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Vallabhacharya Jayanti

Vallabhacharya Jayanti 2026 Mein Kab Hai: भारत की पवित्र और रूहानी भूमि पर सदियों से अनेक महान संतों, ऋषियों और दार्शनिकों ने जन्म लिया है, जिन्होंने भटके हुए समाज को ईश्वर भक्ति का एक नया, सरल और सटीक मार्ग दिखाया। इन्हीं महान और दिव्य विभूतियों में से एक अत्यंत आदरणीय नाम श्री वल्लभाचार्य जी का है ।

हिंदू धर्म, विशेषकर वैष्णव संप्रदाय के अनुयायियों के बीच Vallabhacharya Jayanti का पर्व बहुत ही अपार श्रद्धा, उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है ।

श्री वल्लभाचार्य जी ने ही भक्ति रस से भरे ‘पुष्टिमार्ग’ और ‘शुद्ध अद्वैत दर्शन’ की स्थापना की थी । उनके गहरे आध्यात्मिक विचारों के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण की निस्वार्थ और प्रेममयी भक्ति ही मोक्ष प्राप्त करने का एकमात्र साधन है । अगर आप भी श्री कृष्ण के अनन्य भक्त हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा पाना चाहते हैं…

 साल 2026 में तिथि और शुभ मुहूर्त (Date and Timings)

व्रत और त्योहारों की सही जानकारी होना सबसे ज्यादा जरूरी होता है ताकि हम पूरे विधि-विधान से पूजा संपन्न कर सकें। हिंदू पंचांग की सटीक गणनाओं के अनुसार, हर साल वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि (एकादशी) के दिन यह पावन पर्व मनाया जाता है ।

Vallabhacharya Jayanti जिस दिन वरूथिनी एकादशी होती है, उसी शुभ दिन पर यह जयंती भी मनाई जाती है । वर्ष 2026 में श्री वल्लभाचार्य जी की 547वीं जयंती 13 अप्रैल 2026, दिन सोमवार को पूरे देशभर में बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाएगी ।

Vallabhacharya Jayanti 2026 :इस पावन दिन के प्रमुख समय और मुहूर्त इस प्रकार हैं:

एकादशी तिथि का आरंभ: 13 अप्रैल 2026 को रात 01:16 बजे से हो जाएगा ।
एकादशी तिथि का समापन: 14 अप्रैल 2026 को रात 01:08 बजे तक रहेगा ।
अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:33 बजे से लेकर दोपहर 12:24 बजे तक पूजा का सबसे उत्तम समय रहेगा ।
विजय मुहूर्त: दोपहर 02:06 बजे से 02:56 बजे तक रहेगा, जो शुभ कार्यों के लिए बहुत अच्छा माना जाता है ।

एक चमत्कारिक जन्म कथा:

अग्नि देवता का अवतार महान दार्शनिक संत वल्लभाचार्य जी का जन्म वर्ष 1479 ईस्वी में एक साधारण तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम लक्ष्मण भट्ट और माता का नाम इल्लम्मागारू (यल्लम्मा) था । उनकी जन्म कथा किसी रोंगटे खड़े कर देने वाले रहस्य और चमत्कार से कम नहीं है।

कथाओं के अनुसार, उस समय समाज में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष चरम पर था और उनके माता-पिता बहुत सारे कष्ट सहते हुए यात्रा कर रहे थे । Vallabhacharya Jayanti जब वे वर्तमान छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पास चंपारण्य (चंपारण) नामक घने जंगल से गुजर रहे थे, तभी शाम के समय उनकी माता को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई । माता इल्लम्मागारू ने जंगल में एक बहुत बड़े और विशालकाय शमी के पेड़ के नीचे एक आठ महीने के शिशु को जन्म दिया ।

शिशु में कोई हलचल या जीवन का संकेत न देखकर माता-पिता को लगा कि बालक मृत पैदा हुआ है । Vallabhacharya Jayanti भारी मन और गहरे दुख के साथ लक्ष्मण भट्ट जी ने उस बालक को कपड़े में लपेटा, उसी पेड़ के नीचे एक गड्ढे में रखा और भारी मन से नगर की ओर चले गए ।

उसी रात नगर में विश्राम करते समय माता इल्लम्मागारू के स्वप्न में स्वयं भगवान श्रीनाथ जी (श्री कृष्ण) प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि जिस नवजात बालक को उन्होंने मृत समझकर जंगल में छोड़ दिया है, Vallabhacharya Jayanti वह साक्षात उनका ही अंश है और उन्होंने ही माता की कोख से जन्म लिया है ।

जब वे दोनों पति-पत्नी घबराकर दौड़ते हुए उस पेड़ के पास पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि वह नन्हा बालक बिल्कुल सुरक्षित है और उसके चारों ओर प्रज्वलित अग्नि का एक मजबूत सुरक्षा घेरा बना हुआ है । Vallabhacharya Jayanti माता-पिता ने प्रसन्न होकर उसे सीने से लगा लिया और बालक का नाम ‘वल्लभ’ रखा । इसी अत्यंत अद्भुत और दिव्य घटना के कारण उन्हें अग्नि देवता का अवतार भी माना जाता है ।

पुष्टिमार्ग की स्थापना और श्रीनाथ जी से मिलन बड़े होकर इस बालक ने धर्म और आध्यात्म की दुनिया में एक बहुत बड़ी क्रांति ला दी। इसी उपलक्ष्य में लोग हर साल Vallabhacharya Jayanti मनाते हैं ।

उन्होंने वेदांत दर्शन को बहुत ही गहराई से समझा और ‘पुष्टिमार्ग’ (कृपा का मार्ग) की स्थापना की । Vallabhacharya Jayanti उन्होंने कठोर तपस्या और संन्यास जीवन को पूरी तरह से नकारते हुए यह दावा किया कि कोई भी आम इंसान केवल भगवान कृष्ण के प्रति प्रेमपूर्ण और निस्वार्थ भक्ति दिखाकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है ।

इन महान दार्शनिक के जीवन से जुड़ी एक और रोमांचक कहानी गोवर्धन पर्वत के इर्द-गिर्द घूमती है । कहा जाता है कि जब वल्लभ अपनी यात्रा पर थे, तो उन्हें गोवर्धन पर्वत के पास कुछ रहस्यमयी हलचल का आभास हुआ ।

वहां पहुंचने पर उन्हें भगवान श्री कृष्ण की एक अत्यंत मनमोहक मूर्ति मिली, जिसे उन्होंने अपने सीने से लगा लिया । Vallabhacharya Jayanti धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, स्वयं श्री कृष्ण ने उन्हें दर्शन दिए थे और उन्हें श्रीनाथ जी के रूप में पूजने का अवसर वल्लभाचार्य जी को ही प्राप्त हुआ था ।

बचपन की मेधा और ‘आचार्य’ की महान उपाधि वल्लभाचार्य जी बचपन से ही अत्यंत मेधावी और विलक्षण प्रतिभा के धनी थे । मात्र 7 वर्ष की छोटी सी आयु में ही उन्होंने वेदों और छह भारतीय दार्शनिक प्रणालियों का गहन अध्ययन करना शुरू कर दिया था । Vallabhacharya Jayanti इसके अलावा उन्होंने आदि शंकराचार्य, रामानुज, माधव और निम्बार्क के दर्शन को भी गहराई से पढ़ा था ।

जब वे केवल 11 साल के थे, तब उन्होंने विजयनगर साम्राज्य में राजा कृष्णदेव राय के दरबार में द्वैतवाद और अद्वैतवाद पर चल रही एक बहुत बड़ी दार्शनिक बहस में हिस्सा लिया । पूरे 27 दिनों तक चली इस लंबी और कठिन शास्त्रार्थ (बहस) में उन्होंने सभी विद्वानों को अपने तर्कों से पराजित कर दिया ।

उनकी इस अद्भुत प्रतिभा से राजा कृष्णदेव राय इतने अधिक प्रसन्न हुए कि उन्होंने युवा वल्लभ का ‘कनकाभिषेक’ (सोने के बर्तनों से अभिषेक) किया ।

उसी ऐतिहासिक आंदोलन के बाद उन्हें ‘आचार्य’ तथा ‘जगद्गुरु’ (दुनिया के पूर्वज) की महान और प्रतिष्ठित उपाधि से हमेशा के लिए सम्मानित किया गया । राजा ने उन्हें सौ मन भारी सोने के बर्तन भेंट किए, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया और गरीबों में बांटने का अनुरोध किया ।

ग्रंथों की रचना और चौरासी बैठक अपने संपूर्ण जीवनकाल में, श्री वल्लभाचार्य जी ने कई अमूल्य दार्शनिक और भक्ति पुस्तकें लिखीं । उन्होंने ‘वेद व्यास तत्त्वार्थ दीप निबंध’, ‘शास्त्रार्थ प्रकरण’, ‘भागवतरथ प्रकरण’ और ‘षोडश ग्रंथ’ (16 लघु छंदों का संग्रह) जैसे महान ग्रंथों की रचना की । इसके अलावा ‘मधुराष्टकम्’, ‘पत्रावलांबन’, और ‘नंदकुमार अष्टकम’ जैसी रचनाएं भी उन्हीं की अद्भुत देन हैं ।

उन्होंने संपूर्ण भारतवर्ष की तीन बार नंगे पैर यात्रा की और अपनी इस कठिन यात्रा के दौरान एक सादी सफेद धोती और अंगवस्त्र पहनते थे । उन्होंने देश भर में 84 विभिन्न स्थानों पर रुककर भागवत प्रवचन दिए । Vallabhacharya Jayanti आज की तारीख में इन 84 पवित्र स्थानों को ‘चौरासी बैठक’ के नाम से जाना जाता है और ये सभी पुष्टिमार्ग के महान तीर्थ स्थल बन चुके हैं ।

मंदिरों में उत्सव और भव्य शोभायात्राएं वैष्णव संप्रदाय के अत्यंत प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिरों में Vallabhacharya Jayanti के दिन का नजारा सचमुच देखते ही बनता है ।

विशेष रूप से राजस्थान के नाथद्वारा स्थित श्रीनाथजी मंदिर, मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर, उत्तर प्रदेश के गोकुल और गुजरात के बेत द्वारका में इस पर्व की रौनक किसी बड़े उत्सव या मेले जैसी होती है । इन मंदिरों में इस पावन Vallabhacharya Jayanti पर भव्य शोभायात्राएं निकाली जाती हैं, भगवान को विशेष छप्पन भोग लगाए जाते हैं, और रात भर सत्संग व भागवत कथा का आयोजन किया जाता है ।

सरल पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)  

सुबह जल्दी (ब्रह्म मुहूर्त में) उठकर ताजे पानी से स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें ।
अपने घर के मंदिर या किसी साफ जगह पर एक चौकी रखकर भगवान श्री कृष्ण (विशेषकर उनके बाल स्वरूप) और वल्लभाचार्य जी का चित्र स्थापित करें ।
दीपक जलाएं, शुद्ध धूप दिखाएं और भगवान को ताजे फल, माखन-मिश्री और अच्छी मिठाइयों का भोग बड़े ही प्रेम से लगाएं । पुष्टिमार्ग में भगवान को बिल्कुल परिवार के एक सदस्य की तरह माना जाता है।

एकाग्र मन से श्रीमद्भागवत पुराण का पाठ करें और वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित भजनों का गायन करें।
अंत में भगवान की प्रेमपूर्वक आरती करें और परिवार के सभी सदस्यों तथा गरीबों में प्रसाद का वितरण करें।

जल समाधि और भगवान कृष्ण का बुलावा पुष्टिमार्ग के पवित्र साहित्यों के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं वल्लभाचार्य जी को एक-दो बार अपने पास (स्वर्ग) वापस आने का संदेश दिया था । Vallabhacharya Jayanti भगवान की इसी आज्ञा का पालन करते हुए, वर्ष 1530 ईस्वी में, जब वे 52 वर्ष के थे, तब उन्होंने काशी (वाराणसी) के हनुमान घाट के पास पवित्र गंगा नदी में जल समाधि ले ली थी ।

अपने अंतिम दिनों में वे पत्तों की एक झोपड़ी में रहे और अंतिम सांस तक श्री कृष्ण के नाम का जाप करते रहे । Vallabhacharya Jayanti ऐसी बहुत ही गहरी मान्यता है कि स्वयं भगवान श्री कृष्ण उन्हें मृत अवस्था में अपने साथ बैकुंठ ले जाने के लिए साक्षात प्रकट हुए थे ।

निष्कर्ष (Final Thoughts)

सार के रूप में यही कहा जा सकता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए किसी कठोर दंड, तपस्या या दिखावे की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है; भगवान के प्रति सच्चा और निस्वार्थ प्रेम ही परमात्मा तक पहुंचने का सबसे सीधा मार्ग है ।

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