CHALISA

Bhagwan Shri Sheetalnath Ji Chalisa:चालीसा: भगवान श्री शीतलनाथ जी

Shri Sheetalnath Ji Chalisa:शीतलनाथ जी की चालीसा:विभिन्न संप्रदायों में भिन्न चालीसें: जैन धर्म के भीतर विभिन्न संप्रदाय हैं, और प्रत्येक संप्रदाय के अपने विशिष्ट स्तोत्र और चालीसें हो सकती हैं। Shri Sheetalnath Ji Chalisa:लोकप्रियता: सभी देवताओं के लिए समान रूप से प्रचलित चालीसें नहीं होतीं। लिखित स्रोतों की सीमित उपलब्धता: सभी चालीसें लिखित रूप में उपलब्ध नहीं होतीं, कई बार ये मौखिक परंपराओं के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी передаई जाती हैं। Shri Sheetalnath Ji Chalisa:हम कैसे आगे बढ़ सकते हैं? आपके पास चालीसे का कोई हिस्सा या भाव है जो आपको याद है? Shri Sheetalnath Ji Chalisa:अधिक विशिष्ट जानकारी आप किस संप्रदाय के अनुयायी हैं? आपको किस प्रकार की चालीसा चाहिए Shri Sheetalnath Ji Chalisa (भावनात्मक, ज्ञानवर्धक, या किसी विशेष उद्देश्य के लिए)? शीतलनाथ जी के बारे में सामान्य जानकारी शीतलनाथ जी जैन धर्म के तीर्थंकर हैं। उन्हें शांति और शीतलता के देवता माना जाता है। Shri Sheetalnath Ji Chalisa उनकी पूजा करने से मन को शांति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। Bhagwan Shri Sheetalnath Ji:चालीसा: भगवान श्री शीतलनाथ जी शीतल हैं शीतल वचन, चन्दन से अधिकाय।कल्प वृक्ष सम प्रभु चरण, हैं सबको सुखकाय॥ जय श्री शीतलनाथ गुणाकर, महिमा मंडित करुणासागर।भाद्दिलपुर के दृढरथ राय, भूप प्रजावत्सल कहलाये॥ रमणी रत्न सुनन्दा रानी, गर्भ आये श्री जिनवर ज्ञानी।द्वादशी माघ बदी को जन्मे, हर्ष लहर उठी त्रिभुवन में॥ उत्सव करते देव अनेक, मेरु पर करते अभिषेक।नाम दिया शिशु जिन को शीतल, भीष्म ज्वाल अध् होती शीतल॥ एक लक्ष पुर्वायु प्रभु की, नब्बे धनुष अवगाहना वपु की।वर्ण स्वर्ण सम उज्जवलपीत, दया धर्मं था उनका मीत॥ निरासक्त थे विषय भोगो में, रत रहते थे आत्म योग में।एक दिन गए भ्रमण को वन में, करे प्रकृति दर्शन उपवन में॥ लगे ओसकण मोती जैसे, लुप्त हुए सब सूर्योदय से।देख ह्रदय में हुआ वैराग्य, आत्म राग में छोड़ा राग॥ तप करने का निश्चय करते, ब्रह्मर्षि अनुमोदन करते।विराजे शुक्र प्रभा शिविका में, गए सहेतुक वन में जिनवर॥ संध्या समय ली दीक्षा अश्रुण, चार ज्ञान धारी हुए तत्क्षण।दो दिन का व्रत करके इष्ट, प्रथामाहार हुआ नगर अरिष्ट॥ दिया आहार पुनर्वसु नृप ने, पंचाश्चार्य किये देवों ने।किया तीन वर्ष तप घोर, शीतलता फैली चहु और॥ कृष्ण चतुर्दशी पौषविख्यता, केवलज्ञानी हुए जगात्ग्यता।रचना हुई तब समोशरण की, दिव्यदेशना खिरी प्रभु की॥ आतम हित का मार्ग बताया, शंकित चित्त समाधान कराया।तीन प्रकार आत्मा जानो, बहिरातम अन्तरातम मानो॥ निश्चय करके निज आतम का, चिंतन कर लो परमातम का।मोह महामद से मोहित जो, परमातम को नहीं माने वो॥ वे ही भव भव में भटकाते, वे ही बहिरातम कहलाते।पर पदार्थ से ममता तज के, परमातम में श्रद्धा कर के॥ जो नित आतम ध्यान लगाते, वे अंतर आतम कहलाते।गुण अनंत के धारी हे जो, कर्मो के परिहारी है जो॥ लोक शिखर के वासी है वे, परमातम अविनाशी है वे।जिनवाणी पर श्रद्धा धर के, पार उतारते भविजन भव से॥ श्री जिन के इक्यासी गणधर, एक लक्ष थे पूज्य मुनिवर।अंत समय में गए सम्म्मेदाचल, योग धार कर हो गए निश्चल॥ अश्विन शुक्ल अष्टमी आई, मुक्तिमहल पहुचे जिनराई।लक्षण प्रभु का कल्पवृक्ष था, त्याग सकल सुख वरा मोक्ष था॥ शीतल चरण शरण में आओ, कूट विद्युतवर शीश झुकाओ।शीतल जिन शीतल करें, सबके भव आतप।अरुणा के मन में बसे, हरे सकल संताप॥

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Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा

Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा: कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाले देवता Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा हिंदू धर्म में चित्रगुप्त देवता की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। चित्रगुप्त जी को सभी मनुष्यों के कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाला माना जाता है। वे यमराज के सचिव हैं Chitragupt Chalisa और मृत्यु के बाद हर व्यक्ति के कर्मों के आधार पर उसके स्वर्ग या नर्क जाने का निर्णय लेते हैं। Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा का महत्व Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा के प्रमुख बिंदु Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा कैसे गाएं? चित्रगुप्त चालीसा को श्रद्धा और भक्ति भाव से गाया जाना चाहिए। Chitragupt Chalisa आप किसी अनुभवी व्यक्ति से मार्गदर्शन ले सकते हैं या फिर ऑनलाइन उपलब्ध वीडियो और ऑडियो का सहारा ले सकते हैं। यहां कुछ टिप्स दिए गए हैं जो आपको चित्रगुप्त चालीसा गाते समय मदद कर सकते हैं: Chitragupt Chalisa:चित्रगुप्त चालीसा ॥ दोहा ॥सुमिर चित्रगुप्त ईश को, सतत नवाऊ शीश।ब्रह्मा विष्णु महेश सह, रिनिहा भए जगदीश॥करो कृपा करिवर वदन, जो सरशुती सहाय।चित्रगुप्त जस विमलयश, वंदन गुरूपद लाय॥ ॥ चौपाई ॥जय चित्रगुप्त ज्ञान रत्नाकर।जय यमेश दिगंत उजागर॥ अज सहाय अवतरेउ गुसांई।कीन्हेउ काज ब्रम्ह कीनाई॥ श्रृष्टि सृजनहित अजमन जांचा।भांति-भांति के जीवन राचा॥ अज की रचना मानव संदर।मानव मति अज होइ निरूत्तर॥ ४ ॥ भए प्रकट चित्रगुप्त सहाई।धर्माधर्म गुण ज्ञान कराई॥ राचेउ धरम धरम जग मांही।धर्म अवतार लेत तुम पांही॥ अहम विवेकइ तुमहि विधाता।निज सत्ता पा करहिं कुघाता॥ श्रष्टि संतुलन के तुम स्वामी।त्रय देवन कर शक्ति समानी॥ ८ ॥ पाप मृत्यु जग में तुम लाए।भयका भूत सकल जग छाए॥ महाकाल के तुम हो साक्षी।ब्रम्हउ मरन न जान मीनाक्षी॥ धर्म कृष्ण तुम जग उपजायो।कर्म क्षेत्र गुण ज्ञान करायो॥ राम धर्म हित जग पगु धारे।मानवगुण सदगुण अति प्यारे॥ १२ ॥ विष्णु चक्र पर तुमहि विराजें।पालन धर्म करम शुचि साजे॥ महादेव के तुम त्रय लोचन।प्रेरकशिव अस ताण्डव नर्तन॥ सावित्री पर कृपा निराली।विद्यानिधि माँ सब जग आली॥ रमा भाल पर कर अति दाया।श्रीनिधि अगम अकूत अगाया॥ २० ॥ ऊमा विच शक्ति शुचि राच्यो।जाकेबिन शिव शव जग बाच्यो॥ गुरू बृहस्पति सुर पति नाथा।जाके कर्म गहइ तव हाथा॥ रावण कंस सकल मतवारे।तव प्रताप सब सरग सिधारे॥ प्रथम् पूज्य गणपति महदेवा।सोउ करत तुम्हारी सेवा॥ २४ ॥ रिद्धि सिद्धि पाय द्वैनारी।विघ्न हरण शुभ काज संवारी॥ व्यास चहइ रच वेद पुराना।गणपति लिपिबध हितमन ठाना॥ पोथी मसि शुचि लेखनी दीन्हा।असवर देय जगत कृत कीन्हा॥ लेखनि मसि सह कागद कोरा।तव प्रताप अजु जगत मझोरा॥ २८ ॥ विद्या विनय पराक्रम भारी।तुम आधार जगत आभारी॥ द्वादस पूत जगत अस लाए।राशी चक्र आधार सुहाए॥ जस पूता तस राशि रचाना।ज्योतिष केतुम जनक महाना॥ तिथी लगन होरा दिग्दर्शन।चारि अष्ट चित्रांश सुदर्शन॥ ३२ ॥ राशी नखत जो जातक धारे।धरम करम फल तुमहि अधारे॥ राम कृष्ण गुरूवर गृह जाई।प्रथम गुरू महिमा गुण गाई॥ श्री गणेश तव बंदन कीना।कर्म अकर्म तुमहि आधीना॥ देववृत जप तप वृत कीन्हा।इच्छा मृत्यु परम वर दीन्हा॥ ३६ ॥ धर्महीन सौदास कुराजा।तप तुम्हार बैकुण्ठ विराजा॥ हरि पद दीन्ह धर्म हरि नामा।कायथ परिजन परम पितामा॥ शुर शुयशमा बन जामाता।क्षत्रिय विप्र सकल आदाता॥ जय जय चित्रगुप्त गुसांई।गुरूवर गुरू पद पाय सहाई॥ ४० ॥ जो शत पाठ करइ चालीसा।जन्ममरण दुःख कटइ कलेसा॥ विनय करैं कुलदीप शुवेशा।राख पिता सम नेह हमेशा॥ ॥ दोहा ॥ज्ञान कलम, मसि सरस्वती, अंबर है मसिपात्र।कालचक्र की पुस्तिका, सदा रखे दंडास्त्र॥पाप पुन्य लेखा करन, धार्यो चित्र स्वरूप।श्रृष्टिसंतुलन स्वामीसदा, सरग नरक कर भूप॥ ॥ इति श्री चित्रगुप्त चालीसा समाप्त॥

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Bhairav Chalisa:भैरव चालीसा

Bhairav Chalisa:भैरव चालीसा: भैरव बाबा की स्तुति Bhairav Chalisa:भैरव चालीसा हिंदू धर्म में भैरव बाबा की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। भैरव बाबा को शिव के क्रोध रूप के रूप में पूजा जाता है और उन्हें रक्षा और न्याय के देवता माना जाता है। Bhairav Chalisa भैरव चालीसा में भैरव बाबा के विभिन्न रूपों और उनकी शक्तियों का वर्णन किया गया है। Bhairav Chalisa:भैरव चालीसा का महत्व Bhairav Chalisa:भैरव चालीसा के प्रमुख बिंदु Bhairav Chalisa:भैरव चालीसा कैसे गाएं? Bhairav Chalisa:भैरव चालीसा को श्रद्धा और भक्ति भाव से गाया जाना चाहिए। आप किसी अनुभवी व्यक्ति से मार्गदर्शन ले सकते हैं या फिर ऑनलाइन उपलब्ध वीडियो और ऑडियो का सहारा ले सकते हैं। Bhairav Chalisa:भैरव चालीसा ॥ दोहा ॥श्री गणपति गुरु गौरी पदप्रेम सहित धरि माथ ।चालीसा वंदन करोश्री शिव भैरवनाथ ॥ श्री भैरव संकट हरणमंगल करण कृपाल ।श्याम वरण विकराल वपुलोचन लाल विशाल ॥ ॥ चौपाई ॥जय जय श्री काली के लाला ।जयति जयति काशी-कुतवाला ॥ जयति बटुक-भैरव भय हारी ।जयति काल-भैरव बलकारी ॥ जयति नाथ-भैरव विख्याता ।जयति सर्व-भैरव सुखदाता ॥ भैरव रूप कियो शिव धारण ।भव के भार उतारण कारण ॥ भैरव रव सुनि हवै भय दूरी ।सब विधि होय कामना पूरी ॥ शेष महेश आदि गुण गायो ।काशी-कोतवाल कहलायो ॥ जटा जूट शिर चंद्र विराजत ।बाला मुकुट बिजायठ साजत ॥ कटि करधनी घुंघरू बाजत ।दर्शन करत सकल भय भाजत ॥ जीवन दान दास को दीन्ह्यो ।कीन्ह्यो कृपा नाथ तब चीन्ह्यो ॥ वसि रसना बनि सारद-काली ।दीन्ह्यो वर राख्यो मम लाली ॥ धन्य धन्य भैरव भय भंजन ।जय मनरंजन खल दल भंजन ॥ कर त्रिशूल डमरू शुचि कोड़ा ।कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोडा ॥ जो भैरव निर्भय गुण गावत ।अष्टसिद्धि नव निधि फल पावत ॥ रूप विशाल कठिन दुख मोचन ।क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन ॥ अगणित भूत प्रेत संग डोलत ।बम बम बम शिव बम बम बोलत ॥ रुद्रकाय काली के लाला ।महा कालहू के हो काला ॥ बटुक नाथ हो काल गंभीरा ।श्‍वेत रक्त अरु श्याम शरीरा ॥ करत नीनहूं रूप प्रकाशा ।भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा ॥ रत्‍न जड़ित कंचन सिंहासन ।व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन ॥ तुमहि जाइ काशिहिं जन ध्यावहिं ।विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं ॥ जय प्रभु संहारक सुनन्द जय ।जय उन्नत हर उमा नन्द जय ॥ भीम त्रिलोचन स्वान साथ जय ।वैजनाथ श्री जगतनाथ जय ॥ महा भीम भीषण शरीर जय ।रुद्र त्रयम्बक धीर वीर जय ॥ अश्‍वनाथ जय प्रेतनाथ जय ।स्वानारुढ़ सयचंद्र नाथ जय ॥ निमिष दिगंबर चक्रनाथ जय ।गहत अनाथन नाथ हाथ जय ॥ त्रेशलेश भूतेश चंद्र जय ।क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय ॥ श्री वामन नकुलेश चण्ड जय ।कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय ॥ रुद्र बटुक क्रोधेश कालधर ।चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर ॥ करि मद पान शम्भु गुणगावत ।चौंसठ योगिन संग नचावत ॥ करत कृपा जन पर बहु ढंगा ।काशी कोतवाल अड़बंगा ॥ देयं काल भैरव जब सोटा ।नसै पाप मोटा से मोटा ॥ जनकर निर्मल होय शरीरा ।मिटै सकल संकट भव पीरा ॥ श्री भैरव भूतों के राजा ।बाधा हरत करत शुभ काजा ॥ ऐलादी के दुख निवारयो ।सदा कृपाकरि काज सम्हारयो ॥ सुन्दर दास सहित अनुरागा ।श्री दुर्वासा निकट प्रयागा ॥ श्री भैरव जी की जय लेख्यो ।सकल कामना पूरण देख्यो ॥ ॥ दोहा ॥जय जय जय भैरव बटुक स्वामी संकट टार ।कृपा दास पर कीजिए शंकर के अवतार ॥

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Kaila Devi Chalisa:कैला देवी चालीसा

Kaila Devi Chalisa:कैला देवी चालीसा: एक विस्तृत विश्लेषण Kaila Devi Chalisa:कैला देवी चालीसा हिंदू धर्म में माता कैला देवी की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। यह चालीसा देवी के विभिन्न रूपों और उनकी शक्तियों का वर्णन करता है। Kaila Devi Chalisa माता कैला देवी को शक्ति की देवी माना जाता है और उनसे भक्त विभिन्न प्रकार की मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। Kaila Devi Chalisa:कैला देवी चालीसा का महत्व Kaila Devi Chalisa:कैला देवी चालीसा के प्रमुख बिंदु यहां कुछ टिप्स दिए गए हैं जो आपको कैला देवी चालीसा गाते समय मदद कर सकते हैं: Kaila Devi Chalisa:कैला देवी चालीसा नवदुर्गा, नवरात्रि, नवरात्रे, नवरात्रि, माता की चौकी, देवी जागरण, Kaila Devi Chalisa जगराता, शुक्रवार दुर्गा तथा अष्टमी के शुभ अवसर पर श्री कैला देवी मंदिर करौली में गाये जाने वाला श्री कैला मैया का प्रसिद्ध चालीसा। ॥ दोहा ॥जय जय कैला मात हेतुम्हे नमाउ माथ ॥शरण पडूं में चरण मेंजोडूं दोनों हाथ ॥ आप जानी जान होमैं माता अंजान ॥क्षमा भूल मेरी करोकरूँ तेरा गुणगान ॥ ॥ चौपाई ॥जय जय जय कैला महारानी ।नमो नमो जगदम्ब भवानी ॥ सब जग की हो भाग्य विधाता ।आदि शक्ति तू सबकी माता ॥ दोनों बहिना सबसे न्यारी ।महिमा अपरम्पार तुम्हारी ॥ शोभा सदन सकल गुणखानी ।वैद पुराणन माँही बखानी ॥4॥ जय हो मात करौली वाली ।शत प्रणाम कालीसिल वाली ॥ ज्वालाजी में ज्योति तुम्हारी ।हिंगलाज में तू महतारी ॥ तू ही नई सैमरी वाली ।तू चामुंडा तू कंकाली ॥ नगर कोट में तू ही विराजे ।विंध्यांचल में तू ही राजै ॥8॥ धौलागढ़ बेलौन तू माता ।वैष्णवदेवी जग विख्याता ॥ नव दुर्गा तू मात भवानी ।चामुंडा मंशा कल्याणी ॥ जय जय सूये चोले वाली ।जय काली कलकत्ते वाली ॥ तू ही लक्ष्मी तू ही ब्रम्हाणी ।पार्वती तू ही इन्द्राणी ॥12॥ सरस्वती तू विद्या दाता ।तू ही है संतोषी माता ॥ अन्नपुर्णा तू जग पालक ।मात पिता तू ही हम बालक ॥ तू राधा तू सावित्री ।तारा मतंग्डिंग गायत्री ॥ तू ही आदि सुंदरी अम्बा ।मात चर्चिका हे जगदम्बा ॥16॥ एक हाथ में खप्पर राजै ।दूजे हाथ त्रिशूल विराजै ॥ कालीसिल पै दानव मारे ।राजा नल के कारज सारे ॥ शुम्भ निशुम्भ नसावनि हारी ।महिषासुर को मारनवारी ॥ रक्तबीज रण बीच पछारो ।शंखासुर तैने संहारो ॥20॥ ऊँचे नीचे पर्वत वारी ।करती माता सिंह सवारी ॥ ध्वजा तेरी ऊपर फहरावे ।तीन लोक में यश फैलावे ॥ अष्ट प्रहर माँ नौबत बाजै ।चाँदी के चौतरा विराजै ॥ लांगुर घटूअन चलै भवन में ।मात राज तेरौ त्रिभुवन में ॥24॥ घनन घनन घन घंटा बाजत ।ब्रह्मा विष्णु देव सब ध्यावत ॥ अगनित दीप जले मंदिर में ।ज्योति जले तेरी घर-घर में ॥ चौसठ जोगिन आंगन नाचत ।बामन भैरों अस्तुति गावत ॥ देव दनुज गन्धर्व व किन्नर ।भूत पिशाच नाग नारी नर ॥28॥ सब मिल माता तोय मनावे ।रात दिन तेरे गुण गावे ॥ जो तेरा बोले जयकारा ।होय मात उसका निस्तारा ॥ मना मनौती आकर घर सै ।जात लगा जो तोंकू परसै ॥ ध्वजा नारियल भेंट चढ़ावे ।गुंगर लौंग सो ज्योति जलावै ॥32॥ हलुआ पूरी भोग लगावै ।रोली मेहंदी फूल चढ़ावे ॥ जो लांगुरिया गोद खिलावै ।धन बल विद्या बुद्धि पावै ॥ जो माँ को जागरण करावै ।चाँदी को सिर छत्र धरावै ॥ जीवन भर सारे सुख पावै ।यश गौरव दुनिया में छावै ॥36॥ जो भभूत मस्तक पै लगावे ।भूत-प्रेत न वाय सतावै ॥ जो कैला चालीसा पढ़ता।नित्य नियम से इसे सुमरता ॥ मन वांछित वह फल को पाता ।दुःख दारिद्र नष्ट हो जाता ॥ गोविन्द शिशु है शरण तुम्हारी ।रक्षा कर कैला महतारी ॥40॥ ॥ दोहा ॥संवत तत्व गुण नभ भुज सुन्दर रविवार ।पौष सुदी दौज शुभ पूर्ण भयो यह कार ॥॥ इति कैला देवी चालीसा समाप्त ॥

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Shri Rani Sati Dadi Ji Chalisa:श्री राणी सती दादी चालीसा

Rani Sati Dadi Ji Chalisa:श्री राणी सती दादी चालीसा Rani Sati Dadi Ji Chalisa:श्री राणी सती दादी चालीसा एक धार्मिक स्तुति है जो हिंदू धर्म में विशेषकर राजस्थान के क्षेत्र में काफी लोकप्रिय है। यह चालीसा श्री राणी सती दादी, जिन्हें नारायणी देवी भी कहा जाता है, की स्तुति में लिखी गई है। Rani Sati Dadi Ji Chalisa माना जाता है कि श्री राणी सती दादी महाभारत काल में उत्तरा थीं और उन्हें भगवान श्री कृष्ण ने वरदान दिया था कि कलयुग में वे नारायाणी के नाम से श्री सती दादी के रूप में विख्यात होंगी। Rani Sati Dadi Ji Chalisa:चालीसा का महत्व Rani Sati Dadi Ji Chalisa:चालीसा में क्या होता है? श्री राणी सती दादी चालीसा में दादी जी के जीवन, उनके कार्यों और उनके महत्व के बारे में वर्णन किया जाता है। इसमें उनके गुणों, कृपा और चमत्कारों का वर्णन भी होता है। भक्त इस चालीसा का पाठ करते हुए दादी जी से अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की प्रार्थना करते हैं। Rani Sati Dadi Ji Chalisa:चालीसा का पाठ कैसे करें? Shri Rani Sati Dadi Ji:श्री राणी सती दादी ॥ दोहा ॥श्री गुरु पद पंकज नमन,दुषित भाव सुधार,राणी सती सू विमल यश,बरणौ मति अनुसार,काम क्रोध मद लोभ मै,भरम रह्यो संसार,शरण गहि करूणामई,सुख सम्पति संसार॥ ॥ चौपाई ॥नमो नमो श्री सती भवानी।जग विख्यात सभी मन मानी ॥ नमो नमो संकट कू हरनी।मनवांछित पूरण सब करनी ॥ नमो नमो जय जय जगदंबा।भक्तन काज न होय विलंबा ॥ नमो नमो जय जय जगतारिणी।सेवक जन के काज सुधारिणी ॥4 दिव्य रूप सिर चूनर सोहे ।जगमगात कुन्डल मन मोहे ॥ मांग सिंदूर सुकाजर टीकी ।गजमुक्ता नथ सुंदर नीकी ॥ गल वैजंती माल विराजे ।सोलहूं साज बदन पे साजे ॥ धन्य भाग गुरसामलजी को ।महम डोकवा जन्म सती को ॥8 तनधनदास पति वर पाये ।आनंद मंगल होत सवाये ॥ जालीराम पुत्र वधु होके ।वंश पवित्र किया कुल दोके ॥ पति देव रण मॉय जुझारे ।सति रूप हो शत्रु संहारे ॥ पति संग ले सद् गती पाई ।सुर मन हर्ष सुमन बरसाई ॥12 धन्य भाग उस राणा जी को ।सुफल हुवा कर दरस सती का ॥ विक्रम तेरह सौ बावन कूं ।मंगसिर बदी नौमी मंगल कूं ॥ नगर झून्झूनू प्रगटी माता ।जग विख्यात सुमंगल दाता ॥ दूर देश के यात्री आवै ।धुप दिप नैवैध्य चढावे ॥16 उछाङ उछाङते है आनंद से ।पूजा तन मन धन श्रीफल से ॥ जात जङूला रात जगावे ।बांसल गोत्री सभी मनावे ॥ पूजन पाठ पठन द्विज करते ।वेद ध्वनि मुख से उच्चरते ॥ नाना भाँति भाँति पकवाना ।विप्र जनो को न्यूत जिमाना ॥20 श्रद्धा भक्ति सहित हरसाते ।सेवक मनवांछित फल पाते ॥ जय जय कार करे नर नारी ।श्री राणी सतीजी की बलिहारी ॥ द्वार कोट नित नौबत बाजे ।होत सिंगार साज अति साजे ॥ रत्न सिंघासन झलके नीको ।पलपल छिनछिन ध्यान सती को ॥24 भाद्र कृष्ण मावस दिन लीला ।भरता मेला रंग रंगीला ॥ भक्त सूजन की सकल भीङ है ।दरशन के हित नही छीङ है ॥ अटल भुवन मे ज्योति तिहारी ।तेज पूंज जग मग उजियारी ॥ आदि शक्ति मे मिली ज्योति है ।देश देश मे भवन भौति है ॥28 नाना विधी से पूजा करते ।निश दिन ध्यान तिहारो धरते ॥ कष्ट निवारिणी दुख: नासिनी ।करूणामयी झुन्झुनू वासिनी ॥ प्रथम सती नारायणी नामा ।द्वादश और हुई इस धामा ॥ तिहूं लोक मे कीरति छाई ।राणी सतीजी की फिरी दुहाई ॥32 सुबह शाम आरती उतारे ।नौबत घंटा ध्वनि टंकारे ॥ राग छत्तीसों बाजा बाजे ।तेरहु मंड सुन्दर अति साजे ॥ त्राहि त्राहि मै शरण आपकी ।पुरी मन की आस दास की ॥ मुझको एक भरोसो तेरो ।आन सुधारो मैया कारज मेरो ॥36 पूजा जप तप नेम न जानू ।निर्मल महिमा नित्य बखानू ॥ भक्तन की आपत्ति हर लिनी ।पुत्र पौत्र सम्पत्ति वर दीनी ॥ 40 पढे चालीसा जो शतबारा ।होय सिद्ध मन माहि विचारा ॥ टिबरिया ली शरण तिहारी।क्षमा करो सब चूक हमारी ॥ ॥ दोहा ॥दुख आपद विपदा हरण,जन जीवन आधार ।बिगङी बात सुधारियो,सब अपराध बिसार ॥॥ मात श्री राणी सतीजी की जय ॥

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Shri Jhulelal Chalisa:श्री झूलेलाल चालीसा

Shri Jhulelal Chalisa:श्री झूलेलाल चालीसा: सिंधी समुदाय का आराध्य देवता Shri Jhulelal Chalisa:श्री झूलेलाल चालीसा सिंधी समुदाय के आराध्य देवता श्री झूलेलाल की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। श्री झूलेलाल को वरुण देव का अवतार माना जाता है Shri Jhulelal Chalisa और उन्हें संकटमोचन के रूप में पूजा जाता है। Shri Jhulelal Chalisa:श्री झूलेलाल चालीसा का महत्व Shri Jhulelal Chalisa:श्री झूलेलाल चालीसा का अर्थ श्री झूलेलाल चालीसा में श्री झूलेलाल के विभिन्न रूपों और उनके महान कार्यों का वर्णन किया गया है। इसमें भक्त श्री झूलेलाल से सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और मोक्ष की प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं। Shri Jhulelal Chalisa:श्री झूलेलाल चालीसा का जाप श्री झूलेलाल चालीसा का जाप सुबह या शाम के समय किया जा सकता है। इसे एकाग्रचित होकर और मन में श्री झूलेलाल की छवि लेकर जाप करना चाहिए। Shri Jhulelal Chalisa:श्री झूलेलाल चालीसा ॥ दोहा ॥जय जय जल देवता,जय ज्योति स्वरूप ।अमर उडेरो लाल जय,झुलेलाल अनूप ॥ ॥ चौपाई ॥रतनलाल रतनाणी नंदन ।जयति देवकी सुत जग वंदन ॥ दरियाशाह वरुण अवतारी ।जय जय लाल साईं सुखकारी ॥ जय जय होय धर्म की भीरा ।जिन्दा पीर हरे जन पीरा ॥ संवत दस सौ सात मंझरा ।चैत्र शुक्ल द्वितिया भगऊ वारा ॥4॥ ग्राम नसरपुर सिंध प्रदेशा ।प्रभु अवतरे हरे जन कलेशा ॥ सिन्धु वीर ठट्ठा राजधानी ।मिरखशाह नऊप अति अभिमानी ॥ कपटी कुटिल क्रूर कूविचारी ।यवन मलिन मन अत्याचारी ॥ धर्मान्तरण करे सब केरा ।दुखी हुए जन कष्ट घनेरा ॥8॥ पिटवाया हाकिम ढिंढोरा ।हो इस्लाम धर्म चाहुँओरा ॥ सिन्धी प्रजा बहुत घबराई ।इष्ट देव को टेर लगाई ॥ वरुण देव पूजे बहुंभाती ।बिन जल अन्न गए दिन राती ॥ सिन्धी तीर सब दिन चालीसा ।घर घर ध्यान लगाये ईशा ॥12॥ गरज उठा नद सिन्धु सहसा ।चारो और उठा नव हरषा ॥ वरुणदेव ने सुनी पुकारा ।प्रकटे वरुण मीन असवारा ॥ दिव्य पुरुष जल ब्रह्मा स्वरुपा ।कर पुष्तक नवरूप अनूपा ॥ हर्षित हुए सकल नर नारी ।वरुणदेव की महिमा न्यारी ॥16॥ जय जय कार उठी चाहुँओरा ।गई रात आने को भौंरा ॥ मिरखशाह नऊप अत्याचारी ।नष्ट करूँगा शक्ति सारी ॥ दूर अधर्म, हरण भू भारा ।शीघ्र नसरपुर में अवतारा ॥ रतनराय रातनाणी आँगन ।खेलूँगा, आऊँगा शिशु बन ॥20॥ रतनराय घर ख़ुशी आई ।झुलेलाल अवतारे सब देय बधाई ॥ घर घर मंगल गीत सुहाए ।झुलेलाल हरन दुःख आए ॥ मिरखशाह तक चर्चा आई ।भेजा मंत्री क्रोध अधिकाई ॥ मंत्री ने जब बाल निहारा ।धीरज गया हृदय का सारा ॥24॥ देखि मंत्री साईं की लीला ।अधिक विचित्र विमोहन शीला ॥ बालक धीखा युवा सेनानी ।देखा मंत्री बुद्धि चाकरानी ॥ योद्धा रूप दिखे भगवाना ।मंत्री हुआ विगत अभिमाना ॥ झुलेलाल दिया आदेशा ।जा तव नऊपति कहो संदेशा ॥28॥ मिरखशाह नऊप तजे गुमाना ।हिन्दू मुस्लिम एक समाना ॥ बंद करो नित्य अत्याचारा ।त्यागो धर्मान्तरण विचारा ॥ लेकिन मिरखशाह अभिमानी ।वरुणदेव की बात न मानी ॥ एक दिवस हो अश्व सवारा ।झुलेलाल गए दरबारा ॥32॥ मिरखशाह नऊप ने आज्ञा दी ।झुलेलाल बनाओ बन्दी ॥ किया स्वरुप वरुण का धारण ।चारो और हुआ जल प्लावन ॥ दरबारी डूबे उतराये ।नऊप के होश ठिकाने आये ॥ नऊप तब पड़ा चरण में आई ।जय जय धन्य जय साईं ॥36॥ वापिस लिया नऊपति आदेशा ।दूर दूर सब जन क्लेशा ॥ संवत दस सौ बीस मंझारी ।भाद्र शुक्ल चौदस शुभकारी ॥ भक्तो की हर आधी व्याधि ।जल में ली जलदेव समाधि ॥ जो जन धरे आज भी ध्याना ।उनका वरुण करे कल्याणा ॥40॥ ॥ दोहा ॥चालीसा चालीस दिन पाठ करे जो कोय ।पावे मनवांछित फल अरु जीवन सुखमय होय ॥॥ ॐ श्री वरुणाय नमः ॥

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Ath Chaurasi Siddh Chalisa:अथ चौरासी सिद्ध चालीसा – गोरखनाथ मठ

Ath Chaurasi Siddh Chalisa:अथ चौरासी सिद्ध चालीसा: गोरखनाथ मठ की शक्तिशाली स्तुति Ath Chaurasi Siddh Chalisa:अथ चौरासी सिद्ध चालीसा एक अत्यंत प्रभावशाली और पवित्र स्तुति है जो गोरखनाथ मठ से जुड़ी हुई है। इस चालीसा में 84 सिद्धों की महिमा का वर्णन किया गया है Ath Chaurasi Siddh Chalisa और माना जाता है कि इसका नियमित जाप करने से कई तरह के लाभ मिलते हैं। Ath Chaurasi Siddh Chalisa:चौरासी सिद्ध कौन हैं? चौरासी सिद्ध योगी और सिद्ध पुरुष थे जिन्होंने अपने तपस्या और योग साधना के बल पर सिद्धि प्राप्त की थी।Ath Chaurasi Siddh Chalisa इन सिद्धों को भगवान शिव के परम भक्त माना जाता है और इन्हें अनेक चमत्कारी शक्तियां प्राप्त थीं। Ath Chaurasi Siddh Chalisa:अथ चौरासी सिद्ध चालीसा का महत्व Ath Chaurasi Siddh Chalisa:अथ चौरासी सिद्ध चालीसा का जाप अथ चौरासी सिद्ध चालीसा का जाप सुबह या शाम के समय किया जा सकता है। Ath Chaurasi Siddh Chalisa इसे एकाग्रचित होकर और मन में चौरासी सिद्धों की छवि लेकर जाप करना चाहिए। Ath Chaurasi Siddh Chalisa:गोरखनाथ मठ का महत्व गोरखनाथ मठ नाथ सम्प्रदाय का एक प्रमुख मठ है। इस मठ को गुरु गोरखनाथ ने स्थापित किया था। Ath Chaurasi Siddh Chalisa यह मठ योग, तंत्र और अध्यात्म के केंद्र के रूप में जाना जाता है। निष्कर्ष अथ चौरासी सिद्ध चालीसा एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र स्तुति है। इसका नियमित जाप करने से भक्तों को कई तरह के लाभ मिलते हैं। यदि आप आध्यात्मिक विकास करना चाहते हैं या जीवन में आ रही समस्याओं से छुटकारा पाना चाहते हैं, तो आप अथ चौरासी सिद्ध चालीसा का जाप कर सकते हैं। Ath Chaurasi Siddh Chalisa:अथ चौरासी सिद्ध चालीसा – गोरखनाथ मठ दोहा –श्री गुरु गणनायक सिमर,शारदा का आधार । कहूँ सुयश श्रीनाथ का,निज मति के अनुसार । श्री गुरु गोरक्षनाथ के चरणों में आदेश ।जिनके योग प्रताप को ,जाने सकल नरेश । चौपाईजय श्रीनाथ निरंजन स्वामी,घट घट के तुम अन्तर्यामी । दीन दयालु दया के सागर,सप्तद्वीप नवखण्ड उजागर । आदि पुरुष अद्वैत निरंजन,निर्विकल्प निर्भय दुःख भंजन । अजर अमर अविचल अविनाशी,ऋद्धि सिद्धि चरणों की दासी । बाल यती ज्ञानी सुखकारी,श्री गुरुनाथ परम हितकारी । रूप अनेक जगत में धारे,भगत जनों के संकट टारे । सुमिरण चौरंगी जब कीन्हा,हुये प्रसन्न अमर पद दीन्हा । सिद्धों के सिरताज मनावो,नव नाथों के नाथ कहावो । जिनका नाम लिये भव जाल,आवागमन मिटे तत्काल । आदि नाथ मत्स्येन्द्र पीर,घोरम नाथ धुन्धली वीर । कपिल मुनि चर्पट कण्डेरी,नीम नाथ पारस चंगेरी । परशुराम जमदग्नी नन्दन,रावण मार राम रघुनन्दन । कंसादिक असुरन दलहारी,वासुदेव अर्जुन धनुधारी । अचलेश्वर लक्ष्मण बल बीर,बलदाई हलधर यदुवीर । सारंग नाथ पीर सरसाई,तुङ़्गनाथ बद्री बलदाई । भूतनाथ धारीपा गोरा,बटुकनाथ भैरो बल जोरा । वामदेव गौतम गंगाई,गंगनाथ घोरी समझाई । रतन नाथ रण जीतन हारा,यवन जीत काबुल कन्धारा । नाग नाथ नाहर रमताई,बनखंडी सागर नन्दाई । बंकनाथ कंथड़ सिद्ध रावल,कानीपा निरीपा चन्द्रावल । गोपीचन्द भर्तृहरी भूप,साधे योग लखे निज रूप । खेचर भूचर बाल गुन्दाई,धर्म नाथ कपली कनकाई । सिद्धनाथ सोमेश्वर चण्डी,भुसकाई सुन्दर बहुदण्डी । अजयपाल शुकदेव व्यास,नासकेतु नारद सुख रास । सनत्कुमार भरत नहीं निंद्रा,सनकादिक शारद सुर इन्द्रा । भंवरनाथ आदि सिद्ध बाला,ज्यवन नाथ माणिक मतवाला । सिद्ध गरीब चंचल चन्दराई,नीमनाथ आगर अमराई । त्रिपुरारी त्र्यम्बक दुःख भंजन,मंजुनाथ सेवक मन रंजन । भावनाथ भरम भयहारी,उदयनाथ मंगल सुखकारी । सिद्ध जालन्धर मूंगी पावे,जाकी गति मति लखी न जावे । ओघड़देव कुबेर भण्डारी,सहजई सिद्धनाथ केदारी । कोटि अनन्त योगेश्वर राजा,छोड़े भोग योग के काजा । योग युक्ति करके भरपूर,मोह माया से हो गये दूर । योग युक्ति कर कुन्ती माई,पैदा किये पांचों बलदाई । धर्म अवतार युधिष्ठिर देवा,अर्जुन भीम नकुल सहदेवा । योग युक्ति पार्थ हिय धारा,दुर्योधन दल सहित संहारा । योग युक्ति पंचाली जानी,दुःशासन से यह प्रण ठानी । पावूं रक्त न जब लग तेरा,खुला रहे यह सीस मेरा । योग युक्ति सीता उद्धारी,दशकन्धर से गिरा उच्चारी । पापी तेरा वंश मिटाऊं,स्वर्ण लङ़्क विध्वंस कराऊँ । श्री रामचन्द्र को यश दिलाऊँ,तो मैं सीता सती कहाऊँं । योग युक्ति अनुसूया कीनों,त्रिभुवन नाथ साथ रस भीनों । देवदत्त अवधूत निरंजन,प्रगट भये आप जग वन्दन । योग युक्ति मैनावती कीन्ही,उत्तम गति पुत्र को दीनी । योग युक्ति की बंछल मातू,गूंगा जाने जगत विख्यातू । योग युक्ति मीरा ने पाई,गढ़ चित्तौड़ में फिरी दुहाई । योग युक्ति अहिल्या जानी,तीन लोक में चली कहानी । सावित्री सरसुती भवानी,पारबती शङ़्कर सनमानी । सिंह भवानी मनसा माई,भद्र कालिका सहजा बाई । कामरू देश कामाक्षा योगन,दक्षिण में तुलजा रस भोगन । उत्तर देश शारदा रानी,पूरब में पाटन जग मानी । पश्चिम में हिंगलाज विराजे,भैरव नाद शंखध्वनि बाजे । नव कोटिक दुर्गा महारानी,रूप अनेक वेद नहिं जानी । काल रूप धर दैत्य संहारे,रक्त बीज रण खेत पछारे । मैं योगन जग उत्पति करती,पालन करती संहृति करती । जती सती की रक्षा करनी,मार दुष्ट दल खप्पर भरनी । मैं श्रीनाथ निरंजन दासी,जिनको ध्यावे सिद्ध चौरासी । योग युक्ति विरचे ब्रह्मण्डा,योग युक्ति थापे नवखण्डा । योग युक्ति तप तपें महेशा,योग युक्ति धर धरे हैं शेषा । योग युक्ति विष्णू तन धारे,योग युक्ति असुरन दल मारे । योग युक्ति गजआनन जाने,आदि देव तिरलोकी माने । योग युक्ति करके बलवान,योग युक्ति करके बुद्धिमान । योग युक्ति कर पावे राज,योग युक्ति कर सुधरे काज । योग युक्ति योगीश्वर जाने,जनकादिक सनकादिक माने । योग युक्ति मुक्ती का द्वारा,योग युक्ति बिन नहिं निस्तारा । योग युक्ति जाके मन भावे,ताकी महिमा कही न जावे । जो नर पढ़े सिद्ध चालीसा,आदर करें देव तेंतीसा । साधक पाठ पढ़े नित जोई,मनोकामना पूरण होई । धूप दीप नैवेद्य मिठाई,रोट लंगोट को भोग लगाई । दोहा –रतन अमोलक जगत में,योग युक्ति है मीत । नर से नारायण बने,अटल योग की रीत । योग विहंगम पंथ को,आदि नाथ शिव कीन्ह । शिष्य प्रशिष्य परम्परा,सब मानव को दीन्ह । प्रातः काल स्नान कर,सिद्ध चालीसा ज्ञान ।

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Khatu Shyam Chalisa Khatu Dham Sikar:खाटू श्याम चालीसा, खाटू धाम सीकर

Khatu Shyam:भक्तों के बीच अनेक खाटू चालीसा प्रसिद्ध हैं, इनमे से सीकर के खाटू श्याम मंदिर में गाए जाने वाला श्री श्याम चालीसा प्रमुख है। खाटू श्याम चालीसा के लिरिक्स नीचे पढ़े जा सकते हैं। Khatu Shyam:खाटू श्याम चालीसा: भक्ति और आस्था का प्रतीक Khatu Shyam:खाटू श्याम चालीसा हिंदू धर्म में भगवान श्याम के प्रति भक्ति और श्रद्धा का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। यह चालीसा विशेष रूप से राजस्थान के खाटू श्याम जी के मंदिर से जुड़ी हुई है। भगवान श्याम को कृष्ण का अवतार माना जाता है और उन्हें युवा, आकर्षक और करुणामय देवता के रूप में पूजा जाता है। Khatu Shyam:खाटू श्याम चालीसा का महत्व खाटू श्याम चालीसा का जाप भक्तों के जीवन में कई तरह के लाभकारी प्रभाव डालता है।Khatu Shyam माना जाता है कि इसका नियमित जाप करने से: Khatu Shyam:खाटू श्याम चालीसा का अर्थ खाटू श्याम चालीसा में भगवान श्याम के विभिन्न रूपों और लीलाओं का वर्णन किया गया है। भक्त भगवान श्याम से अपनी समस्याओं का समाधान और आशीर्वाद मांगते हैं। Khatu Shyam:खाटू श्याम जी का मंदिर खाटू श्याम जी का मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में स्थित है। यह मंदिर भगवान श्याम को समर्पित है और देश भर से लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। Khatu Shyam:खाटू श्याम चालीसा का जाप खाटू श्याम चालीसा का जाप सुबह या शाम के समय किया जा सकता है। इसे एकाग्रचित होकर और मन में भगवान श्याम की छवि लेकर जाप करना चाहिए। निष्कर्ष खाटू श्याम चालीसा भगवान श्याम के भक्तों के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है। इसका नियमित जाप करने से मन शांत होता है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। Khatu Shyam Chalisa Khatu Dham Sikar:खाटू श्याम चालीसा, खाटू धाम सीकर ॥ दोहा॥श्री गुरु पदरज शीशधर प्रथम सुमिरू गणेश ॥ध्यान शारदा ह्रदयधर भजुँ भवानी महेश ॥ चरण शरण विप्लव पड़े हनुमत हरे कलेश ।श्याम चालीसा भजत हुँ जयति खाटू नरेश ॥ ॥ चौपाई ॥वन्दहुँ श्याम प्रभु दुःख भंजन ।विपत विमोचन कष्ट निकंदन ॥ सांवल रूप मदन छविहारी ।केशर तिलक भाल दुतिकारी ॥ मौर मुकुट केसरिया बागा ।गल वैजयंति चित अनुरागा ॥ नील अश्व मौरछडी प्यारी ।करतल त्रय बाण दुःख हारी ॥4 सूर्यवर्च वैष्णव अवतारे ।सुर मुनि नर जन जयति पुकारे ॥ पिता घटोत्कच मोर्वी माता ।पाण्डव वंशदीप सुखदाता ॥ बर्बर केश स्वरूप अनूपा ।बर्बरीक अतुलित बल भूपा ॥ कृष्ण तुम्हे सुह्रदय पुकारे ।नारद मुनि मुदित हो निहारे ॥8 मौर्वे पूछत कर अभिवन्दन ।जीवन लक्ष्य कहो यदुनन्दन ॥ गुप्त क्षेत्र देवी अराधना ।दुष्ट दमन कर साधु साधना ॥ बर्बरीक बाल ब्रह्मचारी ।कृष्ण वचन हर्ष शिरोधारी ॥ तप कर सिद्ध देवियाँ कीन्हा ।प्रबल तेज अथाह बल लीन्हा ॥12 यज्ञ करे विजय विप्र सुजाना ।रक्षा बर्बरीक करे प्राना ॥ नव कोटि दैत्य पलाशि मारे ।नागलोक वासुकि भय हारे ॥ सिद्ध हुआ चँडी अनुष्ठाना ।बर्बरीक बलनिधि जग जाना ॥ वीर मोर्वेय निजबल परखन ।चले महाभारत रण देखन ॥16 माँगत वचन माँ मोर्वि अम्बा ।पराजित प्रति पाद अवलम्बा ॥ आगे मिले माधव मुरारे ।पूछे वीर क्युँ समर पधारे ॥ रण देखन अभिलाषा भारी ।हारे का सदैव हितकारी ॥ तीर एक तीहुँ लोक हिलाये ।बल परख श्री कृष्ण सँकुचाये ॥20 यदुपति ने माया से जाना ।पार अपार वीर को पाना ॥ धर्म युद्ध की देत दुहाई ।माँगत शीश दान यदुराई ॥ मनसा होगी पूर्ण तिहारी ।रण देखोगे कहे मुरारी ॥ शीश दान बर्बरीक दीन्हा ।अमृत बर्षा सुरग मुनि कीन्हा ॥24 देवी शीश अमृत से सींचत ।केशव धरे शिखर जहँ पर्वत ॥ जब तक नभ मण्डल मे तारे ।सुर मुनि जन पूजेंगे सारे ॥ दिव्य शीश मुद मंगल मूला ।भक्तन हेतु सदा अनुकूला ॥ रण विजयी पाण्डव गर्वाये ।बर्बरीक तब न्याय सुनाये ॥28 सर काटे था चक्र सुदर्शन ।रणचण्डी करती लहू भक्षन ॥ न्याय सुनत हर्षित जन सारे ।जग में गूँजे जय जयकारे ॥ श्याम नाम घनश्याम दीन्हा ।अजर अमर अविनाशी कीन्हा ॥ जन हित प्रकटे खाटू धामा ।लख दाता दानी प्रभु श्यामा ॥32 खाटू धाम मौक्ष का द्वारा ।श्याम कुण्ड बहे अमृत धारा ॥ शुदी द्वादशी फाल्गुण मेला ।खाटू धाम सजे अलबेला ॥ एकादशी व्रत ज्योत द्वादशी ।सबल काय परलोक सुधरशी ॥ खीर चूरमा भोग लगत हैं ।दुःख दरिद्र कलेश कटत हैं ॥36 श्याम बहादुर सांवल ध्याये ।आलु सिँह ह्रदय श्याम बसाये ॥ मोहन मनोज विप्लव भाँखे ।श्याम धणी म्हारी पत राखे ॥ नित प्रति जो चालीसा गावे ।सकल साध सुख वैभव पावे ॥ श्याम नाम सम सुख जग नाहीं ।भव भय बन्ध कटत पल माहीं ॥40 ॥ दोहा॥त्रिबाण दे त्रिदोष मुक्ति दर्श दे आत्म ज्ञान ।चालीसा दे प्रभु भुक्ति सुमिरण दे कल्यान ॥ खाटू नगरी धन्य हैं श्याम नाम जयगान ।अगम अगोचर श्याम हैं विरदहिं स्कन्द पुरान ॥

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Kuber Chalisa:कुबेर चालीसा

Kuber Chalisa:कुबेर चालीसा: धन के देवता की स्तुति Kuber Chalisa:कुबेर चालीसा हिंदू धर्म में धन के देवता कुबेर की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। कुबेर को धन का देवता माना जाता है और उनका आशीर्वाद धन-दौलत और समृद्धि लाने वाला माना जाता है। Kuber Chalisa:कुबेर चालीसा का महत्व Kuber Chalisa:कुबेर चालीसा का अर्थ Kuber Chalisa:कुबेर चालीसा में कुबेर के विभिन्न रूपों और उनके महान कार्यों का वर्णन किया गया है। इसमें भक्त कुबेर से धन, वैभव और समृद्धि की प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं। Kuber Chalisa:कुबेर चालीसा का जाप कुबेर चालीसा का जाप सुबह या शाम के समय किया जा सकता है। Kuber Chalisa इसे एकाग्रचित होकर और मन में कुबेर की छवि लेकर जाप करना चाहिए। Kuber Chalisa:कुबेर चालीसा ॥ दोहा ॥जैसे अटल हिमालय,और जैसे अडिग सुमेर ।ऐसे ही स्वर्ग द्वार पे,अविचल खडे कुबेर ॥ विघ्न हरण मंगल करण,सुनो शरणागत की टेर ।भक्त हेतु वितरण करो,धन माया के ढेर ॥ ॥ चौपाई ॥जै जै जै श्री कुबेर भण्डारी ।धन माया के तुम अधिकारी ॥ तप तेज पुंज निर्भय भय हारी ।पवन वेग सम सम तनु बलधारी ॥ स्वर्ग द्वार की करें पहरे दारी ।सेवक इंद्र देव के आज्ञाकारी ॥ यक्ष यक्षणी की है सेना भारी ।सेनापति बने युद्ध में धनुधारी ॥4॥ महा योद्धा बन शस्त्र धारैं ।युद्ध करैं शत्रु को मारैं ॥ सदा विजयी कभी ना हारैं ।भगत जनों के संकट टारैं ॥ प्रपितामह हैं स्वयं विधाता ।पुलिस्ता वंश के जन्म विख्याता ॥ विश्रवा पिता इडविडा जी माता ।विभीषण भगत आपके भ्राता ॥8॥ शिव चरणों में जब ध्यान लगाया ।घोर तपस्या करी तन को सुखाया ॥ शिव वरदान मिले देवत्य पाया ।अमृत पान करी अमर हुई काया ॥ धर्म ध्वजा सदा लिए हाथ में ।देवी देवता सब फिरैं साथ में ॥ पीताम्बर वस्त्र पहने गात में ।बल शक्ति पूरी यक्ष जात में ॥12॥ स्वर्ण सिंहासन आप विराजैं ।त्रिशूल गदा हाथ में साजैं ॥ शंख मृदंग नगारे बाजैं ।गंधर्व राग मधुर स्वर गाजैं ॥ चौंसठ योगनी मंगल गावैं ।ऋद्धि-सिद्धि नित भोग लगावैं ॥ दास दासनी सिर छत्र फिरावैं ।यक्ष यक्षणी मिल चंवर ढूलावैं ॥16॥ ऋषियों में जैसे परशुराम बली हैं ।देवन्ह में जैसे हनुमान बली हैं ॥ पुरुषों में जैसे भीम बली हैं ।यक्षों में ऐसे ही कुबेर बली हैं ॥ भगतों में जैसे प्रहलाद बड़े हैं ।पक्षियों में जैसे गरुड़ बड़े हैं ॥ नागों में जैसे शेष बड़े हैं ।वैसे ही भगत कुबेर बड़े हैं ॥20॥ कांधे धनुष हाथ में भाला ।गले फूलों की पहनी माला ॥ स्वर्ण मुकुट अरु देह विशाला ।दूर-दूर तक होए उजाला ॥ कुबेर देव को जो मन में धारे ।सदा विजय हो कभी न हारे ॥ बिगड़े काम बन जाएं सारे ।अन्न धन के रहें भरे भण्डारे ॥24॥ कुबेर गरीब को आप उभारैं ।कुबेर कर्ज को शीघ्र उतारैं ॥ कुबेर भगत के संकट टारैं ।कुबेर शत्रु को क्षण में मारैं ॥ शीघ्र धनी जो होना चाहे ।क्युं नहीं यक्ष कुबेर मनाएं ॥ यह पाठ जो पढ़े पढ़ाएं ।दिन दुगना व्यापार बढ़ाएं ॥28॥ भूत प्रेत को कुबेर भगावैं ।अड़े काम को कुबेर बनावैं ॥ रोग शोक को कुबेर नशावैं ।कलंक कोढ़ को कुबेर हटावैं ॥ कुबेर चढ़े को और चढ़ादे ।कुबेर गिरे को पुन: उठा दे ॥ कुबेर भाग्य को तुरंत जगा दे ।कुबेर भूले को राह बता दे ॥32॥ प्यासे की प्यास कुबेर बुझा दे ।भूखे की भूख कुबेर मिटा दे ॥ रोगी का रोग कुबेर घटा दे ।दुखिया का दुख कुबेर छुटा दे ॥ बांझ की गोद कुबेर भरा दे ।कारोबार को कुबेर बढ़ा दे ॥ कारागार से कुबेर छुड़ा दे ।चोर ठगों से कुबेर बचा दे ॥36॥ कोर्ट केस में कुबेर जितावै ।जो कुबेर को मन में ध्यावै ॥ चुनाव में जीत कुबेर करावैं ।मंत्री पद पर कुबेर बिठावैं ॥ पाठ करे जो नित मन लाई ।उसकी कला हो सदा सवाई ॥ जिसपे प्रसन्न कुबेर की माई ।उसका जीवन चले सुखदाई ॥40॥ जो कुबेर का पाठ करावै ।उसका बेड़ा पार लगावै ॥ उजड़े घर को पुन: बसावै ।शत्रु को भी मित्र बनावै ॥ सहस्त्र पुस्तक जो दान कराई ।सब सुख भोद पदार्थ पाई ॥ प्राण त्याग कर स्वर्ग में जाई ।मानस परिवार कुबेर कीर्ति गाई ॥44॥ ॥ दोहा ॥शिव भक्तों में अग्रणी,श्री यक्षराज कुबेर ।हृदय में ज्ञान प्रकाश भर,कर दो दूर अंधेर ॥ कर दो दूर अंधेर अब,जरा करो ना देर ।शरण पड़ा हूं आपकी,दया की दृष्टि फेर ॥ नित्त नेम कर प्रातः ही,पाठ करौं चालीसा ।तुम मेरी मनोकामना,पूर्ण करो जगदीश ॥ मगसर छठि हेमन्त ॠतु,संवत चौसठ जान ।अस्तुति चालीसा शिवहि,पूर्ण कीन कल्याण ॥

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Annapurna Chalisa:अन्नपूर्णा चालीसा

Annapurna Chalisa:अन्नपूर्णा चालीसा: भक्ति और भोजन की देवी का स्तुति Annapurna Chalisa:अन्नपूर्णा चालीसा हिंदू धर्म में माता अन्नपूर्णा की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। माता अन्नपूर्णा को अन्न की देवी माना जाता है और उनका आशीर्वाद घर में सुख-समृद्धि और अन्न का अभाव न होने का कारण माना जाता है। Annapurna Chalisa:अन्नपूर्णा चालीसा का महत्व Annapurna Chalisa:अन्नपूर्णा चालीसा का अर्थ अन्नपूर्णा चालीसा में माता अन्नपूर्णा के विभिन्न रूपों और उनके महान कार्यों का वर्णन किया गया है। इसमें भक्त माता से सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और मोक्ष की प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं। Annapurna Chalisa:अन्नपूर्णा चालीसा का जाप अन्नपूर्णा चालीसा का जाप सुबह या शाम के समय किया जा सकता है। इसे एकाग्रचित होकर और मन में माता अन्नपूर्णा की छवि लेकर जाप करना चाहिए। Annapurna Chalisa:अन्नपूर्णा चालीसा ॥ माँ अन्नपूर्णा चालीसा ॥॥ दोहा ॥विश्वेश्वर पदपदम की रज निज शीश लगाय ।अन्नपूर्णे, तव सुयश बरनौं कवि मतिलाय । ॥ चौपाई ॥नित्य आनंद करिणी माता,वर अरु अभय भाव प्रख्याता ॥ जय ! सौंदर्य सिंधु जग जननी,अखिल पाप हर भव-भय-हरनी ॥ श्वेत बदन पर श्वेत बसन पुनि,संतन तुव पद सेवत ऋषिमुनि ॥काशी पुराधीश्वरी माता,माहेश्वरी सकल जग त्राता ॥ वृषभारुढ़ नाम रुद्राणी,विश्व विहारिणि जय ! कल्याणी ॥ पतिदेवता सुतीत शिरोमणि,पदवी प्राप्त कीन्ह गिरी नंदिनि ॥ पति विछोह दुःख सहि नहिं पावा,योग अग्नि तब बदन जरावा ॥ देह तजत शिव चरण सनेहू,राखेहु जात हिमगिरि गेहू ॥ प्रकटी गिरिजा नाम धरायो,अति आनंद भवन मँह छायो ॥नारद ने तब तोहिं भरमायहु,ब्याह करन हित पाठ पढ़ायहु ॥ 10 ॥ ब्रहमा वरुण कुबेर गनाये,देवराज आदिक कहि गाये ॥ सब देवन को सुजस बखानी,मति पलटन की मन मँह ठानी ॥ अचल रहीं तुम प्रण पर धन्या,कीहनी सिद्ध हिमाचल कन्या ॥ निज कौ तब नारद घबराये,तब प्रण पूरण मंत्र पढ़ाये ॥ करन हेतु तप तोहिं उपदेशेउ,संत बचन तुम सत्य परेखेहु ॥ गगनगिरा सुनि टरी न टारे,ब्रहां तब तुव पास पधारे ॥ कहेउ पुत्रि वर माँगु अनूपा,देहुँ आज तुव मति अनुरुपा ॥ तुम तप कीन्ह अलौकिक भारी,कष्ट उठायहु अति सुकुमारी ॥ अब संदेह छाँड़ि कछु मोसों,है सौगंध नहीं छल तोसों ॥ करत वेद विद ब्रहमा जानहु,वचन मोर यह सांचा मानहु ॥ 20 ॥ तजि संकोच कहहु निज इच्छा,देहौं मैं मनमानी भिक्षा ॥ सुनि ब्रहमा की मधुरी बानी,मुख सों कछु मुसुकाय भवानी ॥ बोली तुम का कहहु विधाता,तुम तो जगके स्रष्टाधाता ॥ मम कामना गुप्त नहिं तोंसों,कहवावा चाहहु का मोंसों ॥ दक्ष यज्ञ महँ मरती बारा,शंभुनाथ पुनि होहिं हमारा ॥ सो अब मिलहिं मोहिं मनभाये,कहि तथास्तु विधि धाम सिधाये ॥ तब गिरिजा शंकर तव भयऊ,फल कामना संशयो गयऊ ॥चन्द्रकोटि रवि कोटि प्रकाशा,तब आनन महँ करत निवासा ॥ माला पुस्तक अंकुश सोहै,कर मँह अपर पाश मन मोहै ॥ अन्न्पूर्णे ! सदापूर्णे,अज अनवघ अनंत पूर्णे ॥ 30 ॥ कृपा सागरी क्षेमंकरि माँ,भव विभूति आनंद भरी माँ ॥ कमल विलोचन विलसित भाले,देवि कालिके चण्डि कराले ॥ तुम कैलास मांहि है गिरिजा,विलसी आनंद साथ सिंधुजा ॥ स्वर्ग महालक्ष्मी कहलायी,मर्त्य लोक लक्ष्मी पदपायी ॥ विलसी सब मँह सर्व सरुपा,सेवत तोहिं अमर पुर भूपा ॥ जो पढ़िहहिं यह तव चालीसा,फल पाइंहहि शुभ साखी ईसा ॥ प्रात समय जो जन मन लायो,पढ़िहहिं भक्ति सुरुचि अघिकायो ॥ स्त्री कलत्र पति मित्र पुत्र युत,परमैश्रवर्य लाभ लहि अद्भुत ॥ राज विमुख को राज दिवावै,जस तेरो जन सुजस बढ़ावै ॥पाठ महा मुद मंगल दाता,भक्त मनोवांछित निधि पाता ॥ 40 ॥ ॥ दोहा ॥जो यह चालीसा सुभग,पढ़ि नावैंगे माथ ।तिनके कारज सिद्ध सब,साखी काशी नाथ ॥

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Saraswati Chalisa:सरस्वती चालीसा

Saraswati Chalisa:श्री सरस्वती चालीसा: ज्ञान की देवी की स्तुति Saraswati Chalisa:श्री सरस्वती चालीसा ज्ञान, संगीत और कला की देवी माता सरस्वती की स्तुति में गाया जाने वाला एक प्रसिद्ध चालीसा है। Saraswati Chalisa यह चालीसा विद्यार्थियों, लेखकों, कलाकारों और सभी उन लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो ज्ञान और बुद्धि प्राप्त करना चाहते हैं। Saraswati Chalisa:श्री सरस्वती चालीसा का महत्व Saraswati Chalisa:श्री सरस्वती चालीसा का पाठ कैसे करें? Saraswati Chalisa:श्री सरस्वती चालीसा के कुछ लाभ Saraswati Chalisa:सरस्वती चालीसा ॥ दोहा ॥जनक जननि पद्मरज,निज मस्तक पर धरि ।बन्दौं मातु सरस्वती,बुद्धि बल दे दातारि ॥ पूर्ण जगत में व्याप्त तव,महिमा अमित अनंतु।दुष्जनों के पाप को,मातु तु ही अब हन्तु ॥ ॥ चालीसा ॥जय श्री सकल बुद्धि बलरासी ।जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी ॥ जय जय जय वीणाकर धारी ।करती सदा सुहंस सवारी ॥ रूप चतुर्भुज धारी माता ।सकल विश्व अन्दर विख्याता ॥4 जग में पाप बुद्धि जब होती ।तब ही धर्म की फीकी ज्योति ॥ तब ही मातु का निज अवतारी ।पाप हीन करती महतारी ॥ वाल्मीकिजी थे हत्यारा ।तव प्रसाद जानै संसारा ॥ रामचरित जो रचे बनाई ।आदि कवि की पदवी पाई ॥8 कालिदास जो भये विख्याता ।तेरी कृपा दृष्टि से माता ॥ तुलसी सूर आदि विद्वाना ।भये और जो ज्ञानी नाना ॥ तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा ।केव कृपा आपकी अम्बा ॥ करहु कृपा सोइ मातु भवानी ।दुखित दीन निज दासहि जानी ॥12 पुत्र करहिं अपराध बहूता ।तेहि न धरई चित माता ॥ राखु लाज जननि अब मेरी ।विनय करउं भांति बहु तेरी ॥ मैं अनाथ तेरी अवलंबा ।कृपा करउ जय जय जगदंबा ॥ मधुकैटभ जो अति बलवाना ।बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना ॥16 समर हजार पाँच में घोरा ।फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा ॥ मातु सहाय कीन्ह तेहि काला ।बुद्धि विपरीत भई खलहाला ॥ तेहि ते मृत्यु भई खल केरी ।पुरवहु मातु मनोरथ मेरी ॥ चंड मुण्ड जो थे विख्याता ।क्षण महु संहारे उन माता ॥20 रक्त बीज से समरथ पापी ।सुरमुनि हदय धरा सब काँपी ॥ काटेउ सिर जिमि कदली खम्बा ।बारबार बिन वउं जगदंबा ॥ जगप्रसिद्ध जो शुंभनिशुंभा ।क्षण में बाँधे ताहि तू अम्बा ॥ भरतमातु बुद्धि फेरेऊ जाई ।रामचन्द्र बनवास कराई ॥24 एहिविधि रावण वध तू कीन्हा ।सुर नरमुनि सबको सुख दीन्हा ॥ को समरथ तव यश गुन गाना ।निगम अनादि अनंत बखाना ॥ विष्णु रुद्र जस कहिन मारी ।जिनकी हो तुम रक्षाकारी ॥ रक्त दन्तिका और शताक्षी ।नाम अपार है दानव भक्षी ॥28 दुर्गम काज धरा पर कीन्हा ।दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा ॥ दुर्ग आदि हरनी तू माता ।कृपा करहु जब जब सुखदाता ॥ नृप कोपित को मारन चाहे ।कानन में घेरे मृग नाहे ॥ सागर मध्य पोत के भंजे ।अति तूफान नहिं कोऊ संगे ॥32 भूत प्रेत बाधा या दुःख में ।हो दरिद्र अथवा संकट में ॥ नाम जपे मंगल सब होई ।संशय इसमें करई न कोई ॥ पुत्रहीन जो आतुर भाई ।सबै छांड़ि पूजें एहि भाई ॥ करै पाठ नित यह चालीसा ।होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा ॥36 धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै ।संकट रहित अवश्य हो जावै ॥ भक्ति मातु की करैं हमेशा ।निकट न आवै ताहि कलेशा ॥ बंदी पाठ करें सत बारा ।बंदी पाश दूर हो सारा ॥ रामसागर बाँधि हेतु भवानी ।कीजै कृपा दास निज जानी ॥40 ॥दोहा॥मातु सूर्य कान्ति तव,अन्धकार मम रूप ।डूबन से रक्षा करहु,परूँ न मैं भव कूप ॥ बलबुद्धि विद्या देहु मोहि,सुनहु सरस्वती मातु ।राम सागर अधम को,आश्रय तू ही देदातु ॥

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Narmada Chalisa, Jai Jai Jai Narmada Bhawani:नर्मदा चालीसा – जय जय नर्मदा भवानी

Narmada Chalisa:नर्मदा चालीसा: पवित्र नर्मदा नदी की स्तुति Narmada Chalisa:नर्मदा माता हिंदू धर्म में एक बहुत ही पवित्र नदी मानी जाती है। इसे ‘रेवा’ के नाम से भी जाना जाता है। नर्मदा चालीसा इसी पवित्र नदी की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। Narmada Chalisa:नर्मदा चालीसा का महत्व Narmada Chalisa:नर्मदा चालीसा का पाठ कैसे करें? नर्मदा चालीसा के कुछ लाभ Narmada Chalisa, Jai Jai Jai Narmada Bhawani:नर्मदा चालीसा – जय जय नर्मदा भवानी श्री नर्मदा चालीसा:॥ दोहा॥देवि पूजित, नर्मदा,महिमा बड़ी अपार ।चालीसा वर्णन करत,कवि अरु भक्त उदार॥ इनकी सेवा से सदा,मिटते पाप महान ।तट पर कर जप दान नर,पाते हैं नित ज्ञान ॥ ॥ चौपाई ॥जय-जय-जय नर्मदा भवानी,तुम्हरी महिमा सब जग जानी । अमरकण्ठ से निकली माता,सर्व सिद्धि नव निधि की दाता । कन्या रूप सकल गुण खानी,जब प्रकटीं नर्मदा भवानी । सप्तमी सुर्य मकर रविवारा,अश्वनि माघ मास अवतारा ॥4 वाहन मकर आपको साजैं,कमल पुष्प पर आप विराजैं । ब्रह्मा हरि हर तुमको ध्यावैं,तब ही मनवांछित फल पावैं । दर्शन करत पाप कटि जाते,कोटि भक्त गण नित्य नहाते । जो नर तुमको नित ही ध्यावै,वह नर रुद्र लोक को जावैं ॥8 मगरमच्छा तुम में सुख पावैं,अंतिम समय परमपद पावैं । मस्तक मुकुट सदा ही साजैं,पांव पैंजनी नित ही राजैं । कल-कल ध्वनि करती हो माता,पाप ताप हरती हो माता । पूरब से पश्चिम की ओरा,बहतीं माता नाचत मोरा ॥12 शौनक ऋषि तुम्हरौ गुण गावैं,सूत आदि तुम्हरौं यश गावैं । शिव गणेश भी तेरे गुण गवैं,सकल देव गण तुमको ध्यावैं । कोटि तीर्थ नर्मदा किनारे,ये सब कहलाते दु:ख हारे । मनोकमना पूरण करती,सर्व दु:ख माँ नित ही हरतीं ॥16 कनखल में गंगा की महिमा,कुरुक्षेत्र में सरस्वती महिमा । पर नर्मदा ग्राम जंगल में,नित रहती माता मंगल में । एक बार कर के स्नाना,तरत पिढ़ी है नर नारा । मेकल कन्या तुम ही रेवा,तुम्हरी भजन करें नित देवा ॥20 जटा शंकरी नाम तुम्हारा,तुमने कोटि जनों को है तारा । समोद्भवा नर्मदा तुम हो,पाप मोचनी रेवा तुम हो । तुम्हरी महिमा कहि नहीं जाई,करत न बनती मातु बड़ाई । जल प्रताप तुममें अति माता,जो रमणीय तथा सुख दाता ॥24 चाल सर्पिणी सम है तुम्हारी,महिमा अति अपार है तुम्हारी । तुम में पड़ी अस्थि भी भारी,छुवत पाषाण होत वर वारि । यमुना मे जो मनुज नहाता,सात दिनों में वह फल पाता । सरस्वती तीन दीनों में देती,गंगा तुरत बाद हीं देती ॥28 पर रेवा का दर्शन करकेमानव फल पाता मन भर के । तुम्हरी महिमा है अति भारी,जिसको गाते हैं नर-नारी । जो नर तुम में नित्य नहाता,रुद्र लोक मे पूजा जाता । जड़ी बूटियां तट पर राजें,मोहक दृश्य सदा हीं साजें ॥32 वायु सुगंधित चलती तीरा,जो हरती नर तन की पीरा । घाट-घाट की महिमा भारी,कवि भी गा नहिं सकते सारी । नहिं जानूँ मैं तुम्हरी पूजा,और सहारा नहीं मम दूजा । हो प्रसन्न ऊपर मम माता,तुम ही मातु मोक्ष की दाता ॥35 जो मानव यह नित है पढ़ता,उसका मान सदा ही बढ़ता । जो शत बार इसे है गाता,वह विद्या धन दौलत पाता । अगणित बार पढ़ै जो कोई,पूरण मनोकामना होई । सबके उर में बसत नर्मदा,यहां वहां सर्वत्र नर्मदा ॥40 ॥ दोहा ॥भक्ति भाव उर आनि के,जो करता है जाप । माता जी की कृपा से,दूर होत संताप॥॥ इति श्री नर्मदा चालीसा ॥

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