Srikrishna Stotram: यहाँ “विष्णुपुराण” में वर्णित नागपत्नी कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र (Nagapatni Kruta Shri Krishna Stotram) से जुड़ी विस्तृत जानकारी दी जा रही है, जो आप अपने हिंदी ब्लॉग में उपयोग कर सकते हैं।
Vishnupuran Nagapatni Kruta-Srikrishna Stotram:नागपत्नी कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र — विष्णुपुराण से
भूमिका
विष्णुपुराण, जो महर्षि पराशर द्वारा रचित अष्टादश महापुराणों में से एक है, उसमें अनेक प्रसंगों के माध्यम से भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की महिमा का वर्णन किया गया है।
श्रीकृष्ण अवतार के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण प्रसंग है — कालिय नाग के दमन का।
इस कथा में श्रीकृष्ण जब यमुना में बसे कालिय नाग के भय से गोकुलवासियों को मुक्त करते हैं, तब कालिय की पत्नियाँ (नागपत्नियाँ) श्रीकृष्ण की स्तुति करती हैं। यह स्तुति ही Vishnupuran Nagapatni Kruta-Srikrishna Stotram नागपत्नी कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र कहलाती है।
नागपत्नी कृत स्तोत्र का प्रसंग
यमुना नदी का जल कालिय नाग के विष से विषाक्त हो गया था।
गोकुलवासियों व गोधन की रक्षा हेतु श्रीकृष्ण यमुना में कूद पड़े।
श्रीकृष्ण ने कालिय नाग से युद्ध किया और अंततः उसके फनों पर नृत्य कर उसे पराजित किया।
जब कालिय हार गया, तब उसकी पत्नी नागपत्नियाँ रोती हुई श्रीकृष्ण के चरणों में आईं और अत्यंत भावुक होकर भगवान की स्तुति करने लगीं।
Top rated products
-
Gayatri Mantra Jaap for Wisdom and Knowledge
View Details₹5,100.00 -
Kaal Sarp Dosh Puja Online – राहु-केतु के दोष से पाएं मुक्ति
View Details₹5,100.00 -
Saraswati Mantra Chanting for Intelligence & Academic Success
View Details₹11,000.00 -
Surya Gayatri Mantra Jaap Online
View Details₹1,000.00 -
Kuber Mantra Chanting – Invoke the Guardian of Wealth
View Details₹11,000.00
Vishnupuran Nagapatni Kruta-Srikrishna Stotram:नागपत्नी कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र का भावार्थ
यह स्तोत्र भगवान श्रीकृष्ण की निर्दोषता, करुणा, शौर्य, ब्रह्मत्व और भक्तवत्सलता का वर्णन करता है। कुछ प्रमुख भाव:
- भगवान की बाल रूप में लीलाओं का वर्णन
- समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त परम तत्व के रूप में स्तुति
- उनके रूप, सौंदर्य और करुणा की सराहना
- उनकी रक्षा के लिए प्रार्थना
स्तोत्र के प्रमुख श्लोकों के भावार्थ
- त्वं अग्निर्बरुणो वायुः…
➤ हे प्रभु! आप ही अग्नि हैं, आप ही वरुण, वायु, चंद्रमा, सूर्य आदि सभी देवताओं का स्वरूप हैं। - नमस्ते देव देवेश…
➤ हे देवों के देव, आप अनंत हैं, अविनाशी हैं, हम आपको प्रणाम करते हैं। - भव बन्ध विमोचनाय…
➤ आप जन्म-मरण रूपी बंधन से मुक्त करने वाले हैं, हम आपके शरणागत हैं।
Sri Krishna Manasa Puja Stotram: श्रीकृष्ण मानस पूजा स्तोत्रम्
श्रीकृष्ण मानस पूजा स्तोत्रम् हिंदी पाठ: Sri Krishna Manasa Puja Stotram in Hindi हृदम्भोजे कृष्णस्सजलजलदश्यामलतनुः,सरोजाक्षः स्रग्वी मकुटकटकाद्याभरणवान् । शरद्राकानाथप्रतिमवदनः श्रीमुरलिकां,वहन् ध्येयो गोपीगणपरिवृतः कुङ्कुमचितः…
Shree Krishna Keelak Stotra:श्री कृष्ण कीलक स्तोत्र
Shree Krishna Keelak Stotra:श्री कृष्ण कीलक स्तोत्र: श्री कृष्ण कीलक स्तोत्र का सिर्फ़ 31 बार जाप करने से मन को…
Shri Krishna Sharanam Mamah: श्री कृष्ण शरणम मम:
Shri Krishna Sharanam Mamah: श्री कृष्ण शरणम मम : भगवान विष्णु के अवतार, कृष्ण का जन्म मथुरा में देवकी और…
इस स्तोत्र का महत्व
- यह भक्ति, करुणा और आत्मसमर्पण का श्रेष्ठ उदाहरण है।
- इसका पाठ भय से मुक्ति, रोग निवारण, और शत्रुओं पर विजय के लिए किया जाता है।
- बच्चों के स्वास्थ्य, जीवन रक्षा और दीर्घायु के लिए यह विशेष फलदायक माना गया है।
श्रीविष्णुपुराणे नागपत्नीकृत श्रीकृष्ण स्तोत्रम् हिंदी पाठ: Vishnupuran Nagapatni Kruta-Srikrishna Stotram in Hindi
ज्ञातोऽसि देवदेवेश सर्वज्ञस्त्वमनुत्तमः ।
परं ज्योतिरचिन्त्यं यत्तदंशः परमेश्वरः ॥ १ ॥
न समर्थाः सुरास्स्तोतुं यमनन्यभवं विभुम् ।
स्वरूपवर्णनं तस्य कथं योषित्करिष्यति ॥ २ ॥
यस्याखिलमहीव्योमजलाग्निपवनात्मकम् ।
ब्रह्माण्डमल्पकाल्पांशः स्तोष्यामस्तं कथं वयम् ॥ ३ ॥
यतन्तो न विदुर्नित्यं यत्स्वरूपं हि योगिनः ।
परमार्थमणोरल्पं स्थूलात्स्थूलं नताः स्म तम् ॥ ४ ॥
न यस्य जन्मने धाता यस्य चान्ताय नान्तकः ।
स्थितिकर्ता न चाऽन्योस्ति यस्य तस्मै नमस्सदा ॥ ५ ॥
कोपः स्वल्पोऽपि ते नास्ति स्थितिपालनमेव ते ।
कारणं कालियस्यास्य दमने श्रूयतां वचः ॥ ६ ॥
स्त्रियोऽनुकम्प्यास्साधूनां मूढा दीनाश्च जन्तवः ।
यतस्ततोऽस्य दीनस्य क्षम्यतां क्षमतां वर ॥ ७ ॥
समस्तजगदाधारो भवानल्पबलः फणी ।
त्वत्पादपीडितो जह्यान्मुहूर्त्तार्धेन जीवितम् ॥ ८ ॥
क्व पन्नगोऽल्पवीर्योऽयं क्व भवान्भुवनाश्रयः ।
प्रीतिद्वेषौ समोत्कृष्टगोचरौ भवतोऽव्यय ॥ ९ ॥
ततः कुरु जगत्स्वामिन्प्रसादमवसीदतः ।
प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षा प्रदीयताम् ॥ १० ॥
भुवनेश जगन्नाथ महापुरुष पूर्वज ।
प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षां प्रयच्छ नः ॥ ११ ॥
वेदान्तवेद्य देवेश दुष्टदैत्यनिबर्हण ।
प्राणांस्त्यजति नागोऽयं भर्तृभिक्षा प्रदीयताम् ॥ १२ ॥
॥ इति श्रीविष्णुपुराणे नागपत्नीकृत श्रीकृष्ण स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥





