ति और सौंदर्य की देवी माना जाता है। यह चालीसा भक्तों को माता पार्वती के करीब लाने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने का एक माध्यम है। Parvati Chalisa:पार्वती चालीसा का महत्व Parvati Chalisa:पार्वती चालीसा पढ़ने का तरीका Parvati Chalisa:पार्वती चालीसा ॥ दोहा ॥जय गिरी तनये दक्षजेशम्भू प्रिये गुणखानि ।गणपति जननी पार्वतीअम्बे! शक्ति! भवानि ॥ ॥ चौपाई ॥ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे ।पंच बदन नित तुमको ध्यावे ॥ षड्मुख कहि न सकत यश तेरो ।सहसबदन श्रम करत घनेरो ॥ तेऊ पार न पावत माता ।स्थित रक्षा लय हिय सजाता ॥ अधर प्रवाल सदृश अरुणारे ।अति कमनीय नयन कजरारे ॥ ललित ललाट विलेपित केशर ।कुंकुंम अक्षत शोभा मनहर ॥ कनक बसन कंचुकि सजाए ।कटी मेखला दिव्य लहराए ॥ कंठ मदार हार की शोभा ।जाहि देखि सहजहि मन लोभा ॥ बालारुण अनंत छबि धारी ।आभूषण की शोभा प्यारी ॥ नाना रत्न जड़ित सिंहासन ।तापर राजति हरि चतुरानन ॥ इन्द्रादिक परिवार पूजित ।जग मृग नाग यक्ष रव कूजित ॥ 10 गिर कैलास निवासिनी जय जय ।कोटिक प्रभा विकासिनी जय जय ॥ त्रिभुवन सकल कुटुंब तिहारी ।अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी ॥ हैं महेश प्राणेश तुम्हारे ।त्रिभुवन के जो नित रखवारे ॥ उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब ।सुकृत पुरातन उदित भए तब ॥ बूढ़ा बैल सवारी जिनकी ।महिमा का गावे कोउ तिनकी ॥ सदा श्मशान बिहारी शंकर ।आभूषण हैं भुजंग भयंकर ॥ कण्ठ हलाहल को छबि छायी ।नीलकण्ठ की पदवी पायी ॥ देव मगन के हित अस किन्हो ।विष लै आपु तिनहि अमि दिन्हो ॥ ताकी तुम पत्नी छवि धारिणी ।दुरित विदारिणी मंगल कारिणी ॥ देखि परम सौंदर्य तिहारो ।त्रिभुवन चकित बनावन हारो ॥ 20 भय भीता सो माता गंगा ।लज्जा मय है सलिल तरंगा ॥ सौत समान शम्भू पहआयी ।विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी ॥ तेहि कों कमल बदन मुरझायो ।लखी सत्वर शिव शीश चढ़ायो ॥ नित्यानंद करी बरदायिनी ।अभय भक्त कर नित अनपायिनी ॥ अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनी ।माहेश्वरी हिमालय नन्दिनी ॥ काशी पुरी सदा मन भायी ।सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी ॥ भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री ।कृपा प्रमोद सनेह विधात्री ॥ रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे ।वाचा सिद्ध करि अवलम्बे ॥ गौरी उमा शंकरी काली ।अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली ॥ सब जन की ईश्वरी भगवती ।पतिप्राणा परमेश्वरी सती ॥ 30 तुमने कठिन तपस्या कीनी ।नारद सों जब शिक्षा लीनी ॥ अन्न न नीर न वायु अहारा ।अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा ॥ पत्र घास को खाद्य न भायउ ।उमा नाम तब तुमने पायउ ॥ तप बिलोकी ऋषि सात पधारे ।लगे डिगावन डिगी न हारे ॥ तब तब जय जय जय उच्चारेउ ।सप्तऋषि निज गेह सिद्धारेउ ॥ सुर विधि विष्णु पास तब आए ।वर देने के वचन सुनाए ॥ मांगे उमा वर पति तुम तिनसों ।चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों ॥ एवमस्तु कही ते दोऊ गए ।सुफल मनोरथ तुमने लए ॥ करि विवाह शिव सों भामा ।पुनः कहाई हर की बामा ॥ जो पढ़िहै जन यह चालीसा ।धन जन सुख देइहै तेहि ईसा ॥ 40 ॥ दोहा ॥कूटि चंद्रिका सुभग शिर,जयति जयति सुख खा‍निपार्वती निज भक्त हित,रहहु सदा वरदानि ।॥ इति श्री पार्वती चालीसा ॥

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Shani Dev Chalisha:शनि देव चालीसा

Shani Dev Chalisha:श्री शनि देव चालीसा: शनि ग्रह के देवता की स्तुति Shani Dev Chalisha:श्री शनि देव चालीसा हिंदू धर्म में शनि ग्रह के देवता की स्तुति में गाया जाने वाला एक लोकप्रिय भक्ति गीत है। शनि देव को न्याय के देवता भी माना जाता है और वे ग्रहों के राजा भी हैं। Shani Dev Chalisha यह चालीसा शनि देव की शक्ति, उनके गुणों और उनके भक्तों पर कृपा करने की क्षमता का वर्णन करती है। Shani Dev Chalisha:शनि चालीसा का महत्व Shani Dev Chalisha:शनि चालीसा का पाठ कैसे करें? नोट: यदि आप शनि चालीसा का अर्थ जानना चाहते हैं तो आप किसी धार्मिक गुरु या विद्वान से संपर्क कर सकते हैं। Shani Dev Chalisha:शनि देव चालीसा ॥ दोहा ॥श्री शनिश्चर देवजी,सुनहु श्रवण मम् टेर।कोटि विघ्ननाशक प्रभो,करो न मम् हित बेर॥ ॥ सोरठा ॥तव स्तुति हे नाथ,जोरि जुगल कर करत हौं।करिये मोहि सनाथ,विघ्नहरन हे रवि सुव्रन। ॥ चौपाई ॥शनिदेव मैं सुमिरौं तोही। विद्या बुद्धि ज्ञान दो मोही॥तुम्हरो नाम अनेक बखानौं। क्षुद्रबुद्धि मैं जो कुछ जानौं॥ अन्तक, कोण, रौद्रय मनाऊँ। कृष्ण बभ्रु शनि सबहिं सुनाऊँ॥पिंगल मन्दसौरि सुख दाता। हित अनहित सब जग के ज्ञाता॥ नित जपै जो नाम तुम्हारा। करहु व्याधि दुःख से निस्तारा॥राशि विषमवस असुरन सुरनर। पन्नग शेष सहित विद्याधर॥ राजा रंक रहहिं जो नीको। पशु पक्षी वनचर सबही को॥कानन किला शिविर सेनाकर। नाश करत सब ग्राम्य नगर भर॥ डालत विघ्न सबहि के सुख में। व्याकुल होहिं पड़े सब दुःख में॥नाथ विनय तुमसे यह मेरी। करिये मोपर दया घनेरी॥ मम हित विषम राशि महँवासा। करिय न नाथ यही मम आसा॥जो गुड़ उड़द दे बार शनीचर। तिल जव लोह अन्न धन बस्तर॥ दान दिये से होंय सुखारी। सोइ शनि सुन यह विनय हमारी॥नाथ दया तुम मोपर कीजै। कोटिक विघ्न क्षणिक महँ छीजै॥ वंदत नाथ जुगल कर जोरी। सुनहु दया कर विनती मोरी॥कबहुँक तीरथ राज प्रयागा। सरयू तोर सहित अनुरागा॥ कबहुँ सरस्वती शुद्ध नार महँ। या कहुँ गिरी खोह कंदर महँ॥ध्यान धरत हैं जो जोगी जनि। ताहि ध्यान महँ सूक्ष्म होहि शनि॥ है अगम्य क्या करूँ बड़ाई। करत प्रणाम चरण शिर नाई॥जो विदेश से बार शनीचर। मुड़कर आवेगा निज घर पर॥ रहैं सुखी शनि देव दुहाई। रक्षा रवि सुत रखैं बनाई॥जो विदेश जावैं शनिवारा। गृह आवैं नहिं सहै दुखारा॥ संकट देय शनीचर ताही। जेते दुखी होई मन माही॥सोई रवि नन्दन कर जोरी। वन्दन करत मूढ़ मति थोरी॥ ब्रह्मा जगत बनावन हारा। विष्णु सबहिं नित देत अहारा॥हैं त्रिशूलधारी त्रिपुरारी।विभू देव मूरति एक वारी॥ इकहोइ धारण करत शनि नित।वंदत सोई शनि को दमनचित॥जो नर पाठ करै मन चित से।सो नर छूटै व्यथा अमित से॥ हौं सुपुत्र धन सन्तति बाढ़े।कलि काल कर जोड़े ठाढ़े॥पशु कुटुम्ब बांधन आदि से।भरो भवन रहिहैं नित सबसे॥ नाना भाँति भोग सुख सारा।अन्त समय तजकर संसारा॥पावै मुक्ति अमर पद भाई।जो नित शनि सम ध्यान लगाई॥ पढ़ै प्रात जो नाम शनि दस।रहैं शनिश्चर नित उसके बस॥पीड़ा शनि की कबहुँ न होई।नित उठ ध्यान धरै जो कोई॥ जो यह पाठ करैं चालीसा।होय सुख साखी जगदीशा॥चालिस दिन नित पढ़ै सबेरे।पातक नाशै शनी घनेरे॥ रवि नन्दन की अस प्रभुताई।जगत मोहतम नाशै भाई॥याको पाठ करै जो कोई।सुख सम्पति की कमी न होई॥ निशिदिन ध्यान धरै मनमाहीं।आधिव्याधि ढिंग आवै नाहीं॥ ॥ दोहा ॥पाठ शनिश्चर देव को,कीहौं ‘विमल’ तैयार।करत पाठ चालीस दिन,हो भवसागर पार॥ जो स्तुति दशरथ जी कियो,सम्मुख शनि निहार।सरस सुभाषा में वही,ललिता लिखें सुधार॥

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Bhagavad Geeta Chalisa:भगवद गीता चालीसा

Bhagavad Geeta:भगवद गीता चालीसा: एक भ्रामक अवधारणा Bhagavad Geeta:भगवद गीता चालीसा जैसी कोई विशिष्ट चालीसा हिंदू धर्म के प्राचीन ग्रंथों या परंपराओं में उल्लिखित नहीं है। क्यों? क्या हो सकता है? आप क्या कर सकते हैं? निष्कर्ष: Bhagavad Geeta:जब तक आपके पास भगवद गीता चालीसा का कोई विशिष्ट स्रोत या प्रमाण नहीं है, Bhagavad Geeta तब तक यह मान लेना उचित होगा कि यह एक आधुनिक रचना है या कोई भ्रम है। ॥ चौपाई ॥ प्रथमहिं गुरुको शीश नवाऊँ।हरिचरणों में ध्यान लगाऊँ॥गीत सुनाऊँ अद्भुत यार।धारण से हो बेड़ा पार॥ अर्जुन कहै सुनो भगवाना।अपने रूप बताये नाना॥उनका मैं कछु भेद न जाना।किरपा कर फिर कहो सुजाना॥ जो कोई तुमको नित ध्यावे।भक्तिभाव से चित्त लगावे॥रात दिवस तुमरे गुण गावे।तुमसे दूजा मन नहीं भावे॥ तुमरा नाम जपे दिन रात।और करे नहीं दूजी बात॥दूजा निराकार को ध्यावे।अक्षर अलख अनादि बतावे॥ दोनों ध्यान लगाने वाला।उनमें कुण उत्तम नन्दलाला॥अर्जुन से बोले भगवान्।सुन प्यारे कछु देकर ध्यान॥ मेरा नाम जपै जपवावे।नेत्रों में प्रेमाश्रु छावे॥मुझ बिनु और कछु नहीं चावे।रात दिवस मेरा गुण गावे॥ सुनकर मेरा नामोच्चार।उठै रोम तन बारम्बार॥जिनका क्षण टूटै नहिं तार।उनकी श्रद्घा अटल अपार॥ मुझ में जुड़कर ध्यान लगावे।ध्यान समय विह्वल हो जावे॥कंठ रुके बोला नहिं जावे।मन बुधि मेरे माँही समावे॥ लज्जा भय रु बिसारे मान।अपना रहे ना तन का ज्ञान॥ऐसे जो मन ध्यान लगावे।सो योगिन में श्रेष्ठ कहावे॥ जो कोई ध्यावे निर्गुण रूप।पूर्ण ब्रह्म अरु अचल अनूप॥निराकार सब वेद बतावे।मन बुद्धी जहँ थाह न पावे॥ जिसका कबहुँ न होवे नाश।ब्यापक सबमें ज्यों आकाश॥अटल अनादि आनन्दघन।जाने बिरला जोगीजन॥ ऐसा करे निरन्तर ध्यान।सबको समझे एक समान॥मन इन्द्रिय अपने वश राखे।विषयन के सुख कबहुँ न चाखे॥ सब जीवों के हित में रत।ऐसा उनका सच्चा मत॥वह भी मेरे ही को पाते।निश्चय परमा गति को जाते॥ फल दोनों का एक समान।किन्तु कठिन है निर्गुण ध्यान॥जबतक है मन में अभिमान।तबतक होना मुश्किल ज्ञान॥ जिनका है निर्गुण में प्रेम।उनका दुर्घट साधन नेम॥मन टिकने को नहीं अधार।इससे साधन कठिन अपार॥ सगुन ब्रह्म का सुगम उपाय।सो मैं तुझको दिया बताय॥यज्ञ दानादि कर्म अपारा।मेरे अर्पण कर कर सारा॥ अटल लगावे मेरा ध्यान।समझे मुझको प्राण समान॥सब दुनिया से तोड़े प्रीत।मुझको समझे अपना मीत॥ प्रेम मग्न हो अति अपार।समझे यह संसार असार॥जिसका मन नित मुझमें यार।उनसे करता मैं अति प्यार॥ केवट बनकर नाव चलाऊँ।भव सागर के पार लगाऊँ॥यह है सबसे उत्तम ज्ञान।इससे तू कर मेरा ध्यान॥ फिर होवेगा मोहिं सामान।यह कहना मम सच्चा जान॥जो चाले इसके अनुसार।वह भी हो भवसागर पार॥

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Shri Brahma Chalisa:(श्री ब्रह्मा चालीसा)

Brahma Chalisa:श्री ब्रह्मा चालीसा: सृष्टि के रचयिता की स्तुति Brahma Chalisa:श्री ब्रह्मा चालीसा हिंदू धर्म में भगवान ब्रह्मा की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। Brahma Chalisa ब्रह्मा जी को सृष्टि के रचयिता माना जाता है और वे हिंदू त्रिमूर्ति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यह चालीसा भगवान ब्रह्मा के गुणों, कृपा और शक्ति का वर्णन करती है। Brahma Chalisa:श्री ब्रह्मा चालीसा का महत्व Brahma Chalisa:श्री ब्रह्मा चालीसा का पाठ कैसे करें? नोट: यदि आप श्री ब्रह्मा चालीसा का अर्थ जानना चाहते हैं Brahma Chalisa तो आप किसी धार्मिक गुरु या विद्वान से संपर्क कर सकते हैं। ॥ दोहा ॥जय ब्रह्मा जय स्वयम्भू,चतुरानन सुखमूल।करहु कृपा निज दास पै,रहहु सदा अनुकूल॥ तुम सृजक ब्रह्माण्ड के,अज विधि घाता नाम।विश्वविधाता कीजिये,जन पै कृपा ललाम॥ ॥ चौपाई ॥जय जय कमलासान जगमूला।रहहु सदा जनपै अनुकूला॥रुप चतुर्भुज परम सुहावन।तुम्हें अहैं चतुर्दिक आनन॥ रक्तवर्ण तव सुभग शरीरा।मस्तक जटाजुट गंभीरा॥ताके ऊपर मुकुट बिराजै।दाढ़ी श्वेत महाछवि छाजै॥ श्वेतवस्त्र धारे तुम सुन्दर।है यज्ञोपवीत अति मनहर॥कानन कुण्डल सुभग बिराजहिं।गल मोतिन की माला राजहिं॥ चारिहु वेद तुम्हीं प्रगटाये।दिव्य ज्ञान त्रिभुवनहिं सिखाये॥ब्रह्मलोक शुभ धाम तुम्हारा।अखिल भुवन महँ यश बिस्तारा॥ अर्द्धांगिनि तव है सावित्री।अपर नाम हिये गायत्री॥सरस्वती तब सुता मनोहर।वीणा वादिनि सब विधि मुन्दर॥ कमलासन पर रहे बिराजे।तुम हरिभक्ति साज सब साजे॥क्षीर सिन्धु सोवत सुरभूपा।नाभि कमल भो प्रगट अनूपा॥ तेहि पर तुम आसीन कृपाला।सदा करहु सन्तन प्रतिपाला॥एक बार की कथा प्रचारी।तुम कहँ मोह भयेउ मन भारी॥ कमलासन लखि कीन्ह बिचारा।और न कोउ अहै संसारा॥तब तुम कमलनाल गहि लीन्हा।अन्त बिलोकन कर प्रण कीन्हा॥ कोटिक वर्ष गये यहि भांती।भ्रमत भ्रमत बीते दिन राती॥पै तुम ताकर अन्त न पाये।ह्वै निराश अतिशय दुःखियाये॥ पुनि बिचार मन महँ यह कीन्हा।महापघ यह अति प्राचीन॥याको जन्म भयो को कारन।तबहीं मोहि करयो यह धारन॥ अखिल भुवन महँ कहँ कोई नाहीं।सब कुछ अहै निहित मो माहीं॥यह निश्चय करि गरब बढ़ायो।निज कहँ ब्रह्म मानि सुखपाये॥ गगन गिरा तब भई गंभीरा।ब्रह्मा वचन सुनहु धरि धीरा॥सकल सृष्टि कर स्वामी जोई।ब्रह्म अनादि अलख है सोई॥ निज इच्छा इन सब निरमाये।ब्रह्मा विष्णु महेश बनाये॥सृष्टि लागि प्रगटे त्रयदेवा।सब जग इनकी करिहै सेवा॥ महापघ जो तुम्हरो आसन।ता पै अहै विष्णु को शासन॥विष्णु नाभितें प्रगट्यो आई।तुम कहँ सत्य दीन्ह समुझाई॥ भ्ौटहु जाई विष्णु हितमानी।यह कहि बन्द भई नभवानी॥ताहि श्रवण कहि अचरज माना।पुनि चतुरानन कीन्ह पयाना॥ कमल नाल धरि नीचे आवा।तहां विष्णु के दर्शन पावा॥शयन करत देखे सुरभूपा।श्यायमवर्ण तनु परम अनूपा॥ सोहत चतुर्भुजा अतिसुन्दर।क्रीटमुकट राजत मस्तक पर॥गल बैजन्ती माल बिराजै।कोटि सूर्य की शोभा लाजै॥ शंख चक्र अरु गदा मनोहर।शेष नाग शय्या अति मनहर॥दिव्यरुप लखि कीन्ह प्रणामू।हर्षित भे श्रीपति सुख धामू॥ बहु विधि विनय कीन्ह चतुरानन।तब लक्ष्मी पति कहेउ मुदित मन॥ब्रह्मा दूरि करहु अभिमाना।ब्रह्मारुप हम दोउ समाना॥ तीजे श्री शिवशंकर आहीं।ब्रह्मरुप सब त्रिभुवन मांही॥तुम सों होई सृष्टि विस्तारा।हम पालन करिहैं संसारा॥ शिव संहार करहिं सब केरा।हम तीनहुं कहँ काज धनेरा॥अगुणरुप श्री ब्रह्मा बखानहु।निराकार तिनकहँ तुम जानहु॥ हम साकार रुप त्रयदेवा।करिहैं सदा ब्रह्म की सेवा॥यह सुनि ब्रह्मा परम सिहाये।परब्रह्म के यश अति गाये॥ सो सब विदित वेद के नामा।मुक्ति रुप सो परम ललामा॥यहि विधि प्रभु भो जनम तुम्हारा।पुनि तुम प्रगट कीन्ह संसारा॥ नाम पितामह सुन्दर पायेउ।जड़ चेतन सब कहँ निरमायेउ॥लीन्ह अनेक बार अवतारा।सुन्दर सुयश जगत विस्तारा॥ देवदनुज सब तुम कहँ ध्यावहिं।मनवांछित तुम सन सब पावहिं॥जो कोउ ध्यान धरै नर नारी।ताकी आस पुजावहु सारी॥ पुष्कर तीर्थ परम सुखदाई।तहँ तुम बसहु सदा सुरराई॥कुण्ड नहाइ करहि जो पूजन।ता कर दूर होई सब दूषण॥

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Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा 

Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा: बाल गोपाल की भक्ति Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा हिंदू धर्म में भगवान कृष्ण के बाल रूप, गोपाल, की स्तुति करने वाला एक लोकप्रिय भजन है। यह चालीसा विशेष रूप से संतान प्राप्ति की कामना करने वाले भक्तों द्वारा गाया जाता है। Gopal Chalisa माना जाता है कि गोपाल चालीसा का नियमित पाठ करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा का महत्व Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा का पाठ कैसे करें Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा ॥ दोहा ॥श्री राधापद कमल रज,सिर धरि यमुना कूल।वरणो चालीसा सरस,सकल सुमंगल मूल॥ ॥ चौपाई ॥जय जय पूरण ब्रह्म बिहारी।दुष्ट दलन लीला अवतारी॥जो कोई तुम्हरी लीला गावै।बिन श्रम सकल पदारथ पावै॥ श्री वसुदेव देवकी माता।प्रकट भये संग हलधर भ्राता॥मथुरा सों प्रभु गोकुल आये।नन्द भवन में बजत बधाये॥ जो विष देन पूतना आई।सो मुक्ति दै धाम पठाई॥तृणावर्त राक्षस संहार्यौ।पग बढ़ाय सकटासुर मार्यौ॥ खेल खेल में माटी खाई।मुख में सब जग दियो दिखाई॥गोपिन घर घर माखन खायो।जसुमति बाल केलि सुख पायो॥ ऊखल सों निज अंग बँधाई।यमलार्जुन जड़ योनि छुड़ाई॥बका असुर की चोंच विदारी।विकट अघासुर दियो सँहारी॥ ब्रह्मा बालक वत्स चुराये।मोहन को मोहन हित आये॥बाल वत्स सब बने मुरारी।ब्रह्मा विनय करी तब भारी॥ काली नाग नाथि भगवाना।दावानल को कीन्हों पाना॥सखन संग खेलत सुख पायो।श्रीदामा निज कन्ध चढ़ायो॥ चीर हरन करि सीख सिखाई।नख पर गिरवर लियो उठाई॥दरश यज्ञ पत्निन को दीन्हों।राधा प्रेम सुधा सुख लीन्हों॥ नन्दहिं वरुण लोक सों लाये।ग्वालन को निज लोक दिखाये॥शरद चन्द्र लखि वेणु बजाई।अति सुख दीन्हों रास रचाई॥ अजगर सों पितु चरण छुड़ायो।शंखचूड़ को मूड़ गिरायो॥हने अरिष्टा सुर अरु केशी।व्योमासुर मार्यो छल वेषी॥ व्याकुल ब्रज तजि मथुरा आये।मारि कंस यदुवंश बसाये॥मात पिता की बन्दि छुड़ाई।सान्दीपनि गृह विद्या पाई॥ पुनि पठयौ ब्रज ऊधौ ज्ञानी।प्रेम देखि सुधि सकल भुलानी॥कीन्हीं कुबरी सुन्दर नारी।हरि लाये रुक्मिणि सुकुमारी॥ भौमासुर हनि भक्त छुड़ाये।सुरन जीति सुरतरु महि लाये॥दन्तवक्र शिशुपाल संहारे।खग मृग नृग अरु बधिक उधारे॥ दीन सुदामा धनपति कीन्हों।पारथ रथ सारथि यश लीन्हों॥गीता ज्ञान सिखावन हारे।अर्जुन मोह मिटावन हारे॥ केला भक्त बिदुर घर पायो।युद्ध महाभारत रचवायो॥द्रुपद सुता को चीर बढ़ायो।गर्भ परीक्षित जरत बचायो॥ कच्छ मच्छ वाराह अहीशा।बावन कल्की बुद्धि मुनीशा॥ह्वै नृसिंह प्रह्लाद उबार्यो।राम रुप धरि रावण मार्यो॥ जय मधु कैटभ दैत्य हनैया।अम्बरीय प्रिय चक्र धरैया॥ब्याध अजामिल दीन्हें तारी।शबरी अरु गणिका सी नारी॥ गरुड़ासन गज फन्द निकन्दन।देहु दरश ध्रुव नयनानन्दन॥देहु शुद्ध सन्तन कर सङ्गा।बाढ़ै प्रेम भक्ति रस रङ्गा॥ देहु दिव्य वृन्दावन बासा।छूटै मृग तृष्णा जग आशा॥तुम्हरो ध्यान धरत शिव नारद।शुक सनकादिक ब्रह्म विशारद॥ जय जय राधारमण कृपाला।हरण सकल संकट भ्रम जाला॥बिनसैं बिघन रोग दुःख भारी।जो सुमरैं जगपति गिरधारी॥ जो सत बार पढ़ै चालीसा।देहि सकल बाँछित फल शीशा॥ ॥ छन्द ॥गोपाल चालीसा पढ़ै नित,नेम सों चित्त लावई।सो दिव्य तन धरि अन्त महँ,गोलोक धाम सिधावई॥ संसार सुख सम्पत्ति सकल,जो भक्तजन सन महँ चहैं।‘जयरामदेव’ सदैव सो,गुरुदेव दाया सों लहैं॥ ॥ दोहा ॥प्रणत पाल अशरण शरण,करुणा-सिन्धु ब्रजेश।चालीसा के संग मोहि,अपनावहु प्राणेश॥

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Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा

Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा: गोवर्धन पर्वत की महिमा Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा हिंदू धर्म में गोवर्धन पर्वत की महिमा का वर्णन करने वाला एक भक्ति गीत है। गोवर्धन पर्वत को भगवान कृष्ण से गहरा संबंध है। Giriraj Chalisa जब इंद्र देव ने ब्रजवासियों पर प्रचंड वर्षा की थी, तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों को बचाया था। Giriraj Chalisa इस घटना के बाद से गोवर्धन पर्वत को पूजनीय माना जाता है। Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा का महत्व Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा का पाठ कैसे करें Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा ॥ दोहा ॥बन्दहुँ वीणा वादिनी,धरि गणपति को ध्यान।महाशक्ति राधा सहित,कृष्ण करौ कल्याण॥ सुमिरन करि सब देवगण,गुरु पितु बारम्बार।बरनौ श्रीगिरिराज यश,निज मति के अनुसार॥ ॥ चौपाई ॥जय हो जय बंदित गिरिराजा।ब्रज मण्डल के श्री महाराजा॥विष्णु रूप तुम हो अवतारी।सुन्दरता पै जग बलिहारी॥ स्वर्ण शिखर अति शोभा पामें।सुर मुनि गण दरशन कूं आमें॥शांत कन्दरा स्वर्ग समाना।जहाँ तपस्वी धरते ध्याना॥ द्रोणगिरि के तुम युवराजा।भक्तन के साधौ हौ काजा॥मुनि पुलस्त्य जी के मन भाये।जोर विनय कर तुम कूँ लाये॥ मुनिवर संघ जब ब्रज में आये।लखि ब्रजभूमि यहाँ ठहराये॥विष्णु धाम गौलोक सुहावन।यमुना गोवर्धन वृन्दावन॥ देख देव मन में ललचाये।बास करन बहु रूप बनाये॥कोउ बानर कोउ मृग के रूपा।कोउ वृक्ष कोउ लता स्वरूपा॥ आनन्द लें गोलोक धाम के।परम उपासक रूप नाम के॥द्वापर अंत भये अवतारी।कृष्णचन्द्र आनन्द मुरारी॥ महिमा तुम्हरी कृष्ण बखानी।पूजा करिबे की मन ठानी॥ब्रजवासी सब के लिये बुलाई।गोवर्द्धन पूजा करवाई॥ पूजन कूँ व्यञ्जन बनवाये।ब्रजवासी घर घर ते लाये॥ग्वाल बाल मिलि पूजा कीनी।सहस भुजा तुमने कर लीनी॥ स्वयं प्रकट हो कृष्ण पूजा में।माँग माँग के भोजन पामें॥लखि नर नारि मन हरषामें।जै जै जै गिरिवर गुण गामें॥ देवराज मन में रिसियाए।नष्ट करन ब्रज मेघ बुलाए॥छाँया कर ब्रज लियौ बचाई।एकउ बूँद न नीचे आई॥ सात दिवस भई बरसा भारी।थके मेघ भारी जल धारी॥कृष्णचन्द्र ने नख पै धारे।नमो नमो ब्रज के रखवारे॥ करि अभिमान थके सुरसाई।क्षमा माँग पुनि अस्तुति गाई॥त्राहि माम् मैं शरण तिहारी।क्षमा करो प्रभु चूक हमारी॥ बार बार बिनती अति कीनी।सात कोस परिकम्मा दीनी॥संग सुरभि ऐरावत लाये।हाथ जोड़ कर भेंट गहाये॥ अभय दान पा इन्द्र सिहाये।करि प्रणाम निज लोक सिधाये॥जो यह कथा सुनैं चित लावें।अन्त समय सुरपति पद पावें॥ गोवर्द्धन है नाम तिहारौ।करते भक्तन कौ निस्तारौ॥जो नर तुम्हरे दर्शन पावें।तिनके दुःख दूर ह्वै जावें॥ कुण्डन में जो करें आचमन।धन्य धन्य वह मानव जीवन॥मानसी गंगा में जो न्हावें।सीधे स्वर्ग लोक कूँ जावें॥ दूध चढ़ा जो भोग लगावें।आधि व्याधि तेहि पास न आवें॥जल फल तुलसी पत्र चढ़ावें।मन वांछित फल निश्चय पावें॥ जो नर देत दूध की धारा।भरौ रहे ताकौ भण्डारा॥करें जागरण जो नर कोई।दुख दरिद्र भय ताहि न होई॥ ‘श्याम’ शिलामय निज जन त्राता।भक्ति मुक्ति सरबस के दाता॥पुत्र हीन जो तुम कूँ ध्यावें।ताकूँ पुत्र प्राप्ति ह्वै जावें॥ दंडौती परिकम्मा करहीं।ते सहजहि भवसागर तरहीं॥कलि में तुम सम देव न दूजा।सुर नर मुनि सब करते पूजा॥ ॥ दोहा ॥जो यह चालीसा पढ़ै,सुनै शुद्ध चित्त लाय।सत्य सत्य यह सत्य है,गिरिवर करै सहाय॥ क्षमा करहुँ अपराध मम,त्राहि माम् गिरिराज।श्याम बिहारी शरण में,गोवर्द्धन महाराज॥

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Ramdev Chalisa:रामदेव चालीसा

Ramdev Chalisa:रामदेव चालीसा: एक संक्षिप्त परिचय रामदेव चालीसा हिंदू धर्म के एक लोकप्रिय भजन है, जो रामदेव पीर के प्रति समर्पित है। Ramdev Chalisa रामदेव पीर को राजस्थान के एक लोक देवता के रूप में पूजा जाता है। यह चालीसा उनके जीवन, चमत्कारों और शिक्षाओं का वर्णन करती है। Ramdev Chalisa:रामदेव चालीसा का महत्व Ramdev Chalisa:रामदेव चालीसा का पाठ कैसे करें Ramdev Chalisa:रामदेव चालीसा ॥ दोहा ॥श्री गुरु पद नमन करि,गिरा गनेश मनाय ।कथूं रामदेव विमल यश,सुने पाप विनशाय ॥द्वार केश से आय कर,लिया मनुज अवतार ।अजमल गेह बधावणा,जग में जय जयकार ॥ ॥ चौपाई ॥जय जय रामदेव सुर राया।अजमल पुत्र अनोखी माया॥विष्णु रूप सुर नर के स्वामी।परम प्रतापी अन्तर्यामी॥ ले अवतार अवनि पर आये।तंवर वंश अवतंश कहाये॥संत जनों के कारज सारे।दानव दैत्य दुष्ट संहारे॥ परच्या प्रथम पिता को दीन्हा।दूध परीण्डा मांही कीन्हा॥कुमकुम पद पोली दर्शाये।ज्योंही प्रभु पलने प्रगटाये॥ परचा दूजा जननी पाया।दूध उफणता चरा उठाया॥परचा तीजा पुरजन पाया।चिथड़ों का घोड़ा ही साया॥ परच्या चौथा भैरव मारा।भक्त जनों का कष्ट निवारा॥पंचम परच्या रतना पाया।पुंगल जा प्रभु फंद छुड़ाया॥ परच्या छठा विजयसिंह पाया।जला नगर शरणागत आया॥परच्या सप्तम् सुगना पाया।मुवा पुत्र हंसता भग आया॥ परच्या अष्टम् बौहित पाया।जा परदेश द्रव्य बहु लाया॥भंवर डूबती नाव उबारी।प्रगत टेर पहुँचे अवतारी॥ नवमां परच्या वीरम पाया।बनियां आ जब हाल सुनाया॥दसवां परच्या पा बिनजारा।मिश्री बनी नमक सब खारा॥ परच्या ग्यारह किरपा थारी।नमक हुआ मिश्री फिर सारी॥परच्या द्वादश ठोकर मारी।निकलंग नाड़ी सिरजी प्यारी॥ परच्या तेरहवां पीर परी पधारया।ल्याय कटोरा कारज सारा॥चौदहवां परच्या जाभो पाया।निजसर जल खारा करवाया॥ परच्या पन्द्रह फिर बतलाया।राम सरोवर प्रभु खुदवाया॥परच्या सोलह हरबू पाया।दर्श पाय अतिशय हरषाया॥ परच्या सत्रह हर जी पाया।दूध थणा बकरया के आया॥सुखी नाडी पानी कीन्हों।आत्म ज्ञान हरजी ने दीन्हों॥ परच्या अठारहवां हाकिम पाया।सूते को धरती लुढ़काया॥परच्या उन्नीसवां दल जी पाया।पुत्र पाय मन में हरषाया॥ परच्या बीसवां पाया सेठाणी।आये प्रभु सुन गदगद वाणी॥तुरंत सेठ सरजीवण कीन्हा।उक्त उजागर अभय वर दीन्हा॥ परच्या इक्कीसवां चोर जो पाया।हो अन्धा करनी फल पाया॥परच्या बाईसवां मिर्जो चीहां।सातो तवा बेध प्रभु दीन्हां॥ परच्या तेईसवां बादशाह पाया।फेर भक्त को नहीं सताया॥परच्या चैबीसवां बख्शी पाया।मुवा पुत्र पल में उठ धाया॥ जब-जब जिसने सुमरण कीन्हां।तब-तब आ तुम दर्शन दीन्हां॥भक्त टेर सुन आतुर धाते।चढ़ लीले पर जल्दी आते॥ जो जन प्रभु की लीला गावें।मनवांछित कारज फल पावें॥यह चालीसा सुने सुनावे।ताके कष्ट सकल कट जावे॥ जय जय जय प्रभु लीला धारी।तेरी महिमा अपरम्पारी॥मैं मूरख क्या गुण तब गाऊँ।कहाँ बुद्धि शारद सी लाऊँ॥ नहीं बुद्धि बल घट लव लेशा।मती अनुसार रची चालीसा॥दास सभी शरण में तेरी।रखियों प्रभु लज्जा मेरी॥

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Batuk Bhairav ​​Chalisa:बटुक भैरव चालीसा

Bhairav ​​Chalisa:बटुक भैरव चालीसा: भैरव देवता का स्तुतिगान Bhairav ​​Chalisa:बटुक भैरव चालीसा हिंदू धर्म में एक प्रसिद्ध स्तोत्र है जो भैरव देवता के बाल रूप, बटुक भैरव की स्तुति करता है। भैरव देवता शिव के क्रोध रूप माने जाते हैं Bhairav ​​Chalisa और उन्हें संकटमोचन के रूप में पूजा जाता है। Bhairav ​​Chalisa बटुक भैरव को विशेष रूप से युवाओं और छात्रों द्वारा पूजा जाता है। Bhairav ​​Chalisa:बटुक भैरव चालीसा का महत्व Bhairav ​​Chalisa:बटुक भैरव चालीसा कैसे पढ़ें? बटुक भैरव चालीसा के कुछ लाभ अन्य जानकारी: बटुक भैरव चालीसा (Batuk Bhairav ​​Chalisa) ॥ दोहा ॥विश्वनाथ को सुमिर मन,धर गणेश का ध्यान।भैरव चालीसा रचूं,कृपा करहु भगवान॥ बटुकनाथ भैरव भजू,श्री काली के लाल।छीतरमल पर कर कृपा,काशी के कुतवाल॥ ॥ चौपाई ॥जय जय श्रीकाली के लाला।रहो दास पर सदा दयाला॥भैरव भीषण भीम कपाली।क्रोधवन्त लोचन में लाली॥ कर त्रिशूल है कठिन कराला।गल में प्रभु मुण्डन की माला॥कृष्ण रूप तन वर्ण विशाला।पीकर मद रहता मतवाला॥ रुद्र बटुक भक्तन के संगी।प्रेत नाथ भूतेश भुजंगी॥त्रैलतेश है नाम तुम्हारा।चक्र तुण्ड अमरेश पियारा॥ शेखरचंद्र कपाल बिराजे।स्वान सवारी पै प्रभु गाजे॥शिव नकुलेश चण्ड हो स्वामी।बैजनाथ प्रभु नमो नमामी॥ अश्वनाथ क्रोधेश बखाने।भैरों काल जगत ने जाने॥गायत्री कहैं निमिष दिगम्बर।जगन्नाथ उन्नत आडम्बर॥ क्षेत्रपाल दसपाण कहाये।मंजुल उमानन्द कहलाये॥चक्रनाथ भक्तन हितकारी।कहैं त्र्यम्बक सब नर नारी॥ संहारक सुनन्द तव नामा।करहु भक्त के पूरण कामा॥नाथ पिशाचन के हो प्यारे।संकट मेटहु सकल हमारे॥ कृत्यायु सुन्दर आनन्दा।भक्त जनन के काटहु फन्दा॥कारण लम्ब आप भय भंजन।नमोनाथ जय जनमन रंजन॥ हो तुम देव त्रिलोचन नाथा।भक्त चरण में नावत माथा॥त्वं अशतांग रुद्र के लाला।महाकाल कालों के काला॥ ताप विमोचन अरि दल नासा।भाल चन्द्रमा करहि प्रकाशा॥श्वेत काल अरु लाल शरीरा।मस्तक मुकुट शीश पर चीरा॥ काली के लाला बलधारी।कहाँ तक शोभा कहूँ तुम्हारी॥शंकर के अवतार कृपाला।रहो चकाचक पी मद प्याला॥ शंकर के अवतार कृपाला।बटुक नाथ चेटक दिखलाओ॥रवि के दिन जन भोग लगावें।धूप दीप नैवेद्य चढ़ावें॥ दरशन करके भक्त सिहावें।दारुड़ा की धार पिलावें॥मठ में सुन्दर लटकत झावा।सिद्ध कार्य कर भैरों बाबा॥ नाथ आपका यश नहीं थोड़ा।करमें सुभग सुशोभित कोड़ा॥कटि घूँघरा सुरीले बाजत।कंचनमय सिंहासन राजत॥ नर नारी सब तुमको ध्यावहिं।मनवांछित इच्छाफल पावहिं॥भोपा हैं आपके पुजारी।करें आरती सेवा भारी॥ भैरव भात आपका गाऊँ।बार बार पद शीश नवाऊँ॥आपहि वारे छीजन धाये।ऐलादी ने रूदन मचाये॥ बहन त्यागि भाई कहाँ जावे।तो बिन को मोहि भात पिन्हावे॥रोये बटुक नाथ करुणा कर।गये हिवारे मैं तुम जाकर॥ दुखित भई ऐलादी बाला।तब हर का सिंहासन हाला॥समय व्याह का जिस दिन आया।प्रभु ने तुमको तुरत पठाया॥ विष्णु कही मत विलम्ब लगाओ।तीन दिवस को भैरव जाओ॥दल पठान संग लेकर धाया।ऐलादी को भात पिन्हाया॥ पूरन आस बहन की कीनी।सुर्ख चुन्दरी सिर धर दीनी॥भात भेरा लौटे गुण ग्रामी।नमो नमामी अन्तर्यामी॥ ॥ दोहा ॥जय जय जय भैरव बटुक,स्वामी संकट टार।कृपा दास पर कीजिए,शंकर के अवतार॥ जो यह चालीसा पढे,प्रेम सहित सत बार।उस घर सर्वानन्द हों,वैभव बढ़ें अपार॥

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Shri Balaji Chalisa:बालाजी चालीसा

Balaji Chalisa:बालाजी चालीसा: भक्तों का प्रिय स्तोत्र Balaji Chalisa:बालाजी चालीसा हिंदू धर्म में एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय स्तोत्र है Balaji Chalisa जो भगवान हनुमान के एक विशेष अवतार, बालाजी को समर्पित है। बालाजी को मेहंदीपुर बालाजी के नाम से भी जाना जाता है और उन्हें संकटमोचन के रूप में पूजा जाता है। Balaji Chalisa:बालाजी चालीसा का महत्व Balaji Chalisa:बालाजी चालीसा कैसे पढ़ें? Balaji Chalisa:बालाजी चालीसा के कुछ लाभ अन्य जानकारी: बालाजी चालीसा (Shri Balaji Chalisa) ॥ दोहा ॥श्री गुरु चरण चितलाय,के धरें ध्यान हनुमान।बालाजी चालीसा लिखे,दास स्नेही कल्याण॥ विश्व विदित वर दानी,संकट हरण हनुमान।मैंहदीपुर में प्रगट भये,बालाजी भगवान॥ ॥ चौपाई ॥जय हनुमान बालाजी देवा।प्रगट भये यहां तीनों देवा॥प्रेतराज भैरव बलवाना।कोतवाल कप्तानी हनुमाना॥ मैंहदीपुर अवतार लिया है।भक्तों का उध्दार किया है॥बालरूप प्रगटे हैं यहां पर।संकट वाले आते जहाँ पर॥ डाकनि शाकनि अरु जिन्दनीं।मशान चुड़ैल भूत भूतनीं॥जाके भय ते सब भाग जाते।स्याने भोपे यहाँ घबराते॥ चौकी बन्धन सब कट जाते।दूत मिले आनन्द मनाते॥सच्चा है दरबार तिहारा।शरण पड़े सुख पावे भारा॥ रूप तेज बल अतुलित धामा।सन्मुख जिनके सिय रामा॥कनक मुकुट मणि तेज प्रकाशा।सबकी होवत पूर्ण आशा॥ महन्त गणेशपुरी गुणीले।भये सुसेवक राम रंगीले॥अद्भुत कला दिखाई कैसी।कलयुग ज्योति जलाई जैसी॥ ऊँची ध्वजा पताका नभ में।स्वर्ण कलश हैं उन्नत जग में॥धर्म सत्य का डंका बाजे।सियाराम जय शंकर राजे॥ आन फिराया मुगदर घोटा।भूत जिन्द पर पड़ते सोटा॥राम लक्ष्मन सिय ह्रदय कल्याणा।बाल रूप प्रगटे हनुमाना॥ जय हनुमन्त हठीले देवा।पुरी परिवार करत हैं सेवा॥लड्डू चूरमा मिश्री मेवा।अर्जी दरखास्त लगाऊ देवा॥ दया करे सब विधि बालाजी।संकट हरण प्रगटे बालाजी॥जय बाबा की जन जन ऊचारे।कोटिक जन तेरे आये द्वारे॥ बाल समय रवि भक्षहि लीन्हा।तिमिर मय जग कीन्हो तीन्हा॥देवन विनती की अति भारी।छाँड़ दियो रवि कष्ट निहारी॥ लांघि उदधि सिया सुधि लाये।लक्ष्मन हित संजीवन लाये॥रामानुज प्राण दिवाकर।शंकर सुवन माँ अंजनी चाकर॥ केशरी नन्दन दुख भव भंजन।रामानन्द सदा सुख सन्दन॥सिया राम के प्राण पियारे।जब बाबा की भक्त ऊचारे॥ संकट दुख भंजन भगवाना।दया करहु हे कृपा निधाना॥सुमर बाल रूप कल्याणा।करे मनोरथ पूर्ण कामा॥ अष्ट सिद्धि नव निधि दातारी।भक्त जन आवे बहु भारी॥मेवा अरु मिष्ठान प्रवीना।भैंट चढ़ावें धनि अरु दीना॥ नृत्य करे नित न्यारे न्यारे।रिद्धि सिद्धियां जाके द्वारे॥अर्जी का आदेश मिलते ही।भैरव भूत पकड़ते तबही॥ कोतवाल कप्तान कृपाणी।प्रेतराज संकट कल्याणी॥चौकी बन्धन कटते भाई।जो जन करते हैं सेवकाई॥ रामदास बाल भगवन्ता।मैंहदीपुर प्रगटे हनुमन्ता॥जो जन बालाजी में आते।जन्म जन्म के पाप नशाते॥ जल पावन लेकर घर जाते।निर्मल हो आनन्द मनाते॥क्रूर कठिन संकट भग जावे।सत्य धर्म पथ राह दिखावे॥ जो सत पाठ करे चालीसा।तापर प्रसन्न होय बागीसा॥कल्याण स्नेही, स्नेह से गावे।सुख समृद्धि रिद्धि सिद्धि पावे॥ ॥ दोहा ॥मन्द बुद्धि मम जानके,क्षमा करो गुणखान।संकट मोचन क्षमहु मम,दास स्नेही कल्याण॥

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Shri Pitar Chalisa:श्री पितर चालीसा 

Pitar Chalisa:श्री पितर चालीसा: आपके पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का भाव Pitar Chalisa:श्री पितर चालीसा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है जो हमारे Pitar Chalisa पूर्वजों या पितरों को समर्पित है। यह चालीसा पितृ पक्ष के दौरान विशेष रूप से गाया जाता है, जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार एक महत्वपूर्ण अवधि होती है जब हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। Pitar Chalisa:पितर चालीसा का महत्व Pitar Chalisa:पितर चालीसा कैसे पढ़ें? Pitar Chalisa:पितर चालीसा के कुछ लाभ अन्य जानकारी श्री पितर चालीसा एक भक्ति गीत है जो श्री पितर पर आधारित है। कई लोग श्री पितर चालीसा का पाठ पितरों के श्राद्ध के दौरान करते हैं। पितर को पितृ, जो कि परिवार के मृतक पूर्वज होते हैं, के रूप में भी जाना जाता है। ॥ दोहा ॥हे पितरेश्वर आपको,दे दियो आशीर्वाद।चरणाशीश नवा दियो,रखदो सिर पर हाथ॥ सबसे पहले गणपत,पाछे घर का देव मनावा जी।हे पितरेश्वर दया राखियो,करियो मन की चाया जी॥ ॥ चौपाई ॥पितरेश्वर करो मार्ग उजागर।चरण रज की मुक्ति सागर॥परम उपकार पित्तरेश्वर कीन्हा।मनुष्य योणि में जन्म दीन्हा॥ मातृ-पितृ देव मनजो भावे।सोई अमित जीवन फल पावे॥जै-जै-जै पित्तर जी साईं।पितृ ऋण बिन मुक्ति नाहिं॥ चारों ओर प्रताप तुम्हारा।संकट में तेरा ही सहारा॥नारायण आधार सृष्टि का।पित्तरजी अंश उसी दृष्टि का॥ प्रथम पूजन प्रभु आज्ञा सुनाते।भाग्य द्वार आप ही खुलवाते॥झुंझुनू में दरबार है साजे।सब देवों संग आप विराजे॥ प्रसन्न होय मनवांछित फल दीन्हा।कुपित होय बुद्धि हर लीन्हा॥पित्तर महिमा सबसे न्यारी।जिसका गुणगावे नर नारी॥ तीन मण्ड में आप बिराजे।बसु रुद्र आदित्य में साजे॥नाथ सकल संपदा तुम्हारी।मैं सेवक समेत सुत नारी॥ छप्पन भोग नहीं हैं भाते।शुद्ध जल से ही तृप्त हो जाते॥तुम्हारे भजन परम हितकारी।छोटे बड़े सभी अधिकारी॥ भानु उदय संग आप पुजावै।पांच अँजुलि जल रिझावे॥ध्वज पताका मण्ड पे है साजे।अखण्ड ज्योति में आप विराजे॥ सदियों पुरानी ज्योति तुम्हारी।धन्य हुई जन्म भूमि हमारी॥शहीद हमारे यहाँ पुजाते।मातृ भक्ति संदेश सुनाते॥ जगत पित्तरो सिद्धान्त हमारा।धर्म जाति का नहीं है नारा॥हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई।सब पूजे पित्तर भाई॥ हिन्दु वंश वृक्ष है हमारा।जान से ज्यादा हमको प्यारा॥गंगा ये मरुप्रदेश की।पितृ तर्पण अनिवार्य परिवेश की॥ बन्धु छोड़ना इनके चरणाँ।इन्हीं की कृपा से मिले प्रभु शरणा॥चौदस को जागरण करवाते।अमावस को हम धोक लगाते॥ जात जडूला सभी मनाते।नान्दीमुख श्राद्ध सभी करवाते॥धन्य जन्म भूमि का वो फूल है।जिसे पितृ मण्डल की मिली धूल है॥ श्री पित्तर जी भक्त हितकारी।सुन लीजे प्रभु अरज हमारी॥निशदिन ध्यान धरे जो कोई।ता सम भक्त और नहीं कोई॥ तुम अनाथ के नाथ सहाई।दीनन के हो तुम सदा सहाई॥चारिक वेद प्रभु के साखी।तुम भक्तन की लज्जा राखी॥ नाम तुम्हारो लेत जो कोई।ता सम धन्य और नहीं कोई॥जो तुम्हारे नित पाँव पलोटत।नवों सिद्धि चरणा में लोटत॥ सिद्धि तुम्हारी सब मंगलकारी।जो तुम पे जावे बलिहारी॥जो तुम्हारे चरणा चित्त लावे।ताकी मुक्ति अवसी हो जावे॥ सत्य भजन तुम्हारो जो गावे।सो निश्चय चारों फल पावे॥तुमहिं देव कुलदेव हमारे।तुम्हीं गुरुदेव प्राण से प्यारे॥ सत्य आस मन में जो होई।मनवांछित फल पावें सोई॥तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।शेष सहस्र मुख सके न गाई॥ मैं अतिदीन मलीन दुखारी।करहु कौन विधि विनय तुम्हारी॥अब पित्तर जी दया दीन पर कीजै।अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥ ॥ दोहा ॥पित्तरौं को स्थान दो,तीरथ और स्वयं ग्राम।श्रद्धा सुमन चढ़ें वहां,पूरण हो सब काम॥ झुंझुनू धाम विराजे हैं,पित्तर हमारे महान।दर्शन से जीवन सफल हो,पूजे सकल जहान॥ जीवन सफल जो चाहिए,चले झुंझुनू धाम।पित्तर चरण की धूल ले,हो जीवन सफल महान॥

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Sri Lalita Chalisa:श्री ललिता चालीसा

Lalita Chalisa:श्री ललिता चालीसा: एक विस्तृत दृष्टिकोण Lalita Chalisa:श्री ललिता चालीसा हिंदू धर्म में एक प्रसिद्ध स्तुति है जो देवी ललिता, शक्ति के एक रूप की स्तुति करती है। यह चालीसा देवी के विभिन्न रूपों, उनके गुणों और उनके भक्तों पर उनकी कृपा का वर्णन करती है। ललिता चालीसा एक भक्ति गीत है जो ललिता माता पर आधारित है। Lalita Chalisa ललिता चालीसा एक लोकप्रिय प्रार्थना है जो 40 छन्दों से बनी है। ललिता माता के भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए इस चालीसा का पाठ करते हैं। Lalita Chalisa:ललिता देवी कौन हैं? ललिता देवी को शक्ति का सर्वोच्च रूप माना जाता है। Lalita Chalisa उन्हें त्रिपुर सुंदरी, राजराजेश्वरी और शारदा के नाम से भी जाना जाता है। वे सृष्टि, पालन और संहार की देवी हैं। ललिता देवी को अत्यंत शक्तिशाली और दयालु माना जाता है। Lalita Chalisa:श्री ललिता चालीसा का महत्व Lalita Chalisa:श्री ललिता चालीसा का पाठ कैसे करें? Sri Lalita Chalisa:श्री ललिता चालीसा ॥ चौपाई ॥जयति जयति जय ललिते माता।तव गुण महिमा है विख्याता॥तू सुन्दरी, त्रिपुरेश्वरी देवी।सुर नर मुनि तेरे पद सेवी॥ तू कल्याणी कष्ट निवारिणी।तू सुख दायिनी, विपदा हारिणी॥मोह विनाशिनी दैत्य नाशिनी।भक्त भाविनी ज्योति प्रकाशिनी॥ आदि शक्ति श्री विद्या रूपा।चक्र स्वामिनी देह अनूपा॥ह्रदय निवासिनी-भक्त तारिणी।नाना कष्ट विपति दल हारिणी॥ दश विद्या है रुप तुम्हारा।श्री चन्द्रेश्वरी नैमिष प्यारा॥धूमा, बगला, भैरवी, तारा।भुवनेश्वरी, कमला, विस्तारा॥ षोडशी, छिन्न्मस्ता, मातंगी।ललितेशक्ति तुम्हारी संगी॥ललिते तुम हो ज्योतित भाला।भक्त जनों का काम संभाला॥ भारी संकट जब-जब आये।उनसे तुमने भक्त बचाए॥जिसने कृपा तुम्हारी पायी।उसकी सब विधि से बन आयी॥ संकट दूर करो माँ भारी।भक्त जनों को आस तुम्हारी॥त्रिपुरेश्वरी, शैलजा, भवानी।जय जय जय शिव की महारानी॥ योग सिद्दि पावें सब योगी।भोगें भोग महा सुख भोगी॥कृपा तुम्हारी पाके माता।जीवन सुखमय है बन जाता॥ दुखियों को तुमने अपनाया।महा मूढ़ जो शरण न आया॥तुमने जिसकी ओर निहारा।मिली उसे सम्पत्ति, सुख सारा॥ आदि शक्ति जय त्रिपुर प्यारी।महाशक्ति जय जय, भय हारी॥कुल योगिनी, कुण्डलिनी रूपा।लीला ललिते करें अनूपा॥ महा-महेश्वरी, महा शक्ति दे।त्रिपुर-सुन्दरी सदा भक्ति दे॥महा महा-नन्दे कल्याणी।मूकों को देती हो वाणी॥ इच्छा-ज्ञान-क्रिया का भागी।होता तब सेवा अनुरागी॥जो ललिते तेरा गुण गावे।उसे न कोई कष्ट सतावे॥ सर्व मंगले ज्वाला-मालिनी।तुम हो सर्व शक्ति संचालिनी॥आया माँ जो शरण तुम्हारी।विपदा हरी उसी की सारी॥ नामा कर्षिणी, चिन्ता कर्षिणी।सर्व मोहिनी सब सुख-वर्षिणी॥महिमा तव सब जग विख्याता।तुम हो दयामयी जग माता॥ सब सौभाग्य दायिनी ललिता।तुम हो सुखदा करुणा कलिता॥आनन्द, सुख, सम्पत्ति देती हो।कष्ट भयानक हर लेती हो॥ मन से जो जन तुमको ध्यावे।वह तुरन्त मन वांछित पावे॥लक्ष्मी, दुर्गा तुम हो काली।तुम्हीं शारदा चक्र-कपाली॥ मूलाधार, निवासिनी जय जय।सहस्रार गामिनी माँ जय जय॥छ: चक्रों को भेदने वाली।करती हो सबकी रखवाली॥ योगी, भोगी, क्रोधी, कामी।सब हैं सेवक सब अनुगामी॥सबको पार लगाती हो माँ।सब पर दया दिखाती हो माँ॥ हेमावती, उमा, ब्रह्माणी।भण्डासुर कि हृदय विदारिणी॥सर्व विपति हर, सर्वाधारे।तुमने कुटिल कुपंथी तारे॥ चन्द्र- धारिणी, नैमिश्वासिनी।कृपा करो ललिते अधनाशिनी॥भक्त जनों को दरस दिखाओ।संशय भय सब शीघ्र मिटाओ॥ जो कोई पढ़े ललिता चालीसा।होवे सुख आनन्द अधीसा॥जिस पर कोई संकट आवे।पाठ करे संकट मिट जावे॥ ध्यान लगा पढ़े इक्कीस बारा।पूर्ण मनोरथ होवे सारा॥पुत्र-हीन संतति सुख पावे।निर्धन धनी बने गुण गावे॥ इस विधि पाठ करे जो कोई।दुःख बन्धन छूटे सुख होई॥जितेन्द्र चन्द्र भारतीय बतावें।पढ़ें चालीसा तो सुख पावें॥ सबसे लघु उपाय यह जानो।सिद्ध होय मन में जो ठानो॥ललिता करे हृदय में बासा।सिद्दि देत ललिता चालीसा॥ ॥ दोहा ॥ललिते माँ अब कृपा करो,सिद्ध करो सब काम।श्रद्धा से सिर नाय करे,करते तुम्हें प्रणाम॥

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