कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्तिमार्कंडेय पुराण के अनुसार पहले यह सम्पूर्ण जगत प्रकाश रहित था। उस समय कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उनके मुख से प्रथम शब्द ॐ निकला जो सूर्य का तेज रुपी सूक्ष्म रूप था। तत्पश्चात ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए जो ॐ के तेज में एकाकार हो गए।

आज सूयर्देव का दिन है। इस दिन लोग सूर्य देव की उपासना करते हैं। सूर्य ही हैं जिनसे पृथ्वी पर जीवन है। सूर्य को पूजने का यह प्रचलन आज से नहीं बल्कि वैदिक काल से चला आ रहा है। वेदों में भी सूर्य देव की आराधना की गई है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद प्राप्त है। वैदिक काल ही क्यों आजकल भी कई लोग सूर्य को अर्ध्य देना नहीं भूलते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि सूर्य देव की उत्पत्ति कैसे हुई थी, अगर नहीं, तो हम आपको इसका जवाब अपने आर्टिकल में दे रहे हैं।

हिंदू धर्म में सूर्य को देवता माना गया हैं और इनकी पूजा अर्चना भी की जाती हैं। पृथ्वी के दो साक्षात देवता हैं सूर्य और चंद्रमा। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं और उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं वेदों के मुताबिक सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया हैं इस पृथ्वी पर

हिंदू धर्म में सूर्य को देवता माना गया हैं और इनकी पूजा अर्चना भी की जाती हैं। पृथ्वी के दो साक्षात देवता हैं सूर्य और चंद्रमा। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं और उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं वेदों के मुताबिक सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया हैं

इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य से ही हैं हिंदू धर्म में सूर्य को जल का अर्घ्य दिया जाता हैं। हिंदू धर्म पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति, प्रभाव, स्तुति, मंत्र आदि के बारे में बताया गया हैं नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद मिलता हैं तो आज हम आपको अपने इस लेख में सूर्य देव की उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कथा बताने जा रहे हैं तो आइए जानते हैं।

हिंदू धर्म के मार्कंडेय पुराण के मुताबिक सारा जगत पहले प्रकाश रहित था। उस वक्त कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी के मुंह से सबसे पहला शब्द जो निकला वो था ॐ, यह सूर्य का तेज रूप सूक्ष्म रूप था। इसके बाद ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए। यह चारों ॐ के तेज में एकाकार हो गए। यह विश्व का अविनाशी कारण हैं सूर्य ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार का कारण हैं

ब्रह्मा जी ने प्रार्थना की जिससे सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को धारण किया। वही सृष्टि की रचना की गई तब ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि हुए। मरीचि के पुत्र ​ऋषि कश्यप का विवाह अदिति से हुआ। सूर्य को प्रसन्न करने के लिए अदिति ने घोर तप किया। फिर सुषुम्ना नाम की किरण ने अदिति के गर्भ में प्रवेश किया। इस अवस्था में भी अदिति ने चान्द्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन किया। इस ऋषि राज कश्यप क्रोधित हो गए। उन्होंने अदिति से कहा कि तुम इस तरह व्रत रख कर गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचा रही हो। इस तरह तुम शिशु को क्यों करना चा​हती हो।

वही जब देवी अदिति ने यह सुना तो अदिति ने गर्भ के बालक को उदर से बाहर कर दिया जो अपने अत्यंत दिव्य तेज से प्रज्वल्लित हो रहा था। फिर सूर्य देव शिशु रूप में अदिति के गर्भ में प्रगट हुए। अदिति को मारिचम अन्डम कहा जाता था। इसके चलते ही इस बालक का नाम मार्तंड पड़ा। ब्रह्मपुराण में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को विवस्वान कहा गया हैं।

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