हिंदी पंचांग के अनुसार, हर वर्ष वैशाख माह की चतुर्दशी तिथि को छिन्नमस्ता जयंती मनाई जाती है। इस प्रकार साल 2023 में 4 मई को छिन्नमस्ता जयंती मनाई जाएगी। साथ ही गुप्त नवरात्रि के दौरान भी मां छिन्नमस्ता की पूजा उपासना की पूजा उपासना की जाती है।

हिंदी पंचांग के अनुसार, हर वर्ष वैशाख माह की चतुर्दशी तिथि को छिन्नमस्ता जयंती मनाई जाती है। इस प्रकार साल 2023 में 4 मई को छिन्नमस्ता जयंती मनाई जाएगी। साथ ही गुप्त नवरात्रि के दौरान भी मां छिन्नमस्ता की पूजा उपासना का विधान है। अत: तंत्र-मंत्र सीखने वाले साधक गुप्त नवरात्रि में भी मां छिन्नमस्ता की कठिन भक्ति करते हैं। ये दस महाविद्याओं की छठी देवी हैं। सनातन शास्त्र में मां छिन्नमस्ता को सर्व सिद्धि पूर्ण करने वाली अधिष्ठात्री कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि मां की पूजा करने से साधक की सभी मनोकामनाएं तत्काल पूर्ण होती हैं। इसके लिए साधक श्रद्धा भाव से मां छिन्नमस्ता की पूजा, जप एवं तप करते हैं। आइए, छिन्नमस्ता जयंती की तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि जानते हैं

छिन्नमस्ता जयंती के अनुष्ठान क्या हैं?

भक्त सबसे पहले सुबह जल्दी स्नान करते हैं और फिर साफ़ सुथरे कपड़े पहनते हैं।

छिन्नमस्ता जयंती के दिन भक्त एक कठोर उपवास करते हैं।

छिन्नमस्ता जयंती के दिन देवी छिन्नमस्ता की पूजा करने के लिए, भक्तगण देवता की मूरत या मूर्ति को वेदी पर स्थापित करते हैं।

इसके बाद, वे अनुष्ठानों के साथ शुरुआत करने के लिए अगरबत्तियां और एक दीया जलाते हैं।

आमतौर पर, सभी छिन्नमस्ता मंदिरों में पास में भगवान शिव की मूर्ति भी होती है। इसलिए भक्त अभिषेकम करके भी पूजा करते हैं और देवता की आराधना करते हैं।

भक्त पवित्र भोजन (प्रसाद) तैयार करते हैं और फूल, नारियल और माला के साथ देवता को अर्पित करते हैं।

देवी छिन्नमस्ता की आरती की जाती है और देवता को जगाने के लिए पवित्र मंत्रों का जाप किया जाता है।

आमंत्रितों और परिवार के सदस्यों के बीच प्रसाद वितरित किया जाता है।

देवता के दिव्य आशीर्वाद को पाने के लिए भक्त छिन्नमस्ता जयंती के दिन दान और पुण्य के कई कार्य करते हैं।

महत्व

सनातन धर्म में छिन्नमस्ता जयंती का विशेष महत्व है। गुप्त ज्ञान सीखने वाले साधकों के लिए यह दिन उत्सव जैसा रहता है। इस अवसर पर मां के दरबार को अच्छे से सजाया जाता है। भक्तगण अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं। मंदिरों में मां दुर्गा सप्तशती पाठ का आयोजन किया जाता है। साथ ही मंदिर परिसर के बाहर साधक भंडारा करते हैं। मां की पूजा करने से भक्तों की चिंता दूर हो जाती है। इसके लिए मां को चिंतपूर्णी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो भक्त सच्चे दिल से मैया के दरबार आता है। उसकी हर मनोकामना मैया की कृपा से अवश्य पूरी होती है।

पूजा विधि

इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सबसे पहले मैया का ध्यान कर दिन की शुरुआत करें। फिर घर की साफ-सफाई अच्छे से करें। इसके पश्चात, गंगाजल युक्त पानी से स्नान करें और लाल रंग का नवीन वस्त्र धारण करें। फिर, हाथ में जल लेकर आचमन कर खुद को शुद्ध करें। इसके बाद दाहिने हाथ में लाल पुष्प रख व्रत संकल्प लें। अब एक चौकी पर मैया की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर मां को श्रृंगार का सामान भेंट करें। इसके बाद फल, फूल, धूप-दीप, कुमकुम, अक्षत और मिष्ठान भेंट करें। अंत में आरती अर्चना कर सुख, शांति और धन की कामना करें। आप गुप्ता इच्छा की भी कामना कर सकते हैं। दिनभर उपवास रखें। शाम में आरती के बाद फलाहार करें।

सीता नवमी

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