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Published October 3, 2023
Updated November 4, 2023

हनुमान चालीसा संस्कृत में एक भक्तिपूर्ण गीत है जो भगवान राम के महान भक्त हनुमान की स्तुति करता है। यह गीत गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखा गया है, जो रामायण के लेखक भी हैं।

हनुमान चालीसा के संस्कृत अनुवाद में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • दोहे: दोहे में हनुमान की स्तुति की जाती है और उनसे आशीर्वाद मांगा जाता है।
  • चौपाइयां: चौपाइयों में हनुमान के गुणों और कार्यों का वर्णन किया गया है।

हनुमान चालीसा के संस्कृत अनुवाद के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं:

  • दोहा:

श्रीगुरु चरण सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।

अनुवाद:

गुरुदेव के चरण कमल के धूल से अपने मन को पवित्र करके, मैं श्री रघुनाथ के निर्मल गुणों का वर्णन करता हूँ, जो चार फल प्रदान करते हैं।

  • चौपाई:

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।

अनुवाद:

जय हनुमान! तुम ज्ञान और गुणों के सागर हो। तुम तीनों लोकों को प्रकाशित करते हो।

हनुमान चालीसा का संस्कृत अनुवाद एक शक्तिशाली भक्तिपूर्ण गीत है जो भक्तों को आध्यात्मिक शक्ति, ज्ञान और सुरक्षा प्रदान कर सकता है।

यहां हनुमान चालीसा का संस्कृत अनुवाद दिया गया है:

श्रीगुरु चरण सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवनकुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।

राम दूत अतुलित बलधामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के सँगी।

कँचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै।

संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन।

विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। रामचंद्र के काज सँवारे।

लक्ष्मण मूर्छित भए परे, सजीवन लाय संजीवन ले आए।

और देवता चित्त न धरई। हनुमान जी की बडाई।

जापर तव ध्यान जावै। वहाँ सब सुख सदैव निवास।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।

राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै।

अन्त काल रघुवरपुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई।

और देवता चित्त न धरई। हनुमान जी की बडाई।

॥ दोहा ॥

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।

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